Saturday, 2 March 2024

यात्रा से भटकी कांग्रेस

 


पंजाबी में कहावत है- ‘बुहे आई जन्न, विन्नो कुड़ी दे कन्न’ अर्थात दरवाजे पर बारात आने पर लडक़ी के कान बींधना साधारण शब्दों में कहें तो असमय कार्य करना। हिन्दी में इसकी समानार्थी कहावत है ‘फेरों के समय जूएं देखना’, कांग्रेस के साथ आजकल यही कुछ होता दिख रहा है, आम चुनाव सिर पर हैं और पार्टी जुटी है न्याय यात्रा में। स्कूली भाषा में बोलें तो फाइनल परीक्षा के समय एजुकेशनल टूअर पर निकलना। देखने में आ रहा है कि इस यात्रा में न केवल कांग्रेस बल्कि वह ‘इण्डी गठजोड़’ भी भटकता और झटके खाता नजर आ रहा है जो अभी भ्रूण अवस्था में भी नहीं आया है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी की दूसरी यात्रा 14 जनवरी को मणिपुर से शुरू हुई और 20 मार्च को मुम्बई में संपन्न होगी। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हो रही यह यात्रा 67 दिन में 6713 किलोमीटर लम्बा सफर तय करने के लिए देश के 15 राज्यों के 110 जिलों और 100 लोकसभा क्षेत्रों से गुजरेगी।  यह राहुल गांधी की दूसरी यात्रा है। इससे पहले उन्होंने भारत जोड़ो यात्रा निकाली थी, जो 7 सितंबर, 2022 को कन्याकुमारी से शुरू हो कर 30 जनवरी, 2023 को कश्मीर में संपन्न हुई। 136 दिन की उस यात्रा में 12 राज्यों और दो केन्द्र शासित प्रदेशों के 75 जिलों और 76 लोकसभा क्षेत्रों से गुजरते हुए चार हजार किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय किया गया था। पहली यात्रा पदयात्रा ही थी, जबकि न्याय यात्रा में हर दिन आठ से दस किलोमीटर पैदल चल कर शेष सफर विशेष वाहनों से तय किया जाएगा। राहुल की इस नई यात्रा का राजनीतिक आकलन तो लोकसभा चुनाव के बाद ही हो पाएगा लेकिन पहली यात्रा को एक नजरिए से देखें तो उसका परिणाम मिलाजुला रहा। कर्नाटक और तेलंगाना विधानसभा चुनावों में कांग्रेस जीत गई तो राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में उसे करारी हार झेलनी पड़ी। कांग्रेस को विश्वास है कि अबकी बार न्याय यात्रा परिवर्तनकारी साबित होगी। राहुल गान्धी की इन दो यात्राओं के बीच एक बड़ी घटना यह हुई है दो दर्जन से भी ज्यादा विपक्षी दल मिल कर नया ‘इंडि गठबंधन’ बना चुके हैं। लेकिन इस बार की यात्रा में सबसे बड़ी चूक साबित हो सकती है इसका समय, पहली यात्रा के समय देश के कुछ राज्यों में ही विधानसभा चुनाव होने थे परन्तु अब इस यात्रा के समय आम चुनाव होने हैं जो हर राजनीतिक दल के लिए जीवन-मरन का प्रश्न माने जाते हैं। अभी सबसे बड़ा सवाल न्याय यात्रा के समय को लेकर ही उठ रहा है। मार्च के दूसरे पखवाड़े में जब यह यात्रा संपन्न होगी, तब तक शायद देश में लोकसभा चुनाव के कार्यक्रम घोषित हो चुके होंगे या होने वाले होंगे। ऐसे में फरवरी और मार्च के महीने कांग्रेस के लिए लोकसभा चुनाव की तैयारी के हिसाब से महत्वपूर्ण समय है। ऐसे समय पार्टी की पूरी ऊर्जा केवल यात्रा के आयोजन और उससे जुड़े विवादों से जूझने में लग जाए, यह राजनीतिक आत्महत्या करने जैसा होगा।

यात्रा में केवल कांग्रेस ही नहीं भटकी लगता है वह ‘इण्डि गठजोड़’ भी भटकता और झटके खाता दिख रहा है जो अभी भ्रूण अवस्था में भी नहीं आया। सभी जानते हैं कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री एकला चलो का राग अलाप चुकी हैं तो देश की नई-नई परन्तु अति महत्वाकांक्षी आम आदमी पार्टी पंजाब, हरियाणा व दिल्ली में कांग्रेस के साथ समझौते से लगभग इंकार कर चुकी है। ‘इण्डि गठजोड़’ को सबसे करारा झटका दिया है बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने जो कहां तो कल तक खुद को इस गठजोड़ का संयोजक मान कर चल रहे थे और अब वे भाजपा के पाले में पलटी मार चुके हैं। केवल इतना ही नहीं गठजोड़ के अन्य दलों में भी इसके भविष्य को लेकर संदेह पैदा होने लगा है।

आज फरवरी का महीना शुरू हो चुका है,  ‘इण्डि गठजोड़’ की सफलता के लिए अभी तक संयोजक का नाम तय और सीटों के बण्टवारे पर बातचीत का काम पूरा हो जाना चाहिए था, परन्तु कांग्रेस के लिए ये कार्य अभी बहुत दूर की कौड़ी लगती है। ‘इण्डि गठजोड़’ के ही अभी तक सहयोगी माने जाने वाले दल तृणमूल कांग्रेस के शासन बंगाल में राहुल गान्धी की यात्रा पर हुई कथित पत्थरबाजी बताती है कि इस यात्रा के लिए गठजोड़ के सहयोगी दलों को न तो विश्वास में लिया गया और न ही उनका सहयोग मांगा गया। इतनी दयनीय स्थिति में भी कांग्रेस का अहं अभी गया नहीं लगता, उसे लगता है कि गठजोड़ में केवल वही एकमात्र दल है जिसकी उपस्थिति देशव्यापी है। तभी तो अपने संभावित सहयोगी दलों को यात्रा से दूर रखा गया। एक तरफ अहं जहां गठजोड़ में बाधा बनता दिख रहा है वहीं यात्रा का बेमौसमी आयोजन कांग्रेस को भी भटका रहा है। 
कुछ विश्लेषक मानते हैं कि न्याय यात्रा कांग्रेस के लिए शेर की सवारी हो गई है, जिसको न तो जारी रखना और न ही बीच में छोडऩा खतरे से खाली है। पार्टी की सारी शक्तियां अप्रत्यक्ष रूप से राहुल गांधी के हाथों में सीमित हैं तो यात्रा का नेतृत्व भी वही कर रहे हैं। राहुल की अनुमति के बिना न तो पार्टी के अन्य नेता संगठन को लेकर कोई निर्णय कर पा रहे हैं और न ही राहुल गांधी को इसके लिए समय मिल रहा है। यही दुविधा कांग्रेस को भटका रही है और ‘इण्डि’ गठजोड़ को झटके दे रही है। चुनाव सिर पर आ चुके हैं, श्रीराम मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा से कमण्डल, पिछड़ा वर्ग के महानायक माने जाने वाले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दे कर मण्डल साधने और ‘इण्डि गठजोड़’ के स्तम्भ नीतिश कुमार को साध कर भाजपा ने बड़ी बढ़त हासिल कर ली है, उससे कांग्रेस के नेतृत्व को इस बारे अवश्य सोचना चाहिए कि यात्रा पार्टी के भले के लिए निकालनी है या भटकने के लिए।

- राकेश सैन
32, खण्डाला फार्म कालोनी,
डाकखाना लिदड़ा,
जालन्धर।
सम्पर्क : 77106-55605

सन्देशखाली : टीएमसी का तालिबानी तंत्र

 

पश्चिम बंगाल के उत्तर परगना जिले के सन्देशखाली से जिस तरह के समाचार आरहे हैं उससे एक बार तो सन्देह होता है कि क्या यह वही 'आमार शोनार बांग्ला' भूमि है जहां कभी रविन्द्रनाथ टैगोर और स्वामी विवेकानन्द जी जैसी पुण्यात्माओं ने जन्म लिया। बंगाल की प्रगतिशीलता के बारे कहा जाता है कि जो बात देशवासी आज सोचता है 'बांग्ला मानुसÓ उसे वर्षों पहले सोच चुका होता है। माँ दुर्गा की पावन धरा बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के नेताओं द्वारा महिलाओं पर भीषण अत्याचार के जो समाचार वहां से आरहे हैं उनको सुन कर तो एक बार तालिबानी और आईएस सरीखे आतंकी संगठन भी शर्मसार हो जाएं। यह और भी शर्मनाक है कि सुश्री ममता बैनर्जी जैसी एक महिला मुख्यमंत्री के शासन में ये सबकुछ हो रहा है जो अपने आप को बंगाल की शेरनी कहलाना ज्यादा पसन्द करती हैं।

बीते कुछ दिनों से सन्देशखाली हिंसा की आग में झुलस रहा है। यहां का पूरा मामला प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के बाद लोगों के सामने आया है। पिछले माह 5 जनवरी, को निदेशालय के अधिकारी राशन भ्रष्टाचार मामले में सन्देशखाली के सरबेडिय़ा में तृणमूल नेता शेख शाहजहां से पूछताछ करने पहुंचे। सत्ताधारी दल के कार्यकताओं की मदद से न सिर्फ उनका नेता शाहजहां शेख फरार हो जाने में सफल रहा, बल्कि इस दौरान सरकारी अधिकारियों पर हमले भी किए गए। उसकी फरारी के बाद उन स्थानीय लोगों ने अपनी आवाज तेज कर दी जो उससे पीडि़त थे। गांव के लोग शेख शाहजहां और उसके सहयोगियों को गिरफ्तार करने की मांग कर रहे हैं और अपनी मांगों को लेकर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। इन प्रदर्शन में महिलाएं भी शामिल हो रही है। यहां की पीडि़त अनुसूचित जाति और आदिवासी महिलाओं की बातें हर किसी को अन्दर तक झकझोरने वाली हैं। इन महिलाओं ने वहां के तृणमूल नेता शेख शाहजहां और उनके साथियों पर यौन उत्पीडऩ व जमीन हड़पने के आरोप लगाये। आक्रोशित महिलाओं और लोगों ने शाहजहां के करीबी नेता शिबू हाजरा व उत्तम सरदार के खेत और मुर्गीखाने व घरों में आग भी लगा दी। आरोप है कि स्थान गांव के लोगों की जमीन छीनकर उसपर अवैध तरीके से यह मुर्गीखाना बनाया गया है। ये कई तरह के अवैध कार्यों का केन्द्र भी था। महिला आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग व कई राजनीतिक दलों के तथ्यान्वेषी दलों के सामने पीडि़त महिलाओं ने जो-जो बताया उनको कहने और लिखने में भी शर्म महसूस हो रही है। राज्य के 24 उत्तरी परगना जिले में हिंसा को लेकर बंगाल के राज्यपाल भी राज्य के कानून व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर चुके हैं। राज्यपाल सीवी आनन्द बोस ने सन्देशखाली में अशान्त क्षेत्रों का दौरा किया और तृणमूल कांग्रेस के फरार नेता शेख शाहजहां और उसके साथियों पर यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाने वाली महिला प्रदर्शनकारियों से बात की। इस दौरान राज्यपाल ने महिलाओं को आश्वासन दिया कि उनकी कलाई पर राखी बान्धने वाली महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए पूरी सहायता की जाएगी। यहां महिलाओं को कहते सुना गया कि वह अपने लिए शान्ति और सुरक्षा चाहती हैं, वह और प्रताडऩा नहीं झेल सकतीं है। दौरे के बाद राज्यपाल ने संवाददाताओं से कहा कि उन्होंने जो देखा वह भयावह, स्तब्ध करने वाला और उनकी अन्र्तात्मा को हिला देने वाला था।
परेशान करने वाली बात है कि सन्देशखाली की घटानओं को लेकर पूरा देश शर्मसार है परन्तु लगता है कि शायद सत्ताधारियों की आँखों का पानी सूख चुका है। लाख बदनामी झेलने और कलकत्ता उच्च न्यायालय की फटकार के बाद भी वहां की सरकार इन पंक्तियों के लिखे जाने तक वर्तमान के नरकासुर शाहजहां को गिरफ्तार नहीं कर पाई। अपना संवैधानिक दायित्व निभाने की बजाय सुश्री ममता बैनर्जी इस मामले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी को भी खींच लाई हैं और इन संगठनों को लेकर तरह-तरह के उपहासपूर्ण आरोप लगा रही हैं। केवल सत्ताधारी ही क्यों अन्र्तात्मा उन संगठनों की भी मर चुकी दिखती हैं जो कल तक मणिपुर में हुई इसी तरह की घटनाओं को लेकर बीच चौराहों पर छाती पीट रहे थे और महिला सम्मान की ओट में अपने राजनीतिक हित साध रहे थे। ठीक ही कहा गया है कि महिला सम्मान में राजनीतिक लाभ हानि देख कर मोमबत्तियां फूकने या बुझाने वाले असल में उसी स्तर के अपराधी हैं जितना कि उत्पीडऩ करने वाले दोषी।
एक बार लक्ष्मीजी ने नारायण से पूछा कि भगवन आपने एक युग में तो मरणासन्न जटायु नामक मुर्दाखोर गिद्ध के अपने हाथों से जख्म धोए और मरने पर अन्तिम संस्कार तक किया और दूसरे युग में शरशैया पर लेटे भीष्म पितामह जैसे पुण्यात्मा को पीने के लिए जल तक नहीं दिया। इस पर श्रीहरि कहते हैं कि गिद्धराज जटायु को मालूम था कि वह रावण से नहीं जीत पाएगा परन्तु इसके बावजूद वह एक महिला सीता को बचाने के लिए दशानन से भिड़ गया। दूसरी ओर कौरव सभा में अधिकार संपन्न व शस्त्रों से सुसज्जित होने के बाद भी गंगापुत्र भीष्म  द्रोपदी जैसी महिला के चीरहरण पर मौन रहे, इसीलिए मैने उसे पानी देने लायक भी नहीं समझा और खगराज जटायु का तर्पण भी किया। आज यह तय ममता दीदी को करना है कि भविष्य में वे पक्षीराज जटायु की श्रेणी में अपना नाम लिखवाना चाहेंगी या कौरव शिरोमणि भीष्म की परम्परा में। चाहे लोकतन्त्र व हिंसा को लेकर तृणमूल कांग्रेस सरकार का विवादित अतीत रहा है परन्तु महिला सम्मान की खातिर तो उन्हें अपने समस्त राजनीतिक, साम्प्रदायिक व वैचारिक पूर्वाग्र
ह त्यागने ही होंगे और सन्देशखाली के आरोपियों को सींखचों के पीछे पहुंचाना ही होगा। यही संवैधानिक मर्यादा व न्याय की मांग है।

- राकेश सैन
32, खण्डाला फार्म कालोनी,
ग्राम एवं डाकखाना लिदड़ा, जालन्धर।
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कांग्रेस और ‘आप’: इस रिश्ते को क्या नाम दें ?

 देश में लोकसभा चुनावों की तैयारी को लेकर ‘इंडी’ गठजोड़ के तहत कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच गठबन्धन हो चुका है। देश के अन्य हिस्सों जैसे दिल्ली, हरियाणा, गुजरात और गोवा में दोनं दल मिल कर चुनाव लड़ेंगे जबकि पंजाब में एक-दूसरे के खिलाफ। इस अजीबो-गरीब गठजोड़  को देख कर हास्य अभिनेता कादर खान की उस फिल्म में कमेडी का स्मरण हो आया जिसमें प्रेमी की माँ और प्रेमिका का बाप भी एक दूसरे के चक्कर में पड़ कर शादी कर बैठते हैं। अब इस रिश्ते से प्रेमी अपनी प्रेमिका भाई हो गया और उसका अपना पिता उसका ससुर भी बन गया। प्रेमिका भी अपनी माँ को सासू कहे या मम्मी, उसे समझ नहीं आरहा था। परिवार में इन दोनों जोडिय़ों के होने वाले बच्चों के सामने समस्या पैदा हो गई कि कौन किसको किस रिश्ते से पुकारे? इसी तर्ज पर उक्त राजनीतिक गठजोड़ को देख कर यह बात सत्य साबित हो गई है कि देश में नई तरह की राजनीति का वायदा करके आए अरविंद केजरीवाल ने वास्तव में नया कर दिखाया है। हालांकि इस तरह के बेमेल गठजोड़ अतीत में भी कुछ स्थानों पर होते रहे हैं परन्तु राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार यह बेर और केर का साथ चर्चा का विषय बना हुआ है। कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ चले अन्ना हजारे आन्दोलन से ऊपजी आम आदमी पार्टी अब उसी के पक्ष में भुगतती दिखाई दे रही है।


रोचक है कि चुनावों में प्रचार के दौरान पंजाब में कांग्रेस जहां भगवंत मान के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी की सरकार को कोसेगी और अरविंद केजरीवाल पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को उछालेगी वहीं दोनों दल दूसरे राज्यों में एक-दूसरे की पीठ खुजाएंगे। केंद्र में अगर सत्ता परिवर्तन होता है तो यहां के सांसद चाहे वह कांग्रेस के हों या आप के एकसाथ सरकार में बैठेंगे और भाजपा सरकार बनी रहती है तो विपक्ष में गलबहियां डाले दिखेंगे, यानि हमीं से मुहब्बत हमीं से लड़ाई-अरे मार डाला दुहाई दुहाई। पंजाब में इस रिश्ते को फिक्स मैच या नूरा कुश्ती का नाम दिया जाने लगा है। कल 1 मार्च को पंजाब विधानसभा में शुरू हुए बजट सत्र के दौरान कांग्रेस ने पंजाब में शंभू सीमा पर चल रहे किसान आंदोलन में मारे गए युवक को लेकर आप की सरकार को घेरा तो सत्तापक्ष ने कांग्रेस पर पलटवार किया। भाजपा ने इसे फिक्स मैच बता कर उपहास किया है और कहा है कि किसानों के खिलाफ दोनों अंदर से मिले हुए हैं।
 


इस बेमेल खिचड़ी गठबन्धन को लेकर एक कहानी सुनाई जाने लगी है कि जैसे बाढ़ के समय जान बचाने के लिए अपनी दुश्मनी भुला कर हर तरह के जीव-जन्तु ऊंचाई वाली जगह पर एकत्रित हो जाते हैं परन्तु पानी उतरते ही उनकी मित्रता उसी बाढ़ के जल में प्रवाहित हो जाती है और फिर एक दूसरे की जान के दुश्मन बन जाते हैं। लगता है कि देश में जिस तरह का राजनीतिक वातावरण बना हुआ है और भाजपा की विजय की अभी से भविष्यवाणी करने वालों की संख्या बढ़ रही है, शायद उसी के भय से आम आदमी पार्टी व कांग्रेस ने मिल कर भानूमती का कुनबा जुटाया है। देश के इतिहास में यह दूसरा चुनाव है जब भ्रष्टाचार को लेकर सरकार हावी है और विपक्षी दल रक्षात्मक मुद्रा में हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं पर तो काफी समय से इस तरह के केस चले आ रहे हैं परन्तु कट्टर ईमानदार अरविंद केजरीवाल व आप के कई बड़े नेताओं पर भी दिल्ली आबकारी घोटाले के छींटे पड़े हैं जो उन्हें बेचैन किए हुए हैं। आम आदमी पार्टी के कई नेता तो जेलों में कैद हैं और यहां तक कि उन्हें इन केसों में सर्वोच्च न्यायालय से जमानत तक नहीं मिल पा रही। ये वही केजरीवाल हैं जो सोनिया गांधी को मंच पर खड़े हो कर भ्रष्टाचारी बताते थे और दिल्ली की पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री दिवंगत शीला दीक्षित के कथित भ्रष्टाचार के सबूतों का पुलिंदा होने का दावा करते थे। दिल्ली विधानसभा चुनावों में उन्होंने दावा किया था कि सत्ता में आते ही इन सबको जेल की हवा खिलाई जाएगी।    पर आज वही केजरीवाल कांग्रेस को परममित्र बताते नहीं अघाते।
पंजाब में भी भगवंत मान की सरकार ने आते ही कथित भ्रष्टाचार उन्मूलन अभियान चला कर एक दर्जन के करीब पूर्व कांग्रेसी मंत्रियों व विधायकों के यहां सतर्कता विभाग की छापामारी करवाई और कईयों को जेल में भेजा परन्तु वर्तमान में न जाने किस कारण से उनका यह अभियान केवल पटवारियों-क्लर्कों तक सीमित हो कर रह गया। बड़े नेताओं के केस लम्बी तारीख पर डाल दिए गए हैं। पंजाब के बड़े कांग्रेसियों के भ्रष्टाचार पर न केवल भगवंत मान बल्कि उनके मंत्रियों व नेताओं तक ने बोलना कम कर दिया।
जैसे कि बताया जा चुका है कि विरोधी दलों से गठजोड़ होना कोई नई बात नहीं है परंतु किसी दो दलों में एक स्थान पर तो गठबंधन हो और दूसरी जगह पर एक-दूसरे से भिड़ते दिखें तो अतीत में ऐसा राजनीतिक उदाहरण दुर्लभ ही है। कहने को दोनों दल दावा करते
हैं कि वे देश में लोकतंत्र व संविधान बचाने के लिए एक दूसरे के साथ आए हैं अगर ऐसा है तो इतने पवित्र यज्ञ में पंजाब को क्यों आहूति डालने से वंचित कर दिया ? देशवासी अब आम आदमी पार्टी व कांग्रेस दोनं से पूछ रहे हैं कि इस रिश्ते को क्या नाम दें ?

- राकेश सैन

32, खण्डाला फार्म कालोनी,

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Monday, 22 May 2023

तुष्टीकरण व साम्प्रदायिकता दो सगी बहनें

 अस्सी के दशक की बात है, शाहबानो नामक केस सामने आया। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि जिस औरत को तिहरा तलाक दिया गया है, उसका पति गुजर बसर के लिए मुआवजा दे। कठमुल्लों ने इसे इस्लाम में हस्तक्षेप बताया। भीड़ आई, समर्थन आया तो गंगा में डुबकी लगाने राजीव गांधी भी पहुंच गए। उन्हें वहां सस्ती भीड़ मिली। राजीव ने संसद में एक कानून बनाकर न्यायालय के निर्णय को धोबीपटका दे दिया। भीड़ खुश हुई, मौलवी नाचे, इस्लाम वालों का माशा अल्लाह हुआ और राजीव जिंदाबाद हो गए लेकिन इस तुष्टीकरण का परिणाम क्या निकला? उत्तर है कि- मुसलमानों के एक वर्ग का तालिबानीकरण, जिहादी आतंक की तपिश, ट्रिपल तलाक के नाम पर बच्चियों का शोषण, कई दंगे जिनमें हजारों लाशें और इसके अलावा भी न जाने किस-किस रूप में इस नीति के विषैले फल हमने चखे।


तुष्टीकरण बीज है तो सांप्रदायिकता फसल, दोनों परस्पर यूं जुड़ी हैं जैसे एक कोख जाई बहनें। क्या तब ऐसे लोग नहीं रहे होंगे, जिन्होंने उस तुष्टीकरण पर सवाल किया हो? निश्चित ही किया होगा, पर उन्हें ‘इस्लामोफोबिक’ कह नकारा गया होगा या उन पर सांप्रदायिकता का ठप्पा लगा दिया होगा। जिस तुष्टीकरण के चलते देश का विभाजन हुआ वही नीति न तो बंटवारे के बाद बंद हुई और राजनीतिक दलों की कुर्सी की भूख बताती है कि न ही निकट में इस पर विराम लगने की कोई संभावना दिखाई दे रही, चाहे इसके लिए कितना भी गम्भीर परिणाम भुगतना पड़ जाए।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने परम्परा अनुसार खुल कर तुष्टिकरण की चौसर खेली। राज्य की निवर्तमान भाजपा सरकार ने मुसलमानों को अन्य पिछड़ा वर्ग के कोटे से दिए जा रहे चार प्रतिशत आरक्षण की सुविधा वापिस ले ली। देश की छद्मधर्मनिरपेक्ष जाति ने न केवल इस पर हल्ला मचाया बल्कि मामला सर्वोच्च न्यायालय तक ले गए। संवैधानिक व्यस्था के तहत धर्म के आधार पर आरक्षण की सुविधा नहीं दी जा सकती। भाजपा सरकार ने इस मुद्दे पर संवैधानिक व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया परन्तु कांग्रेस सहित तमाम छद्मधर्मनिरपेक्ष योद्धाओं ने इसे मुस्लिम विरोधी बता कर तुष्टिकरण का पुराना खेल खेलना शुरू कर दिया। 

इतना ही नहीं, कांग्रेस ने चुनावी घोषणापत्र में बजरंग दल व पापुलर फ्रंट आफ इंडिया पर प्रतिबंध लगाने का भी वायदा किया। सभी जानते हैं कि पीएफआई एक आतंकी संगठन है जिसकी किसी भी तरह से बजरंग दल जैसे उस संगठन से तुलना नहीं की जा सकती जो देश की संवैधानिक मर्यादा के अनुकूल अपनी गतिविधियां संचालित करता है। सभी जानते हैं कि राष्ट्रवादी संगठन शुरू से ही कांग्रेस की आंखों की किरकिरी रहे हैं और पार्टी अपने घोषणापत्र में बजरंग दल पर प्रतिबन्ध की बात कर केवल मुस्लिम तुष्टीकरण का कार्ड खेल रही है। 

कुछ ऐसा ही लव जिहाद व जबरन धर्मांतरण विषयों को लेकर बनाई गई ‘द केरल स्टोरी’ को लेकर देखने को मिला। ‘द केरल स्टोरी’ सुदीप्तो सेन द्वारा निर्देशित और विपुल शाह द्वारा निर्मित फिल्म है। यह केरल की महिलाओं के एक समूह की कहानी है जो धर्मान्तरित होकर आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एण्ड सीरिया में शामिल हो जाती हैं। फिल्म ने खुद को एक सच्ची कहानी के स्पष्ट चित्रण के रूप में प्रस्तुत किया है और यह बताया है दुनिया की हजारों महिलाओं को इस्लाम में जबरदस्ती परिवर्तित किया जा रहा है और आईएसआईएस में भर्ती किया जा रहा है। सिनेमघरों में उमड़ रही भीड़ बताती है कि देशवासियों को यह फिल्म खूब पसन्द आई है परन्तु तुष्टीकरण की पीठ पर सवार दलों ने इसका भी यह कहते हुए विरोध करना शुरू कर दिया कि फिल्म की कहानी मुसलमानों को बदनाम करने का काम कर रही है। विरोध करने वाले यह बताने में असमर्थ हैं कि आतंकी संगठन आईएसआईएस का पर्दाफाश करने वाली फिल्म इस्लाम के खिलाफ कैसे मानी जा सकती है? आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होने का ग्रामोफोन चलाते आ रहे हमारे धर्मनिरपेक्षतावादी क्या इस फिल्म का विरोध कर खुद ही आतंकवाद का इस्लाम से नाता तो नहीं जोड़ रहे?

कर्नाटक में तुष्टीकरण के गरलमंथन से कांग्रेस पार्टी ने सत्ता तो हासिल कर ली, क्योंकि चुनावी विश्लेषण बताते हैं कि इन चुनावों में मुसलमानों के थोक वोट कांग्रेस को मिले, जिससे जनता दल (एस) का पांच प्रतिशत मत खिसक कर कांग्रेस में मिल गया और वह चुनाव जीत गई, परंतु क्या ऐसा करके कांग्रेस ने साम्प्रदायिकता की नई पृष्ठभूमि तो नहीं तैयार कर दी? राजनीतिक दल सचेत रहें, तुष्टीकरण की नीति कुछ विधायक व सांसद तो बनवा देती है परन्तु इसके परिणाम पूरे देश को साम्प्रदायिकता व आतंकवाद के रूप में भुगतने पड़ते हैं। तुष्टीकरण की नीति कट्टरपन्थियों को एकजुट करती है जो पूरे समाज के साथ-साथ खुद उस धर्म के मानने वालों के लिए भी घातक साबित होती है। कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस ने तुष्टीकरण की नीति से साम्प्रदायिकता की नई फसल का बीजारोपण कर दिया है और अब देशवासियों को ही सावधान रहना होगा।



- राकेश सैन
32, खण्डाला फार्म कालोनी, 
ग्राम एवं डाकखाना लिदड़ा, 
जालन्धर।
सम्पर्क : 77106-55605

Tuesday, 4 October 2022

पंजाब के लोकजीवन में भगवान श्रीराम

 

भगवान श्रीराम का देश के कण-कण से नाता है और जब ऐसा सम्बन्ध हो तो यह शायद सम्भव ही नहीं कि ऋषि-मुनियों व गुरुओं की धरती पंजाब इससे विरक्त हो। श्रीराम व उनके परिवार को लेकर देश में अनेक तरह की किंवदन्तियां व लोककथाएं प्रचलित हैं और एक प्रसंग उन्हें पंजाब से भी जोड़ता है। दसवें गुरु श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी ने अपनी रचना दशमग्रन्थ में चौबीस अवतारों का वर्णन बड़े सुन्दर काव्यात्मक रूप में पेश किया है। इसमें रामावतार में उन्होंने भगवान श्रीराम के अवतार का पूरा वृतान्त दिया है। उन्होंने श्रीराम का सम्बन्ध पंजाब से जोड़ते हुए उनकी माता कौशल्या को पंजाब की बताया है। उनके अनुसार, माता कौशल्या कौसल देश की राजकुमारी थी और उनका जन्म कुड़हाम नामक स्थान पर हुआ जो आज पटियाला जिले में पंजाब-हरियाणा की सीमा पर स्थित है। आज इस गांव को घड़ाम के नाम से जाना जाता है। गुरु गोबिन्द सिंह जी लिखते हैं -
कुहड़ाम जहां सुनिए नगरं। तहै कोशल राज नृपेश वरं।
उपजी तिह धाम सुता कुशला। जिह जीत लई ससि अंश कला।
सुधि पाय सुयम्बर जो करयो। अवधेश नरेशहिं तो तरयो।
अर्थात कुशल (कौसल) के राज्य की पुत्री कौशल्याजी का जन्म कुड़हाम (घड़ाम) में हुआ जिन्होंने अपनी सुन्दरता से चन्द्रमां को भी फीका कर दिखाया और उनका विवाह अवध के राजा से हुआ। यहां यह वर्णननीय है कि आज भी इस क्षेत्र में पंजाबी ब्राह्मण व क्षत्रिय वंश के लोग अपना गौत्र कौशल लिखते हैं।
पंजाब के लोगों व साहित्यकारों ने माता कौशल्या के इस सम्बन्ध को अपने लोकगीतों व साहित्यिक रचनाओं में जीवित भी रखा है। श्रीराम ही नहीं बल्कि माता कौशल्या, महाराजा दशरथ सहित रामायण के कई पात्र पंजाब के शादी विवाह के समय गाए जाने वाले लोकगीतों में आज भी गाए जाते हैं। इन गीतों में युवति श्रीराम जैसा पति, राजा दशरथ व कौशल्या जैसे सास-ससुर, लक्ष्मण जी सा देवर और अयोध्या जी जैसे राज्य की कामना करती हुई कहती है -
बीबी बाबल देयां महलां ते किउं खड़ी ए ?
मैं ता खड़ी सी बाबल जी दे कोल, बाबल! घर लोड़ीए।
बेटी किहो जिहा वर लोड़ीए ?
मैं तां सस्स मंगांगी कौशल्या, कि सोहरा दशरथ होवे।
मैं तां वर मंगांगी श्रीराम, छोटा देवर लछमण होवे।
मैं तां मंगांगी अयुधियाजी दा राज, पंघूड़े बैठी हुकम करां।।
पंजाब में शादी के समय या जंवाई के घर आने पर उसको सीठणे देने की परम्परा है। इसमें वधु पक्ष की महिलाएं खूब हास-परिहास करती हैं और जंवाई के परिवार वालों पर कई तरह के ताने कसे जाते हैं। बारात को तब तक खाना नहीं खाने दिया जाता जब तक वधुपक्ष की महिलाओं के सीठणों का जवाब जंवाई के साथ आए उसके मित्र या भाई उसी शैली में नहीं देते। महिलाओं के सीठणों को पत्तल बान्धना कहते हैं अर्थात महिलाएं बारातियों व जंवाई के साथियों का खाना रोक देती हैं और बारातियों में से कोई जवाब देता है तो इसे पत्तल खोलना कहते हैं। मालवे के गीतकार शादीराम ‘पत्तल काव्य’ में इस प्रथा का वर्णन करते हुए रामजी के विवाह के बारे लिखते हैं -
कोरिआं से बठाई जन्न जीमणे नूं जनकजी ने,
आप जनक पत्तलां ते भोजन जो पांवदा।
जन्न बन्न दित्ती रामचन्दर दी नारीआं ने,
‘शादीराम’ लक्षमण जी उट्ठ के छुड़ांवदा।
अर्थात रामजी की शादी में जनकजी खुद बारातियों को भोजन परोसते हैं परन्तु सीता माता की सखियां व महिलाएं रामजी की पत्तल बान्ध देती हैं तब लक्ष्मण जी पत्तल छुड़वाते हैं अर्थात महिलाओं के सीठणों का जवाब देते हैं। हरियाणा पंजाबी सूबे के रूप में हुए साम्प्रदायिक व संकीर्ण राजनीति से प्रेरित विभाजन से पूर्व पंजाब का पुआध का इलाका कहलाता था। राजनीतिक व प्रशासनिक दृष्टि से चाहे पंजाब से भिन्न है परन्तु इसकी संस्कृति पंजाबी सभ्याचार का अभिन्न अंग मानी जाती है। इसमें भी महिलाएं श्रीराम जैसा वर देख कर खुश होती हैं -
बाबा जी नै कमरे में बन्नाजी बुलाए।
देख म्हारी लाड्डो, यो कैसे वर आए।
चन्दा नहीं आए, सूरज नहीं आए।
हाथी के होदे, राजा रामचन्दर आए।
बेटी की विदाई के समय मायके की महिलाएं उससे कुछ मांगने के लिए कहती हैं तो युवति जवाब देती है कि उसे राम जैसा पति और लक्ष्मण जैसा देवर मिलने का आशीर्वाद मांगती है।
बीबी तेरे बाबा जी खड़े, राम रथ हांक दियो।
बीबी मांगणा हो सोए मांग, अभी तो तन्नै मिल सकदा।
मैं तो वर मांगूं भगवान, देवर छोटे लछमण से।
इन्हीं लोकगीतों में महिलाएं श्रीराम द्वारा त्यागे जाने के बाद माता सीता के अकेलेपन के दुख को जताती हुई गाती हैं -
सिया खड़ी पछताय लव-कुस बन में हुए।
जो यहां होती ललना की दाई।
ललना देती जमाय सूरज देती पुजाय।
मुन्ना देती खिलाय, लव-कुस बन में हुए।
माता सीता पछताती है कि अवध के राजकुमार यूं वन में हुए, जहां न तो दाई है, न माँ-बहन, ननद, देवर-देवरानी और न ही नायन। पूरे गीत में महिलाएं दाई की जगह बदल-बदल कर चाची, ताई, नायन, माँ-बहन सहित सभी रिश्तों का का वर्णन करती हैं। रामायण के उत्तरकाण्ड में माता सीता की मनोस्थिति का इस गीत में वर्णन मिलता है।
- (हरियाणा के लोकगीत, पृष्ठ 58)।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि रामायण व भगवान श्रीराम पूरे भारत ही नहीं बल्कि समूचे जम्बूद्वीप को परस्पर एकात्मता से जोड़ती है।

Ralesh Sain
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Saturday, 12 March 2022

मान का ‘मान’ पचा पाएंगे केजरीवाल श्रीमान ?

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान पंजाब में ‘आप’ को मिली धमाकेदार जीत के बाद पार्टी में सब बमबम है। चारों ओर गुणगान है, चंवर झुलाए जा रहे हैं और मीडिया के विशेषणयुक्त मंगलगीतों में कमियों को भी खासीयत बता कर पेश किया जा रहा है। लेकिन इस जीत पर प्रतिक्रिय देते हुए पार्टी के सर्वेसर्वा दिल्ली के मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल के कहे हुए शब्दों ने सबको चौंकाया है। मतगणना के दौरान जीत के बढ़ते ग्राफ को देख कर केजरीवाल ने कहा कि ‘पंजाब की जीत डरा रही है।’ सामान्य तौर पर इन शब्दों का भाव है कि जैसे केजरीवाल कह रहे हों कि देश की जनता ने बड़ी जिम्मेवारी के लिए पार्टी से नई उम्मीद बान्धी है, और जनता की पार्टी के प्रति बढ़ी अपेक्षा डरा रही है। परन्तु पूछने वाले पूछ रहे हैं कि क्या भगवन्त मान की लोकप्रियता ने केजरीवाल को भी डरा दिया ? क्या पार्टी में अभी तक ‘एकलमुण्डी सेना’ रहे केजरीवाल भगवन्त मान के अपने से ऊंचे कद को बर्दाश्त कर पाएंगे ?

केजरीवाल व मान पर यह कहावत बिल्कुल स्टीक बैठती है कि गुरु गुड़ रहे और चेला शक्कर हो गए। केजरीवाल दिल्ली जैसे छोटे व केन्द्र शासित राज्य के मुख्यमन्त्री हैं तो भगवन्त मान दिल्ली से कई गुणा बड़े और पूर्णरुपेण राज्य के सूबेदार बन गए हैं। दिल्ली में केजरीवाल को हर निर्णय के लिए उप-राज्यपाल की मुंह की ओर तकना पड़ता है जबकि भगवन्त मान के सामने ऐसी कोई विवशता नहीं होगी। केजरीवाल के नियन्त्रण में दिल्ली पुलिस सहित मुख्यमन्त्री के अनेक अधिकार नहीं हैं परन्तु भगवन्त मान के पास एक पूर्ण राज्य के मुख्यमन्त्री की सारी शक्तियां होंगी। देश के मुख्यमन्त्रियों की पंक्ति में मान को केजरीवाल से अधिक ‘मान’ मिलना तय है और केजरीवाल के स्वभाव की ओर देखें तो यह उनको अखर सकता है।
यहां यह बात भी वर्णननीय है कि पंजाब के विगत विधानसभा चुनावों में केजरीवाल ने अपना चेहरा आगे कर राजनीतिक पासा फेंका था परन्तु, उन्हें आशातीत सफलता नहीं मिवी। अबकी बार 2022 के चुनावों में भी केजरीवाल ने प्रचार का प्रारम्भ बिना पंजाबी नेता के चेहरे के किया। इसको लेकर पार्टी के स्थानीय नेताओं व कार्यकर्ताओं में आक्रोश भी था कि केजरीवाल दिल्ली के लोगों को आगे ला रहे हैं। पिछले कुछ सालों में इसी आक्रोश के चलते कई विधायकों ने अपने पदों से त्यागपत्र भी दे दिए थे। शायद मजबूरीवश मतदान के एक माह पहले 18 जनवरी को केजरीवाल ने कथिततौर पर जनता की राय ले कर भगवन्त मान को मुख्यमन्त्री का चेहरा घोषित करना पड़ा। इसके बाद ही पंजाब में आम आदमी पार्टी की हवा बननी शुरू हुई जो मतदान तक आन्धी में परिवर्तित हो गई।
लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर चले अन्ना हजारे आन्दोलन के प्रतिफल में उपजी आम आदमी पार्टी चाहे लोकशाही के लाख दावे करती है, परन्तु इसमें आन्तरिक लोकतन्त्र का जन्म से अभाव रहा है। पार्टी का गठन नवम्बर 2012 में हुआ और तब से पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक पद पर अरविन्द केजरीवाल ही आसीन चले आ रहे हैं। केवल इतना ही नहीं पार्टी व दिल्ली सरकार के महत्त्वपूर्ण पद भी उन्होंने अपने चहेतों में ही बाण्टे हुए हैं। पार्टी की बैठकों में अरविन्द केजरीवाल के इशारों को ही भगवद् इच्छा मान कर स्वीकार कर लिया जाता है। केजरीवाल ने पार्टी में अपना विरोध करने वालों व उनको भविष्य में चुनौती पेश करने वाले कद्दावर नेताओं को एक के बाद एक निस्तेज कर दिया जिन्हें अन्तत: पार्टी को छोडऩा पड़ा। याद करें कि अन्ना हजारे आन्दोलन में केजरीवाल के साथ किरण बेदी, योगेन्द्र यादव, पत्रकार आशुतोष, प्रशान्त किशोर, जनरल वीके सिंह, कुमार विश्वास, कपिल मिश्रा सहित कई ज्ञात-अज्ञात चेहरे मंच पर नजर आते थे। बाद में इनमें कईयों ने आम आदमी पार्टी की सदस्यता भी ग्रहण की और कई स्तर पर चुनाव भी लड़े, परन्तु आज वे पार्टी में दिखाई नहीं पड़ते। केजरीवाल की तानाशाह कार्यप्रणाली के चलते इन्हें या तो दूसरे दलों में जाना पड़ा या राजनीतिक हाशीए पर।
व्यक्तिवादी व परिवारवादी दल देश की राजनीति के लिए बहुत बड़ी समस्या बन चुके हैं। इस तरह के विचारशून्य दलों में उच्च पद पर आसीन कोई भी नेता स्वेच्छा से अपना पद छोडऩे को राजी नहीं होता। केवल इतना ही नहीं, भविष्य में जो उनके लिए खतरा बने उस नेता के पर काटने में भी देर नहीं लगाई जाती। देश की परिवारवादी पार्टियों में कांग्रेस, सपा, डीएमके सहित अनेक दल इसके उदाहरण हैं, जहां परिवार के लिए प्रतिभा का गला घोण्ट दिया जाता है। देश में आम आदमी पार्टी एक घोर व्यक्तिवादी दल बन कर उभरा है जिसमें ‘यस बॉस’ की संस्कृति ही संस्कार है। ऐसे में भगवन्त मान ने लोकप्रियता के मामले में अरविन्द केजरीवाल से ऐसी बड़ी लकीर खीञ्च दी है जो पंजाब के पिछले विधानसभा चुनाव में खुद ‘आप सुप्रीमो’ भी नहीं खींच सके। सच पूछा जाए तो आज आम आदमी पार्टी में पहले-दूसरे नम्बर के नेता की बात की जाए तो मान व केजरीवाल में ‘लम्बूजी’ और ‘टिंगूजी’ के फिल्म कुली के पात्र नजर आते हैं। भगवन्त मान पंजाब में कुछ अच्छा कर पाए तो इस ऊंचाई का अन्तर और भी बढ़ जाएगा। अब सवाल है कि मान का यही ‘मान’ श्रीमान केजरीवाल कितना पचा पाएंगे ? यह तो आने वाला समय ही बता पाएगा।
- राकेश सैन
32, खण्डाला फार्म कालोनी,

ग्राम एवं डाकखाना, लिदड़ा,
जालन्धर।
सम्पर्क : 77106-55605

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