Sunday, 25 February 2018

भारतीय अर्थचिंतन, संयुक्त परिवार-संपन्नता का द्वार

साधारण बुद्धि कहती है सांझे परिवार से दूर रहो अकेले जीयो-घी पीयो। मैं, मेरे बच्चे और मेरा नाथा बाकियों का फोड़ माथा। कमाऊं मैं मौज उड़ाएं सभी, इससे अच्छा मैं अपने बच्चों के लिए क्यों न जोड़ूं। बस यहीं गलती हो रही है, ताजा विश्लेषण बताते हैं कि एकल परिवार आर्थिक मंदी का शिकार हो रहे हैं जबकि संयुक्त परिवार संपन्नता का द्वार बनते जा रहे हैं। यह संयुक्त परिवारिक व्यवस्था ही थी जिसके चलते भारत ने संपन्नता के चरम को छूआ था।

'ए न्यू पैराडाइम आफ डिवेल्पमेंट-सुमंगलम्' पुस्तक के लेखक, प्रसिद्ध चिंतक व अर्थशास्त्री डा. बजरंग लाल गुप्ता बताते हैं कि यह परिवार का भाव ही है जो व्यक्ति को आर्थिक रूप से अनुशासित करता है। अपने देश में सरकार की छोटी-बड़ी बचत की योजनाओं में निवेश करने वाले लगभग 70 प्रतिशत लोग संयुक्त परिवारों से ही संबंधित हैं। देखने में आता है कि एकल और विभाजित परिवार आर्थिक रूप से स्वच्छंद हो जाता है और कई बार उसे नए घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिक धन भी खर्च करना पड़ता है। केवल इतना ही नहीं एकल परिवार के ऊपर से किसी बड़े बुजुर्ग का अंकुश हटने से उसके सदस्यों का स्वभाव खर्चालू हो जाता है। दूसरी ओर संयुक्त परिवार का भाव आर्थिक रूप से मितव्यता सिखलाता है, परिवार के मुखिया का फिजूलखर्ची पर अंकुश रहता है। सामान्यत: हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि वह अपने बच्चों व भावी पीढ़ी के लिए कुछ छोड़ कर जाए। इसके लिए वह बचत का सहारा लेता है जो सांझे परिवार में ज्यादा संभव है। संयुक्त परिवार में सदस्यों के प्रति दायित्वों की पूर्ति के  लिए परिवार के मुखिया को बचत करनी अनिवार्य हो जाती है। बचत का भाव निवेश करने को प्रोत्साहित करता है और निवेश से उद्यमशीलता का गुण विकसित होता है। यही कारण है कि बड़े-बुजुर्ग अपने आशीर्वाद में 'दूधो नहाओ-पूतो फलो' की कामना करते हैं जिसका अर्थ है कि आपका परिवार फले-फूले और आर्थिक रूप से संपन्न हो। अपने आसपास भी हम जिन संपन्न परिवारों को देखते हैं तो उसकी संपन्नता के पीछे कहीं न कहीं उसकी परिवारिक एकता के जरूर दर्शन होते हैं।

हमारी परिवारिक प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता है घरेलु उत्पादन और उसमें निवेश। माता-बहनों की रसोई किसी छोटे-मोटे कारखाने व औषधालय से कम नहीं है। रसोई में दो-तीन समय का खाना बनने के साथ-साथ पापड़, बडिय़ां, पकौड़े-गुलगुले, कचौरी, मिठाई जैसे गरिष्ठ खाद्य पदार्थ (फास्टफूड), अचार-मुरब्बे, चटनी सहित अनेक तरह का सामान सामान्यत: बनाया जाता है। इसी तरह छोटी-मोटी बीमारियों का ईलाज रसोई के सामान व सामान्य मसालों से हो जाता है। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार यह खाद्य पदार्थ देश के सकल घरेलु उत्पादन का 37 प्रतिशत से अधिक का हिस्सा बनते हैं। अर्थात विदेशों में लोग इन खाद्य पदार्थों को डिब्बाबंद पदार्थों के रूप में खरीदते हैं जिससे उनके सकल घरेलु उत्पादन का आकार हमसे बड़ा नजर आता है। लेकिन संयुक्त परिवारों में यह काम घरों में हो संभव हो जाता है। संयुक्त परिवारों के माध्यम से हम सामान्य घरों में करोड़ों-अरबों रूपयों की बचत करते हैं। दूसरी ओर एक परिवारों में देखा जाए तो उसे यह सुविधा नहीं मिल पाती और बाजार का सहारा लेना पड़ता है जो आर्थिक बोझ साबित होता है।

एक सामान्य सी बात है कि अविभाजित दस सदस्यों के परिवार का खर्च विभाजित पांच-पांच सदस्यों के दो परिवारों से कम से कम 25 से 30 प्रतिशत तक कम होता है। कहने का भाव कि दस सदस्यों के परिवार का खर्च जितना होगा पांच-पांच सदस्यों के दो परिवारों का खर्च उससे 25 से 30 प्रतिशत अधिक होगा। अपने यहां सामान्य तौर पर कहा जाता है कि एक रसोई में पांच-छह लोगों के खाने में आठ-दस लोग भोजन कर सकते हैं। यह सत्य भी है। पांच-पांच सदस्यों के विभाजित परिवारों को दो सिलेंडर, लगभग दोगुने राशन, इतनी ही सब्जी, डबल बिजली मीटर का रेंट, डबल मनोरंजन के साधनों का बोझ, डबल परिवहन का खर्च वहन करना पड़ता है। संयुक्त परिवार में सांझे तौर पर बहुत से काम निकल जाते हैं और सदस्यों के मिलजुल कर काम करने की आदत से परिवार के सामान्य काम-काज के लिए नौकर की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस प्रकार संयुक्त परिवार में रह कर हम अपने घर का खर्च कम कर महंगाई का बड़ी आसानी से मुकाबला कर सकते हैं और बचे हुए धन को भविष्य के लिए संरक्षित कर सकते हैं।

संयुक्त परिवार प्रणाली हमारी सामाजिक एकता ही नहीं बल्कि आर्थिक संपन्नता का भी आधार है। तभी देखने में आता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने विज्ञापनों में संयुक्त परिवार व्यवस्था पर प्रहार करती दिखती हैं, उन्हें मालूम है कि अगर परिवार संयुक्त रहे तो उनके फिजूल के उत्पादन कौन खरीदेगा। घर में ही अगर केवड़े के स्वाद वाली लस्सी, शीतल शिकंजवीं, दही-मट्ठा मिल जाए तो विषैले कोल्ड डिं्रक्स को कौन मूंह लगाएगा। जीवन में अगर संपन्नता चाहिए, आर्थिक सुरक्षा चाहिए तो हमें पुन: परिवार प्रणाली को मजबूत करना होगा फिर से संयुक्त परिवारों की ओर लौटना होगा।

राकेश सैन
32, खण्डाला फार्मिंग कालोनी,
वीपीओ रंधावा मसंदा,
जालंधर।
मो. 097797-14324

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