Monday, 16 September 2019

मोदी, लोकतंत्र के गौरमयी हस्ताक्षर



श्री नरेंद्र मोदी ने 30 मई 2019 को भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली, जो उनके दूसरे कार्यकाल की शुरुआत थी। आजादी के बाद पैदा होने वाले पहले प्रधानमंत्री, श्री मोदी ने पहले 2014 से 2019 तक भारत के प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला है। उन्होंने अक्टूबर 2001 से मई 2014 तक लंबे समय तक गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपना पद संभाला है। 2014 और 2019 के संसदीय चुनावों में श्री मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने दोनों अवसरों पर पूर्ण बहुमत हासिल किया। आखिरी बार 1984 के चुनावों में किसी राजनीतिक दल ने पूर्ण बहुमत हासिल किया था। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विकास’ के आदर्श वाक्य से प्रेरित होकर, श्री मोदी ने शासन व्यवस्था में एक ऐसे बदलाव की शुरुआत की और समावेशी, विकासोन्मुख और भ्रष्टाचार-मुक्त शासन का नेतृत्व किया। प्रधानमंत्री ने अंत्योदय के उद्देश्य को साकार करने और समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति को सरकार की योजनाओं और पहल का लाभ मिले यह सुनिश्चित करने के लिए स्पीड और स्केल पर काम किया है। 
विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों ने इस बात को माना कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत रिकॉर्ड गति से गरीबी को खत्म कर रहा है। इसका श्रेय केंद्र सरकार द्वारा गरीबों के हित को ध्यान में रखते हुए लिए गए विभिन्न फैसलों को जाता है। आज भारत दुनिया के सबसे बड़े स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रम आयुष्मान भारत का नेतृत्व कर रहा है। 50 करोड़ से अधिक भारतीयों को कवर करते हुए आयुष्मान भारत गरीब और नव-मध्यम वर्ग को उच्च गुणवत्ता और सस्ती स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित कर रहा है। दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित स्वास्थ्य पत्रिकाओं में से एक लांसेट ने आयुष्मान भारत की सराहना करते हुए कहा है कि यह योजना भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े असंतोष को दूर कर रही है। पत्रिका ने सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज को प्राथमिकता देने के लिए पीएम मोदी के प्रयासों की भी सराहना की। देश की वित्तीय धारा से दूर गरीबों को वित्तीय धारा में लाने के लिए प्रधानमंत्री ने प्रधानमंत्री जन धन योजना शुरू की, जिसका उद्देश्य प्रत्येक भारतीय का बैंक खाते खोलना था। अब तक 35 करोड़ से अधिक जन धन खाते खोले जा चुके हैं। इन खातों ने न केवल गरीबों को बैंक से जोड़ा, बल्कि सशक्तीकरण के अन्य रास्ते भी खोले हैं। जन-धन से एक कदम आगे बढ़ते हुए श्री मोदी ने समाज के सबसे कमजोर वर्गों को बीमा और पेंशन कवर देकर जन सुरक्षा पर जोर दिया। ट्रिनिटी (जन धन- आधार- मोबाइल) ने बिचौलियों को समाप्त कर दिया है और प्रौद्योगिकी के माध्यम से पारदर्शिता और गति सुनिश्चित की है। असंगठित क्षेत्र से जुड़े 42 करोड़ से अधिक लोगों के पास अब प्रधानमंत्री श्रम योगी मान धन योजना के तहत पेंशन कवरेज मिली है। 2019 के चुनाव परिणामों के बाद पहली कैबिनेट बैठक के दौरान व्यापारियों के लिए समान पेंशन योजना की घोषणा की गई है। 2016 में गरीबों को मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन प्रदान करने के लिए प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना शुरू की गई थी। यह योजना 7 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को धुआं मुक्त रसोई प्रदान करने में एक बड़ा कदम साबित हुई है। इसकी अधिकांश लाभार्थी महिलाएं हैं। आजादी के बाद से 70 वर्षों के बाद भी 18,000 गाँव बिना जहां बिजली नहीं थी वहां बिजली पहुंचाई गई है। श्री मोदी का मानना है कि कोई भी भारतीय बेघर नहीं होना चाहिए और इस विजन को साकार करने के लिए 2014 से 2019 के बीच 1.25 करोड़ से अधिक घर बनाए गए है। 2022 तक प्रधानमंत्री के ‘हाउसिंग फॉर ऑल’ के सपने को पूरा करने के लिए घर के निर्माण की गति में तेजी आई है। कृषि एक ऐसा क्षेत्र है जो श्री नरेंद्र मोदी के बहुत करीब है। 2019 के अंतरिम बजट के दौरान सरकार ने किसानों के लिए पीएम किसान सम्मान निधि के रूप में एक मौद्रिक प्रोत्साहन योजना की घोषणा की। 24 फरवरी 2019 को योजना के शुरू होने के बाद लगभग 3 सप्ताह में नियमित रूप से किश्तों का भुगतान किया गया है। पीएम मोदी के दूसरे कार्यकाल की पहली कैबिनेट बैठक के दौरान इस योजना में 5 एकड़ की सीमा को हटाते हुए सभी किसानों को पीएम किसान का लाभ देने का फैसला किया गया। इसके साथ ही भारत सरकार प्रति वर्ष लगभग 87,000 करोड़ रुपये किसान कल्याण के लिए समर्पित करेगी। श्री मोदी ने सॉयल हेल्थ कार्ड, बेहतर बाजारों के लिए ई-नाम और सिंचाई पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने जैसी किसान कल्याण की दिशा में विभिन्न पहल शुरू की। 30 मई 2019 को प्रधानमंत्री ने जल संसाधनों से संबंधित सभी पहलुओं की देखरेख करने के लिए एक नया जल शक्ति मंत्रालय बनाकर एक बड़ा वादा पूरा किया।2 अक्टूबर 2014 को महात्मा गांधी की जयंती पर प्रधानमंत्री मोदी ने पूरे देश में स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए ‘स्वच्छ भारत मिशन’ शुरू किया। इस जन आंदोलन का बड़े पैमाने पर ऐतिहासिक प्रभाव पड़ा है। 2014 में स्वच्छता कवरेज 38त्न थी जो आज बढक़र 99त्न हो गई है। कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को खुले में शौच मुक्त घोषित किया गया है। स्वच्छ गंगा के लिए पर्याप्त उपाय किए गए हैं।विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वच्छ भारत मिशन की सराहना की और कहा कि इससे 3 लाख लोगों की जान बच सकती है। श्री मोदी का मानना है कि परिवहन परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण साधन है। इसीलिए भारत सरकार हाई-वे, रेलवे, आई-वे और वॉटर-वे के रूप में अगली पीढ़ी के बुनियादी ढाँचे को बनाने के लिए काम कर रही है। उड़े देश के आप नागरिक योजना ने उड्डयन क्षेत्र को लोगों के अधिक अनुकूल बनाया है और कनेक्टिविटी को बढ़ावा दिया है। पीएम मोदी ने भारत को अंतरराष्ट्रीय विनिर्माण पॉवर हाऊस में बदलने के लिए ‘मेक इन इंडिया’ पहल शुरू की। इस प्रयास से परिवर्तनकारी परिणाम सामने आए हैं। उदाहरण के लिए 2014 में मोबाइल विनिर्माण इकाइयों की संख्या 2 थी जो 2019 में बढक़र 122 हो गई है। भारत ने ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ में महत्वपूर्ण प्रगति की है, 2014 में भारत की रैंकिंग 142 थी 2019 में यह 77 हो गई है। 2017 में संसद के एक ऐतिहासिक सत्र के दौरान भारत सरकार ने जीएसटी लागू किया, जिसने ‘वन नेशन, वन टैक्स’ के सपने को साकार किया। उनके कार्यकाल में भारत के समृद्ध इतिहास और संस्कृति पर विशेष ध्यान दिया गया। भारत में दुनिया का सबसे बड़ा स्टैच्यू ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ बनाया गया जो सरदार पटेल को एक सच्ची श्रद्धांजलि है। इस स्टैच्यू को एक विशेष जन आंदोलन के माध्यम से बनाया गया था, जिसमें भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के किसानों के औज़ार और मिट्टी का इस्तेमाल किया गया था, जो ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को दर्शाता है। प्रधानमंत्री को पर्यावरण से जुड़े मुद्दों से गहरा लगाव है। उन्हेंने हमेशा से पाना है कि हमें एक साफ और हरा ग्रह बनाने के लिए काम करना चाहिए। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में श्री मोदी ने जलवायु परिवर्तन के अभिनव समाधान तैयार करने के लिए अलग जलवायु परिवर्तन विभाग बनाया। इस भावना को पेरिस में 2015 के शिखर सम्मेलन में भी देखा गया था जहां पीएम मोदी ने पर्यावरण से जुड़े मुद्दों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जलवायु परिवर्तन से एक कदम आगे बढक़र पीएम मोदी ने जलवायु न्याय के बारे में बात की है। 2018 में अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन के शुभारंभ के लिए कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष भारत आए थे। यह गठबंधन एक बेहतर ग्रह के लिए सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने का एक अभिनव प्रयास है। पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनके प्रयासों को स्वीकार करते हुए प्रधानमंत्री मोदी को संयुक्त राष्ट्र के ‘चैंपियंस ऑफ अर्थ अवार्ड’ से सम्मानित किया गया।जलवायु परिवर्तन ने हमारे ग्रह को प्राकृतिक आपदाओं से ग्रस्त कर दिया है, इस तथ्य के प्रति पूरी तरह से संवेदनशील होते हुए श्री मोदी ने प्रौद्योगिकी की शक्ति और मानव संसाधनों की ताकत के उचित इस्तेमाल के रूप में आपदा के लिए एक नया विजन साझा किया है । मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने 26 जनवरी 2001 को विनाशकारी भूकंप से तबाह हुए गुजरात को बदल दिया। इसी तरह उन्होंने गुजरात में बाढ़ और सूखे से निपटने के लिए नई प्रणालियों की शुरुआत की जिनकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा हुई। प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से श्री मोदी ने नागरिकों के लिए न्याय को हमेशा प्राथमिकता दी है। गुजरात में लोगों की समस्याओं को हल करने के लिए उन्होंने शाम की अदालतों की शुरुआत की। केंद्र में उन्होंने प्रो-एक्टिव गवर्नेंस एंड टाइमली इम्प्लीमेंटेशन शुरू किया जो विकास में देरी कर रहे लंबित परियोजनाओं को शीघ्र पूरा करने के लिए एक कदम है।श्री मोदी की विदेश नीति की पहल ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की वास्तविक क्षमता और भूमिका को महसूस किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने सार्क देशों के सभी प्रमुखों की उपस्थिति में अपना पहला कार्यकाल शुरू किया और दूसरे की शुरुआत में बिम्सटेक नेताओं को आमंत्रित किया। संयुक्त राष्ट्र महासभा में उनके संबोधन की दुनिया भर में सराहना हुई। प्रधानमंत्री को सऊदी अरब के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘किंग अब्दुलअजीज सैश’ से सम्मानित किया गया। श्री मोदी को रूस के शीर्ष सम्मान ‘द ऑर्डर ऑफ सेंट एंड्रयू द एपोस्टले सम्मान’, फिलिस्तीन के ‘ग्रैंड कॉलर ऑफ द स्टेट ऑफ फिलिस्तीन’ सम्मान, अफगानिस्तान के ‘अमीर अमानुल्ला खान अवॉर्ड’, यूएई के ‘जायेद मेडल’ और मालदीव के ‘निशान इज्जुद्दीन’ सम्मान से सम्मानित किया गया है। 2018 में प्रधानमंत्री मोदी को शांति और विकास में उनके योगदान के लिए प्रतिष्ठित सियोल शांति पुरस्कार दिया गया। ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ मनाने के नरेंद्र मोदी के आग्रह को संयुक्त राष्ट्र में अच्छी प्रतिक्रिया मिली। पहले दुनिया भर में कुल 177 राष्ट्रों ने एक साथ मिलकर 21 जून को संयुक्त राष्ट्र में ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ के रूप में घोषित करने का प्रस्ताव पारित किया।श्री मोदी का जन्म 17 सितंबर 1950 को गुजरात के एक छोटे से शहर में हुआ था। वे ‘अति पिछड़ा वर्ग’ परिवार से आते हैं, जो समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों में से है। वह बेहद गरीब, लेकिन प्यार देने वाले परिवार में पले बड़े। जीवन की शुरुआती कठिनाइयों ने न केवल कड़ी मेहनत के मूल्य को सिखाया बल्कि उन्हें आम लोगों के कष्टों से भी अवगत कराया। आम जन की गरीबी ने उन्हें बहुत कम उम्र में ही लोगों और राष्ट्र की सेवा में डूबने के लिए प्रेरित किया। अपने प्रारंभिक वर्षों में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ काम किया, जो राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित एक राष्ट्रवादी संगठन है और बाद में राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर भारतीय जनता पार्टी के संगठन में काम करने के लिए खुद को राजनीति में समर्पित किया। श्री मोदी ने गुजरात विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में एमए पूरा किया है।नरेंद्र मोदी लोगों के नेता हैं और वे आमजन की समस्याओं को हल करने और उनके जीवन स्तर में सुधार करने के लिए समर्पित हैं। लोगों के बीच रहने, उनके साथ खुशियाँ साझा करने और उनके दुखों को दूर करने से ज्यादा कुछ भी उनके लिए संतोषजनक नहीं है। जमीनी स्तर पर तो उनका लोगों के साथ एक मजबूत व्यक्तिगत जुड़ाव तो है ही साथ ही साथ सोशल मीडिया पर भी उनकी मजबूत उपस्थिति है। उन्हें भारत के सबसे ज्या टेक्नो सैवी नेता के रूप में भी जाना जाता है। वो लोगों तक पहुँचने और उनके जीवन में बदलाव लाने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं। वह फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, साउंड क्लाउड, लिंक्डिन, वीबो और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर बहुत सक्रिय है।राजनीति से परे नरेंद्र मोदी को लिखना पसंद है। उन्होंने कई कविता और कई किताबें लिखी हैं। वह अपने दिन की शुरुआत योग से करते हैं। योग उसके शरीर और दिमाग को मजबूत बनाता है और तेज गति चलने वाली दिनचर्या में शांति का भाव पैदा करता है।


- राकेश सैन
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Sunday, 1 September 2019

हिंदू समाज के नवजागरण का पर्व गणेशोत्सव

गणेश उत्सव केवल धार्मिक पर्व नहीं बल्कि हिंदू समाज के नवजागरण का प्रतीक व स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरक तत्व रहा है। हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों व शासकों ने इस पर्व का सदुपयोग समाज जागरण व विभिन्न हिस्सों में विभाजित समाज को एकजुट करने के लिए किया। गणेश चतुर्थी 1630-1680 के दौरान मराठा शक्ति के संस्थापक छत्रपति शिवाजी के समय में एक सार्वजनिक समारोह के रूप में मनाया जाता था। शिवाजी के समय, यह गणेशोत्सव उनके साम्राज्य के कुलदेवता के रूप में नियमित रूप से मनाना शुरू किया गया था। पेशवाओं के अंत के बाद, यह एक पारिवारिक उत्सव बना रहा, यह 1893 में महान स्वतंत्रता सेनानी व विचारक बाल गंगाधर लोकमान्य तिलक द्वारा पुनर्जीवित किया गया। गणेश चतुर्थी एक बड़ी तैयारी के साथ एक वार्षिक घरेलू त्योहार के रूप में हिंदू लोगों द्वारा मनाना शुरू किया गया। सामान्यत: यह ब्राह्मणों और गैर ब्राह्मणों के बीच संघर्ष को हटाने के साथ ही लोगों के बीच एकता लाने के लिए एक राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाना आरंभ किया गया था। महाराष्ट्र में लोगों ने ब्रिटिश शासन के दौरान बहुत साहस और राष्ट्रवादी उत्साह के साथ अंग्रेजों के क्रूर व्यवहार से मुक्त होने के लिए मनाना शुरु किया। गणेश विसर्जन की रस्म बाल गंगाधर लोकमान्य तिलक द्वारा स्थापित की गई। धीरे-धीरे लोगों द्वारा यह उत्सव परिवार के समारोह के बजाय समुदाय की भागीदारी के माध्यम से मनाना शुरू किया गया।

पौराणिक महत्त्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह माना जाता है कि गणेश जी का जन्म माघ माह में चतुर्थी हुआ था। तब से, भगवान गणेश के जन्म की तारीख गणेश चतुर्थी के रूप में मनानी शुरू की गई। आजकल, यह त्योहार पूरी दुनिया में मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी पर लंबे समय बाद इस साल कई शुभ संयोग बनेंगे। एक ओर जहां ग्रह-नक्षत्रों की शुभ स्थिति से शुक्ल और रवियोग बनेगा, वहीं सिंह राशि में चतुर्ग्रही योग भी बन रहा है। यानि सिंह राशि में सूर्य, मंगल, बुध और शुक्र एक साथ विद्यमान रहेंगे। ग्रहों और सितारों की इस शुभ स्थिति के कारण इस त्योहार का महत्व और शुभता और बड़ जाएगी। ग्रह-नक्षत्रों के इस शुभ संयोग में गणेश प्रतिमा की स्थापना करने से सुख-समृद्धि और शांति मिलेगी। दो सितंबर को गणेश चतुर्थी के साथ ही दस दिवसीय गणेशोत्सव शुरू हो जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल भाद्रपद के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी का त्योहार मनाया जाता है। इसी तिथि पर भगवान गणेश का जन्म हुआ था। गणेश चतुर्थी पर बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता भगवान गणेश की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है, लेकिन, लंबे समय बाद इस बार गणेश चतुर्थी पर दो शुभ योग और ग्रहों का शुभ संयोग बन रहा है। जिसकी वजह से गणेश चतुर्थी का महत्व बढ़ गया है। 2 सितंबर दिन सोमवार की शुरुआत हस्तनक्षत्र में होगी और गणेश प्रतिमाओं की स्थापना चित्रा नक्षत्र में की जाएगी। मंगल के इस नक्षत्र में चंद्रमा होने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। चित्रा नक्षत्र और चतुर्थी तिथि का संयोग 2 सितंबर को सुबह लगभग 8 बजे से शुरू होकर पूरे दिन रहने वाला है।

गणेश चतुर्थी पूजन
भाद्रपद्र शुक्ल की चतुर्थी ही गणेश चतुर्थी के दिन गणेश जी कि विशेष पूजा अर्चना की जाती है। इस दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत होकर भगवान श्री गणेश जी की प्रतिमा बनाई जाती है, गणेश जी की इस मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाकर षोड्शोपचार से पूजन किया जाता है तथा लडडुओं का भोग लगाया जाता है.संध्या समय पूजन करके चंद्रमा देखे बिना अघ्र्य देना चाहिए।

प्रतिमाओं की स्थापना का शुभ मुहूर्त 
गणेश चतुर्थी के दिन गणपति की पूजा दोपहर के समय करना शुभ माना जाता है, क्योंकि मान्यता है कि भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को मध्याह्न के समय गणेश जी का जन्म हुआ था। गणेश चतुर्थी पर मध्याह्न काल में अभिजित मुहूर्त के संयोग पर गणेश भगवान की मूर्ति की स्थापना करना शुभ रहेगा। पंचांग के अनुसार अभिजित मुहूर्त सुबह लगभग 11.55 से दोपहर 12.40 तक रहेगा। इसके अलावा पूरे दिन शुभ संयोग होने से सुविधा अनुसार किसी भी शुभ लग्न या चौघडिय़ा मुहूर्त में गणेश जी की स्थापना कर सकते हैं।

कलंक चौथ
गणेश चतुर्थी को कलंक चतुर्थी या कलंक चौथ भी कहा जाता है। भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन चंद्रमा का दर्शन मिथ्या कलंक देने वाला होता है। इसलिए इस दिन चंद्र दर्शन करना मना होता है। द्वारिकापुरी में सत्राजित नाम का एक सूर्यभक्त निवास करता था उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने उसे एक अमूल्य मणि प्रदान की। मणि के प्रभाव स्वरुप किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता है और राज्य आपदाओं से मुक्त हो जाता है। एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने राजा उग्रसेन को उक्त मणि प्रदान करने की बात सोची परंतु सत्राजित इस बात को जान जाता है। इस कारण वह मणि अपने भाई प्रसेन को दे देता है। परंतु जब प्रसेन वन में शिकार के लिए जाता है तो वहां सिंह के द्वारा मृत्यु को प्राप्त होता है। सिंह के मुंह में मणि देख कर जांबवंत शेर को मारकर वह मणि पा लेता है। प्रजा को जब जांबवंत के पास उस मणि होने की बात का पता चलता है तो वह इसके लिए कृष्ण को प्रसेन को मारकर मणि लेने की बात करने लगते हैं। इस आरोप का पता जब श्रीकृष्ण को लगता है तो वह बहुत दुखी होते हैं और प्रसेन को ढूंढने के लिए निकल पड़ते हैं। घने वन में उन्हें प्रसेन के मृत शरीर के पास में सिंह एवं जाम्बवंत के पैरों के निशान दिखाई पड़ते हैं। वह जाम्बवंत के पास पहुँच कर उससे मणि उसके पास होने का कारण पूछते हैं तब जांबवंत उन्हें सारे घटना क्रम की जानकारी देता है। जाम्बवंत अपनी पुत्री जाम्बवती का विवाह श्रीकृष्ण से कर देता है और उन्हें स्यमंतक मणि प्रदान करता है। प्रजा को जब सत्य का पता चलता है तो वह श्री कृष्ण से क्षमा याचना करती है। यद्यपि यह कलंक मिथ्या सिद्ध होता है परन्तु इस दिन चांद के दर्शन करने से भगवान श्री कृष्ण को भी मणि चोरी का कलंक लगा था और श्रीकृष्ण जी को अपमान का भागी बनना पड़्ता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि गणेश चतुर्थी पर्व का महत्त्व केवल पौराणिक ही नहीं बल्कि एतिहासिक भी है जो हिंदू शक्ति के पुनर्जागरण का प्रतीक है।

- राकेश सैन
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Wednesday, 7 August 2019

धारा 370 का उन्मूलन सेतुबंध सरीखा

समुद्र पर सेतु बांध दिया? भौंचक रावण विश्वास नहीं कर पा रहा था अपने विश्वसनीय गुप्तचरों द्वारा लाई गई सूचना पर। चारों ओर समुद्र से घिरी अभेद्य किले सी लंका में बैठा दशानन अभी तक यही सोचता था कि वह कैसा भी अपराध कर ले उसे कोई छूने वाला नहीं। वह बार-बार खुद को चिकोटी काटता, कभी बड़बड़ाता और पूछता कि कहीं सिंधूराज को भी नकेला जा सकता है? आज वैसा ही विस्मय उन ताकतों को हो रहा होगा जो सोचती रही कि विवश और विभाजित भारतीय राजनीतिक व्यवस्था जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को छू नहीं सकती। जितना सन्न पाकिस्तान-अमेरिका  है उससे अधिक वो हमारे लोग जो धमकी देते थे कि इस धारा को छूआ तो केवल हाथ नहीं बल्कि पूरा शरीर जल जाएगा। लेकिन केवल धारा 35-ए व 370 ही नहीं हटी बल्कि जम्मू-कश्मीर राज्य का पुनर्गठन भी हुआ, सेतुबांधा गया और गिरयाने वाले सन्निपातग्रस्त दिख रहे हैं।

केवल घरेलू परिपेक्ष ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भी भारत लाभ वाली स्थिति में आगया है। वर्तमान हालातों में पड़ौसी देश के साथ-साथ पूरी दुनिया को यह संदेश देना आवश्यक हो गया था कि जम्मू-कश्मीर को भारत अपना अभिन्न अंग कहता मात्र नहीं बल्कि मानता भी है। सभी जानते हैं कि अफगानिस्तान में बुरी तरह फंसा अमेरिका वापसी के लिए तड़प रहा है और संभव है कि इस काम के लिए उसे पाकिस्तान की ही सर्वाधिक जरूरत महसूस हो। या शेख अपनी-अपनी देख की नीति पर चलने वाला अमेरिका इमरान खान को खुश करने के लिए जम्मू-कश्मीर को लेकर कोई ऐसी नीति अपना सकता है जो भविष्य में भारत के लिए मुसीबत साबित हो। अभी हाल ही में इमरान के अमेरिका दौरे के दौरान वहां के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कश्मीर को लेकर मध्यस्थता का शिगूफा भी छोड़ा जिससे भारतीय नीति निर्माताओं के कान खड़े होने स्वभाविक है। भारत समझ गया कि अब हाथ पर हाथ धर कर बैठने का समय नहीं है। इस कदम से भारत ने अमेरिका-पाक  की जोड़ी को संदेश दे दिया है कि कश्मीर उसकी कमजोर रग नहीं कि जिसे दबा कर भारत की भूमिका को अफगानिस्तान में नगण्य कर दिया जाए। भारत ने अफगानिस्तान में अब तक लगभग 25 हजार करोड़ रु. खर्च किए हैं। भारत ने अफगानिस्तान में क्या-क्या नहीं बनाया है ? बिजलीघर, बिजली की लंबी-लंबी लाइनें, कई बांध, कई नहरें, कई स्कूल, कई पंचायत घर। सबसे बड़ा निर्माण कार्य हुआ है, ईरान और अफगानिस्तान को सीधे सड़क से जोडऩे का। जरंज-दिलाराम सड़क 218 किमी लंबी है। इस पर भारत ने अरबों रु. खर्च किया है। इस सड़क ने अफगानों की 200 साल पुरानी मजबूरी को खत्म किया। उसे अब अपने यातायात और आवागमन के लिए पाकिस्तान पर निर्भर रहने की जरुरत नहीं है। अफगानिस्तान में हमारे हजारों डॉक्टरों, इंजीनियरों, शिक्षकों, पत्रकारों, अफसरों और विशेषज्ञों ने पिछले 70 साल में इतना जबर्दस्त योगदान किया है कि वहां के कट्टरपंथी लोग भी भारत की तारीफ किये बिना नहीं रहते। अमेरिका की अनुपस्थिति में पाकिस्तान खतरनाक तालिबानियों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ कर सकता है। ऐसे में भारत कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता कि अफगानिस्तान को लेकर बनने वाली किसी भी योजना में उसकी अनदेखी हो और वह भी जम्मू-कश्मीर को आड़ बना कर। सीधे शब्दों में कहें कि धारा 370 के उन्मूलन के बाद नई परिस्थितियों में अब अमेरिका कौन सा लालच देकर पाकिस्तान से अफगानिस्तान पर मदद मांगेगा।

पूर्व विदेश सचिव श्री कंवल सिब्बल के अनुसार, पाकिस्तान का सुन्न हो जाना इसलिए भी स्वाभाविक है, क्योंकि यह कदम कश्मीर पर भारत-पाक वार्ता की रूपरेखा को पूरी तरह से बदलेगा। देखने में आया है कि द्विपक्षीय संबंधों को बनाए रखने के लिए भारत ने लंबे अरसे से कश्मीर पर रक्षात्मक रुख अपनाया है। नई दिल्ली ने इसके लिए जम्मू-कश्मीर से जुड़े सभी लंबित मुद्दों पर बातचीत करने की हामी भरी और आतंकवाद को भी बर्दाश्त किया लेकिन अब, जब देश में कश्मीर की घरेलू स्थिति पूरी तरह से बदल गई,अब यह केंद्र शासित प्रदेश बन गया है, लद्दाख को भी इससे अलग कर दिया गया है, तब कश्मीर मसले पर पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय बातचीत का आधार ही खत्म हो गया है। अब पाक अधिकृत कश्मीर पर दावे को छोड़कर कोई लंबित मामला नहीं बचा। इसी पाक-अधिकृत कश्मीर में गिलगित और बाल्टिस्तान भी शामिल हैं। अब कश्मीर मसले के हल के लिए किसी पिछले दरवाजे की जरूरत भी खत्म हो गई है।  

विदेश मामलों के विशेषज्ञ मानते हैं कि कुछ मोर्चों पर भारत को अभी सावधान रहने की आवश्यकता है। राजनीतिक हताशा और घरेलू दबाव में पाकिस्तान भारत के इस फैसले का अंतरराष्ट्रीयकरण जरूर करेगा। लेकिन पाकिस्तान के विकल्पों पर यदि गौर करें, तो वह हमारे खिलाफ सिर्फ दुष्प्रचार कर सकता है। भारत के फैसले के विरोध की आग को भड़काने और जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ाने का काम वह कर सकता है। हालांकि यह उसके लिए जोखिम भरा कदम होगा, क्योंकि जम्मू-कश्मीर में यदि वह जेहाद भड़काने की कोशिश करेगा, तो भारत न सिर्फ जवाबी कार्रवाई करेगा, बल्कि आतंकी फंडिंग रोकने के लिए बनी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स में भी उस पर दबाव बना सकता है, जिससे पाकिस्तान की आर्थिक सेहत और खराब हो सकती है। पाकिस्तान के हालात बताते हैं कि वह और सर्जीकल स्ट्राईक व बालाकोट जैसी कार्रवाई को सहन नहीं कर पाएगा। पाकिस्तान इस मसले को संयुक्त राष्ट्र ले जा सकता है, मगर हमारे यहां संविधानिक स्थिति को बदलने संबंधी भारतीय कानून में किसी तरह का बदलाव अंतरराष्र्ट्रीय मामला नहीं है। इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र के किसी प्रस्ताव में अनुच्छेद-370 का जिक्र नहीं है। इसे संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के महीनों बाद भारतीय संविधान में जोड़ा गया था, इसीलिए अपनी पहल से इसे हटाने या बदलाव करने का अधिकार भी भारत को ही है।

पिछले सत्तर सालों से भारतीया नेता कश्मीर को अपना अभिन्न अंग कहते आरहे हैं परंतु उक्त विवादित धाराओं का संविधान से हटा कर मोदी सरकार ने कश्मीरियों को भी यह कहने का गौरव प्रदान कर दिया है कि भारत उनका अभिन्न अंग है। अभी तक यह रिश्ता एकतरफा सा था और इस राज्य के भारत में पूर्ण विलय के मार्ग में ये धाराएं अघोषित बाधा सरीखी थीं जिन्हें भारत की वर्तमान सरकार ने रुग्ण अंग की तरह संविधान से काट फेंका है।   इस बात की पूरी संभावना है कि जम्मू-कश्मीर का शेष भारत के साथ सेतुबंध रामायणकालीन रामसेतु की भांति कल्याणकारी व देश को सुदृढ़ करने वाला होगा।

- राकेश सैन
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Tuesday, 30 July 2019

अद्वितीय क्रांतिकारी शहीद उधम सिंह

देश में जब अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी तो बंगाल, अवध प्रांत के साथ-साथ पंजाब भी क्रांतिकारियों का गढ़ बन कर उभरा। यहां जन्मे वीर सपूतों ने अहिंसा के साथ-साथ क्रांतिकारी माध्यमों से देश के स्वतंत्रता संग्राम में इस कदर अमूल्य योगदान दिया कि अंग्रेजों को अंतत: 1947 को अपना बोरिया बिस्तर बांध कर जाने को मजबूर होना पड़ा। पंजाब के वीर सपूतों का नाम लें तो अनायस ही शहीद उधम सिंह की स्मृति हो आती है जिन्होंने विदेश में जाकर भारतीयों के खूनखराबे का बदला लिया और खूनी अंग्रेज अफसर के खून से मारे गए बेकसूर लोगों का तर्पण किया। उधम सिंह की बचपन अत्यंत दयनीय हालत में गुजरा परंतु जलियांवाला बाग के नरसंहार ने उनके जीवन की दशा और दिशा दोनो बदल डाली।
जैसा कि सभी जानते हैं कि साल 1919 बैसाखी का दिन था। पंजाब के अमृतसर में हजारों की तादाद में लोग एक पार्क में जमा हुए थे। रॉलेट एक्ट के तहत कांग्रेस के सत्यपाल और सैफूद्दीन किचलू को अंग्रेजों ने अरेस्ट कर लिया था। लोग वहां दोनों की गिरफ्तारी के खिलाफ शांति से प्रोटेस्ट कर रहे थे। जनरल डायर अपनी फौज के साथ वहां आ धमका और घेर लिया पूरे बाग को, उसने न तो प्रदर्शनकारियों को जाने के लिए कहा और न ही कोई वार्निंग दी। डायर ने बस एक काम किया. अपनी फौज को फायरिंग करने का ऑर्डर दिया। फिर शुरू हुआ नरसंहार, अंग्रेज उन मासूम लोगों पर दनादना गोलियां चलाने। उस फायरिंग में बहुत लोगों की जानें गईं। बाग का इकलौता गेट अंग्रेजों ने बंद कर रखा था। लोग बचने के लिए पार्क की दीवार पर चढऩे लगे। कुछ जान बचाने के लिए कुएं में कूद गए। गोरों की इस हरकत से सब खिसियाए बैठे थे, पर इस घटना से एक इंसान था, जो इतना ज्यादा गुस्साया कि उसने जनरल डायर को मार डालने का मन बना लिया। ये थे सरदार उधम सिंह, जिन्होंने विदेश में जाकर अपने भारतीय बहन भाईयों के खून का बदला लिया और पूरी दुनिया में भारतीय शौर्य की धाक जमा डाली।
सरदार उधम सिंह 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव में पैदा हुए। इनके पिता सरदार टहल सिंह जम्मू उपल्ली गांव में रेलवे चौकीदार थे। पिता ने इनको नाम दिया शेर सिंह। इनके एक भाई भी थे, सात साल की उम्र में उधम अनाथ हो गए। पहले मां चल बसीं और उसके 6 साल बाद पिता। मां-बाप के मरने के बाद दोनों को अमृतसर के सेंट्रल खालसा अनाथालय में रखवा दिया गया। वहां लोगों ने दोनों भाइयों को नया नाम दिया, शेर सिंह बन गए उधम सिंह और मुख्तार सिंह बन गए साधु सिंह। अदालती कार्रवाई के दौरान सरदार उधम सिंह ने भारतीय समाज की एकता के लिए अपना नाम राम मोहम्मद सिंह आजाद बताया जो भारत के तीन प्रमुख धर्मों का प्रतीक है। साल 1917 में साधु की भी मौत हो गई। 1918 में उधम ने मैट्रिक के एग्जाम पास किए। साल 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया। उधम सिंह के सामने ही 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग नरसंहार हुआ था। उन्होंने अपनी आंखों से डायर की करतूत देखी थी। वे गवाह थे, उन हजारों बेनामी भारतीयों की हत्या के, जो जनरल डायर के आदेश पर गोलियों के शिकार हुए थे। यहीं पर उधम सिंह ने जलियांवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर जनरल डायर और तत्कालीन पंजाब के गर्वनर माइकल ओ’ ड्वायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ले ली. इसके बाद वो क्रांतिकारियों के साथ शामिल हो गए। सरदार उधम सिंह क्रांतिकारियों से चंदा इक_ा कर देश के बाहर चले गए। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका, जिम्बॉब्वे, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा कर क्रांति के लिए खूब सारे पैसे इक_ा किए। इस बीच देश के बड़े क्रांतिकारी एक-एक कर अंग्रेजों से लड़ते हुए जान देते रहे। ऐसे में उनके लिए आंदोलन चलाना मुश्किल हो रहा था। पर वो अपनी प्रतीज्ञा को पूरी करने के लिए मेहनत करते रहे। उधम सिंह के लंदन पहुंचने से पहले जनरल डायर बीमारी के चलते मर गया था। ऐसे में उन्होंने अपना पूरा ध्यान माइकल ओ’ ड्वायर को मारने पर लगाया और उसे पूरा किया।
उधम सिंह को भगत सिंह बहुत पसंद थे. उनके काम से उधम बहुत पसंद थे। भगत सिंह को वो अपना गुरु मानते थे। साल 1935 में जब वो कश्मीर गए थे। वहां उधम को भगत सिंह के पोट्रेट के साथ देखा गया। इन्हे देशभक्ति पूर्ण गाने गाना बहुत अच्छा लगता था। रामप्रसाद बिस्मिल से भी बहुत प्रभावित थे। कुछ महीने कश्मीर में रहने के बाद वो विदेश चले गए। सरदार उधम सिंह जलियांवाला बाग नरसंहार से आक्रोशित थे। इस आक्रोश का निशाना बना उस नरसंहार के वक्त पंजाब का गवर्नर रहा माइकल फ्रेंसिस ओ’ ड्वायर। 13 मार्च, 1940 को रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हॉल में बैठक थी. वहां माइकल ओ’ ड्वायर भी स्पीकर में से एक था। उधम सिंह उस दिन टाइम से वहां पहुंच गए। अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा रखी थी। उन्होंने किताब के पन्नों को रिवॉल्वर के शेप में काट लिया था और बक्से जैसा बनाया। उससे उनको हथियार छिपाने में आसानी हुई। बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओ’ ड्वायर को निशाना बनाया। दो गोलियां लगी जिससे उसकी तुरंत मौत हो गई। इसके साथ ही उधम सिंह ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की और दुनिया को संदेश दिया कि अत्याचारियों को भारतीय वीर कभी छोड़ा नहीं करते। उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की और गिरफ्तार हो गए। जज ने सवाल दागा कि वह ओ’ ड्वायर के अलावा उसके दोस्तों को क्यों नहीं मारा। उधम सिंह ने जवाब दिया कि वहां पर कई औरतें थीं और हमारी संस्कृति में औरतों पर हमला करना पाप है। इसके बाद उधम को शहीद-ए-आजम की उपाधि दी गई, जो सरदार भगत सिंह को शहादत के बाद मिली थी। 4 जून, 1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया। 31 जुलाई, 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई। इस तरह उधम सिंह भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास में अमर हो गए। 1974 में ब्रिटेन ने उनके अवशेष भारत को सौंप दिए। अंग्रेजों को अंग्रेजों के घर में घुसकर मारने का जो काम सरदार उधम सिंह ने किया था, उसकी हर जगह तारीफ हुई। जिसने देश के अंदर क्रांतिकारी गतिविधियों को एकाएक तेज कर दिया। सरदार उधम सिंह के इस महाबदले की कहानी आंदोलनकारियों को प्रेरणा देती रही। इसके बाद की तमाम घटनाओं को सब जानते हैं। अंग्रेजों को 7 साल के अंदर देश छोडऩा पड़ा और हमारा देश आजाद हो गया। उधम सिंह जीते जी भले आजाद भारत में सांस न ले सके, पर करोड़ों हिंदुस्तानियों के दिल में रहकर वो आजादी को जरूर महसूस कर रहे होंगे।
- राकेश सैन
32, खण्डाला फार्मिंग कालोनी
वीपीओ लिदड़ां, 
जालंधर।

Thursday, 25 July 2019

भारत दूत: कारगिल युद्ध, भारतीय सेना ने असंभव को संभव किया

भारत दूत: कारगिल युद्ध, भारतीय सेना ने असंभव को संभव किया: कारगिल युद्ध के बाद दुनिया के अनेक रक्षा विशेषज्ञों व सामरिक रणननीतिकारों ने इस इलाके का दौरा किया। इन सभी ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि...

कारगिल युद्ध, भारतीय सेना ने असंभव को संभव किया

कारगिल युद्ध के बाद दुनिया के अनेक रक्षा विशेषज्ञों व सामरिक रणननीतिकारों ने इस इलाके का दौरा किया। इन सभी ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि भारत यह लड़ाई जीत कैसे गया। भुगौलिक स्थिति के अनुसार तो उसे हर कीमत पर लड़ाई हारनी थी परंतु उसने असंभव को संभव करके कैसे दिखाया। यह ठीक है कि सबसे ऊंचाई पर लड़े जाने वाले दुनिया के तीसरे इस तरह के युद्ध में भारतीय सेना ने अत्यंत विपरीत हालातों को बावजूद अपने से हजारों फीट ऊपर बैठे दुश्मनों को न केवल मार भगाया बल्कि भारी जन हानि भी की।

या तो तू युद्ध में बलिदान देकर स्वर्ग को प्राप्त करेगा अथवा विजयश्री प्राप्त कर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। गीता के इसी श्लोक को प्रेरणा मानकर भारत के शूरवीरों ने कारगिल युद्ध में दुश्मन को पाँव पीछे खींचने के लिए मजबूर कर दिया था। 26 जुलाई 1999 के दिन भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध के दौरान चलाए गए ‘ऑपरेशन विजय’ को सफलतापूर्वक अंजाम देकर भारत भूमि को घुसपैठियों के चंगुल से मुक्त कराया था। इसी की याद में ‘26 जुलाई’ अब हर वर्ष कारगिल दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन है उन शहीदों को याद कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण करने का, जो हँसते-हँसते मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। यह दिन समर्पित है उन्हें, जिन्होंने अपना आज हमारे कल के लिए बलिदान कर दिया। कारगिल युद्ध जो कारगिल संघर्ष के नाम से भी जाना जाता है, भारत और पाकिस्तान के बीच 1999 में मई के महीने में कश्मीर के कारगिल जिले से प्रारंभ हुआ था। इस युद्ध का कारण था बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों व पाक समर्थित आतंकवादियों का लाइन ऑफ कंट्रोल यानी भारत-पाकिस्तान की वास्तविक नियंत्रण रेखा के भीतर प्रवेश कर कई महत्वपूर्ण पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लेह-लद्दाख को भारत से जोडऩे वाली सडक़ का नियंत्रण हासिल कर सियाचिन-ग्लेशियर पर भारत की स्थिति को कमजोर कर हमारी राष्ट्रीय अस्मिता के लिए खतरा पैदा करना। पूरे दो महीने से ज्यादा चले इस युद्ध में भारतीय थलसेना व वायुसेना ने लाइन ऑफ कंट्रोल पार न करने के आदेश के बावजूद अपनी मातृभूमि में घुसे आक्रमणकारियों को मार भगाया था। स्वतंत्रता का अपना ही मूल्य होता है, जो वीरों के रक्त से चुकाया जाता है। इस युद्ध में हमारे लगभग 527 से अधिक वीर योद्धा शहीद व 1300 से ज्यादा घायल हो गए, जिनमें से अधिकांश अपने जीवन के 30 वसंत भी नही देख पाए थे। इन शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह किया, जिसकी सौगन्ध हर सिपाही तिरंगे के समक्ष लेता है। इन रणबाँकुरों ने भी अपने परिजनों से वापस लौटकर आने का वादा किया था, जो उन्होंने निभाया भी, मगर उनके आने का अन्दाज निराला था। वे लौटे, मगर लकड़ी के ताबूत में। उसी तिरंगे मे लिपटे हुए, जिसकी रक्षा की सौगन्ध उन्होंने उठाई थी। जिस राष्ट्रध्वज के आगे कभी उनका माथा सम्मान से झुका होता था, वही तिरंगा मातृभूमि के इन बलिदानी जाँबाजों से लिपटकर उनकी गौरव गाथा का बखान कर रहा था।

कैप्टन विक्रम बत्रा : ‘ये दिल माँगे मोर’ - हिमाचल प्रदेश के छोटे से कस्बे पालमपुर के 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स के कैप्टन विक्रम बत्रा उन बहादुरों में से एक हैं, जिन्होंने एक के बाद एक कई सामरिक महत्व की चोटियों पर भीषण लड़ाई के बाद फतह हासिल की थी। यहाँ तक कि पाकिस्तानी लड़ाकों ने भी उनकी बहादुरी को सलाम किया था और उन्हें ‘शेरशाह’ के नाम से नवाजा था। मोर्चे पर डटे इस बहादुर ने अकेले ही कई शत्रुओं को ढेर कर दिया। सामने से होती भीषण गोलीबारी में घायल होने के बावजूद उन्होंने अपनी डेल्टा टुकड़ी के साथ चोटी नं. 4875 पर हमला किया, मगर एक घायल साथी अधिकारी को युद्धक्षेत्र से निकालने के प्रयास में माँ भारती का लाड़ला विक्रम बत्रा 7 जुलाई की सुबह शहीद हो गया। अमर शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा को अपने अदम्य साहस व बलिदान के लिए मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैनिक पुरस्कार ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।

कैप्टन अनुज नायर : 17 जाट रेजिमेंट के बहादुर कैप्टन अनुज नायर टाइगर हिल्स सेक्टर की एक महत्वपूर्ण चोटी ‘वन पिंपल’ की लड़ाई में अपने 6 साथियों के शहीद होने के बाद भी मोर्चा सम्भाले रहे। गम्भीर रूप से घायल होने के बाद भी उन्होंने अतिरिक्त कुमुक आने तक अकेले ही दुश्मनों से लोहा लिया, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय सेना इस सामरिक चोटी पर भी वापस कब्जा करने में सफल रही। इस वीरता के लिए कैप्टन अनुज को मरणोपरांत भारत के दूसरे सबसे बड़े सैनिक सम्मान ‘महावीर चक्र’ से नवाजा गया।

लेफ्टिनेंट मनोज पांडेय : गोरखा राइफल्स के लेफ्टिनेंट मनोज पांडेय की बहादुरी की इबारत आज भी बटालिक सेक्टर के ‘जुबार टॉप’ पर लिखी है। अपनी गोरखा पलटन लेकर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में ‘काली माता की जय’ के नारे के साथ उन्होंने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए। अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में ल?ते हुए मनोज पांडेय ने दुश्मनों के कई बंकर नष्ट कर दिए। गम्भीर रूप से घायल होने के बावजूद मनोज अंतिम क्षण तक लड़ते रहे। भारतीय सेना की ‘साथी को पीछे ना छोडने की परम्परा’ का मरते दम तक पालन करने वाले मनोज पांडेय को उनके शौर्य व बलिदान के लिए मरणोपरांत ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।

कैप्टन सौरभ कालिया : भारतीय वायुसेना भी इस युद्ध में जौहर दिखाने में पीछे नहीं रही, टोलोलिंग की दुर्गम पहाडियों में छिपे घुसपैठियों पर हमला करते समय वायुसेना के कई बहादुर अधिकारी व अन्य रैंक भी इस लड़ाई में दुश्मन से लोहा लेते हुए शहीद हुए। सबसे पहले कुर्बानी देने वालों में से थे कैप्टन सौरभ कालिया और उनकी पैट्रोलिंग पार्टी के जवान। घोर यातनाओं के बाद भी कैप्टन कालिया ने कोई भी जानकारी दुश्मनों को नहीं दी।

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा : स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा का विमान भी दुश्मन गोलीबारी का शिकार हुआ। अजय का लड़ाकू विमान दुश्मन की गोलीबारी में नष्ट हो गया, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और पैराशूट से उतरते समय भी शत्रुओं पर गोलीबारी जारी रखी और लड़ते-लड़ते शहीद हो गए। फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता इस युद्ध में पाकिस्तान द्वारा युद्धबंदी बनाए गए। वीरता और बलिदान की यह फेहरिस्त यहीं खत्म नहीं होती। भारतीय सेना के विभिन्न रैंकों के लगभग 30,000 अधिकारी व जवानों ने ऑपरेशन विजय में भाग लिया। युद्ध के पश्चात पाकिस्तान ने इस युद्ध के लिए कश्मीरी आतंकवादियों को जिम्मेदार ठहराया था, जबकि यह बात किसी से छिपी नहीं थी कि पाकिस्तान इस पूरी लड़ाई में लिप्त था।

- राकेश सैन
32, खण्डाला फार्मिंग कालोनी
वीपीओ लिदड़ां, 
जालंधर।

Tuesday, 16 July 2019

जड़ों की खोज में युवा पाकिस्तानी

लहू को लहू पुकार रहा है। हमारे पड़ौसी देश पाकिस्तान ने गौरी, गजनी, खिलजी, बाबर, औरंगजेब जैसे बर्बर नायक अपनी नस्लों को खूब घोंट-घोंट कर पिलाए परंतु वहां की युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से जुडऩे को बेताब दिख रही है। अभी-अभी लाहौर में महान शासक महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा लगाने और उन्हें 'शेर-ए-पंजाब' की उपाधि देने के बाद सिंध प्रांत में राजा दाहिर को भी सरकारी तौर पर नायक घोषित करने की मांग ने जोर पकड़ लिया है। आधुनिक शिक्षा और सूचना तकनोलोजी से लैस युवा पाकिस्तान पूछ रहा है हमारे नायक कौन हैं? उक्त बर्बर आक्रांताओं से पहले हमारे इस इलाके का क्या इतिहास था? अपनी जड़ों को तलाशती युवा पीढ़ी कट्टरवाद से ऊपर उठ अपना इतिहास जानने को न केवल ललायित बल्कि उससे जुडऩे को भी बेताब दिखाई दे रही है। तभी तो लाहौर में महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा की स्थापना के बाद सोशल मीडिया पर परस्पर बधाई दी जा रही है। बीबीसी लंदन की एक रिपोर्ट के अनुसार, क्वेटा शहर के पत्रकार जावेद लंगाह ने फेसबुक पर लिखा है कि, आखिरकार राजा रणजीत सिंह बादशाही मस्जिद के दक्षिण पूर्व स्थित अपनी समाधि से निकलकर शाही किले के सामने घोड़े पर सवार होकर अपनी पिछली सल्तनत और राजधानी में फिर से हाजिर हो गए हैं। उन्होंने आगे लिखा है कि पंजाब दशकों तक अपने असल इतिहास को झुठलाता रहा है और एक ऐसा काल्पनिक इतिहास गढऩे की कोशिश में जुटा रहा जिसमें वो राजा पोरस और रणजीत सिंह समेत असली राष्ट्रीय नायकों और सैकड़ों किरदारों की जगह गौरी, गजनवी, सूरी और अब्दाली जैसे नए नायक बनाकर पेश करता रहा जो पंजाब समेत पूरे उपमहाद्वीप का सीना चाक करके यहां के संसाधन लूटते रहे। दरम खान नाम के एक युवा ने फेसबुक पर लिखा कि अब वक्त आ गया है कि पाकिस्तान में बसने वाली तमाम कौमों के बच्चों को स्कूलों में सच बताया जाए और उन्हें अरब और मुगल इतिहास की बजाय अपना खुद का इतिहास पढ़ाया जाए। केवल यही दो युवा नहीं बल्कि इस तरह की प्रतिक्रिया देने वालों का तांता सा लगा हुआ है। एक पाकिस्तानी पत्रकार निसार खोखर पंजाब की जनता को संबोधित करते हुए लिखते हैं कि अगर सिंध सरकार एक ऐसी ही प्रतिमा सिंधी शासक राजा दाहिर की लगा दे तो आपको ग़ुस्सा तो नहीं आएगा, कुफ्र और गद्दारी के फतवे तो जारी नहीं होंगे? उक्त रिपोर्ट के अनुसार, सिंध की कला और संस्कृति को सुरक्षित रखने वाले संस्थान सिंध्यालॉजी के निदेशक डॉक्टर इसहाक समीजू भी राजा दाहिर को सिंध का राष्ट्रीय नायक करार दिए जाने की हिमायत करते हैं। उनका कहना है कि हर कौम को ये हक हासिल है कि जिन भी किरदारों ने अपने देश की रक्षा के लिए जान की बाजी लगाई, उनको श्रद्धांजलि दी जाए। सोशल मीडिया पर राजा दाहिर के पक्ष में अनेक पाकिस्तानी बुद्धिजीवी, पत्रकार व युवा उठ खड़े हुए हैं।

वैसे सिंधियों का कश्मीरी पंडित राजा दाहिर के प्यार कोई नया नहीं है। आम सिंधी दाहिर को अपना नायक मानता है न कि सिंध पर हमला करने वाले मोहम्मद बिन कासिम को। हालांकि पाकिस्तान के इतिहास व पाठ्यपुस्तकों में कासिम को नायक बनाने के प्रयास हुए परंतु सिंधियों के राष्ट्रप्रेम के चलते यह अभी तक असफल ही रहे हैं। कराची सहित सिंध के अनेक शहरों में राजा दाहिर को लेकर अनेक सांस्कृतिक संगठन सक्रिय हैं और इस्लामिक कट्टरवाद की आंधी में भी सच्चाई की शमां रोशन किए हुए हैं। वरुण देवता के अवतार झूलेलाल आज भी सिंधी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं और सूफी परंपरा में उन्हें विशेष सम्मान हासिल है। राजा दाहिर आठवीं सदी ईस्वी में सिंध के शासक थे। वो राजा चच के सबसे छोटे बेटे और कश्मीरी ब्राह्मण वंश के आखिरी शासक थे। सिंधियाना इंसाइक्लोपीडिया के मुताबिक हजारों वर्ष पहले कई कश्मीरी ब्राह्मण वंश सिंध आकर बस गए।  चच सिंध के पहले ब्राह्मण सम्राट बने। उनके बेटे राजा दाहिर का शासन पश्चिम में मकरान तक, दक्षिण में अरब सागर और गुजरात तक, पूर्व में मौजूदा मालवा के केंद्र और राजपूताने तक और उत्तर में मुल्तान से गुजरकर दक्षिणी पंजाब तक फैला थी। पाकिस्तानी इतिहासकार मुमताज पठान अपनी पुस्तक तारीख़-ए-सिंध में लिखते हैं कि राजा दाहिर इंसाफ-पसंद थे। तीन तरह की अदालतें थीं, जिन्हें कोलास, सरपनास और गनास कहा जाता था, बड़े मु़कदमे राजा के पास जाते थे जो सर्वोच्च न्यायिक अधिकारी का दर्जा रखते थे। आठवीं सदी में बगदाद के गवर्नर हुज्जाज बिन यूसुफ के आदेश पर उनके भतीजे मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर हमला करके राजा दाहिर को शिकस्त दी और यहां अपनी रियासत कायम की। राजा दाहिर की हार के बाद उनकी दो बेटियों सूरज और परमाल को खलीफा के पास भेज दिया गया। एक रात दोनों को खलीफा के हरम में बुलाया गया। खलीफा उनकी ख़ूबसूरती देखकर दंग रह गया परंतु लड़कियों ने कहा, बादशाह सलामत रहें, मैं बादशाह की काबिल नहीं क्योंकि आदिल इमादुद्दीन मोहम्मद बिन कासिम उनकी पवित्रता भंग कर चुका है। इस पर खलीफा वलीद बिन अब्दुल मालिक, कासिम से बहुत नाराज हुआ और कासिम को बैल की खाल में बंद करवा कर दरबार में पेश किया गया। दम घुटने से कासिम की रास्ते में ही मौत हो गई। इस तरह सूरज-परमाल ने अपने देश के लुटेरे को सबक सिखा दिया और खुद आत्महत्या कर अपनी इज्जत बचा ली। एक पाकिस्तानी नागरिक जीएम सैय्यद ने लिखा है कि हर एक सच्चे सिंधी को राजा दाहिर पर फख्र होना चाहिए क्योंकि वो सिंध के लिए सिर का नजराना पेश करने वालों में से सबसे पहले हैं। राष्ट्रवादी विचारधारा के समर्थक इस विचार को सही करार देते हैं जबकि कुछ मोहम्मद बिन कासिम को अपना हीरो और उद्धारक समझते हैं। इस वैचारिक बहस ने सिंध में दिन मनाने की भी बुनियाद डाली जब धार्मिक रुझान रखने वालों ने मोहम्मद बिन कासिम दिवस मनाया और राष्ट्रवादियों ने राजा दाहिर दिवस मनाने का आगाज किया।

केवल महाराजा रणजीत सिंह व राजा दाहिर ही नहीं बल्कि भगवान श्रीराम के पुत्र लव-कुश द्वारा बसाए गए लाहौर, भरत के पुत्र तक्ष द्वारा बसाई तक्षिला, स्वयंभू विश्वविजेता सिकंदर की सेना के दांत खट्टे करने वाले पोरस को लेकर भी पाकिस्तान की नई पीढ़ी में आकर्षण है। युवा जानना चाहते हैं कि 14 अगस्त, 1947 से पहले वे कौन थे, उनका देश कौनसा था ? कासिम, बाबर, गजनी-गौरी बाहर से आए थे तो उनके अपने कौन थे? उनकी रगों में किसका खून बह रहा है। लगता है कि मुस्लिम लीग की दो राष्ट्रों पर आधारित कृत्रिम इस्लामिक राष्ट्रीयता दम तोडऩे लगी है और लहू को लहू पुकार रहा है। कहा भी गया है- 'इक सूरत के कैसे हो सकते हैं दो बेगाने, आंखें पहचान रही थी अब तो दिल भी पहचाने।' पाकिस्तान की नई पीढ़ी की सोच में आरहे बदलाव का स्वागत होना चाहिए। जिस दिन पाकिस्तान की जनता अपनी जड़ों से जुड़ेगी उस दिन भारत-पाक की दुरियों व कटुताओं का स्वत: अंत हो जाएगा।
- राकेश सैन
32, खण्डाला फार्मिंग कालोनी,
वीपीओ लिदड़ां,
जालंधर।
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कांग्रेस और खालिस्तान में गर्भनाल का रिश्ता

माँ और सन्तान के बीच गर्भनाल का रिश्ता ही ऐसा होता है, कि प्रसव के बाद शरीर अलग होने के बावजूद भी आत्मीयता बनी रहती है। सन्तान को पीड़ा हो त...