आओ आपको लिए चलते हैं द्वापर युग के चक्रवर्ती सम्राट भरत के हस्तिनापुर राजदरबार, जहां दुनिया में पहली बार प्रजातंत्र जन्म ले रहा है। जी हां वही भरत, जो महर्षि कण्व की मुंहबोली पुत्री शकुंतला व महाराज दुष्यंत के पुत्र हैं। बचपन में जो शेरों के दांत गिना करते थे और उनकी सवारी किया करते थे। आज वे अपने बाहुबल से हस्तिनापुर की सीमाएं पूरे आर्यव्रत में फैला एक राष्ट्र के रूप में भारतवर्ष की स्थापना कर वापिस लौटे हैं। उनके सम्मुख चुनौती है युवराज घोषित करने की।
राजा भरत के 9 पुत्र हैं, परंतु वे उनमें से किसी को युवराज पद के योग्य नहीं मानते। भरद्वाज पुत्र भुमन्यू को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करते हुए वे घोषणा करते हैं कि ''कोई राजा अपने देश व अपनी प्रजा से बड़ा नहीं होता। प्रत्येक राजा के तीन कत्र्तव्य होते हैं। देश व जनसमुदाय की रक्षा करना, उन्हें न्याय देना और उसे युवराज के रूप में भविष्य का ऐसा राजा देना जो इन्हीं कामों को करने की योग्यता रखता हो।'' इसीलिए उन्होंने अपने पुत्रों की बजाय भुमन्यू को भविष्य का नरेश घोषित किया। इस तरह भुमन्यू के रूप में इस पृथ्वी पर अंकुरित हुआ प्रजातंत्र अर्थात् गणतंत्र जो आज आधुनिक युग में विश्व की आधुनिकतम व सर्वप्रिय शासन प्रणाली बना हुआ है। भारत में इसी प्रजातंत्र को संविधान का रूप देकर 26 जनवरी, 1950 को देश के सुपुर्द किया हमारे युगपुरुष बाबा साहिब भीमराव रामजी अंबेदकर ने।
गणतंत्र अब तक की सबसे सार्थक परिभाषा उस समय मुखरित हुई जब शकुंतला अपने पुत्र भरत से पूछती है कि ''तुम कैसे पिता हो, जो अपने पुत्रों का अधिकार किसी दूसरे को दे रहे हो ?'' भरत उत्तर देते हैं ''माते, मैं जन्म के 9 पुत्रों का पिता होने के साथ एक राजा भी हूं। मेरा कुटुंब बहुत बड़ा है, पूरा जनसमुदाय ही मेरा परिवार है। प्रजा के जिस युवक को आप दूसरा कह रही हैं वह भी मेरा ही तो पुत्र है। योग्यता की अनदेखी कर उस पुत्र को राज्य देना जो केवल जन्म से मेरा है, यह तो प्रजा के साथ अन्याय हुआ माते।''
इसी तरह महाराज भरत ने जन्म और कर्म के बीच एक स्पष्ट विभाजन रेखा खींच दी। उन्होंने व्यवस्था दी कि जन्म से न तो कोई उच्च है न ही कोई हीन और इस देश में कर्म को प्रधानता मिली। महाराजा भरत ने केवल प्रजातंत्र की नींव ही नहीं डाली बल्कि उसके लिए सभी साधन भी जुटाए। उन्होंने एक बार फिर उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में सागर तक अपनी सीमाओं का विस्तार कर एक विशाल राष्ट्र की स्थापना की। विष्णु पुराण में आता है -
उत्तर यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्ष तद् भारत नाम भारती यत्र संतति:।।
आर्थात् उत्तर में हिमालय पर्वत से लेकर सागर तक भू-भाग का नाम भारत और यहां रहने वाले भारतीय हैं। भरत ने इस राष्ट्र के लोगों को भूगोलिक रूप से एकजुट और सुरक्षित किया। प्रजापालन व धर्मपालन में उसका कोई सानी न था। दुर्योग से कुछ समय बाद इस परंपरा पर उस समय अल्पविराम लग गया जब हस्तिनापुर के महाराज शांतनु ने गंगापुत्र देवव्रत जो इतिहास में भीष्म के नाम से विख्यात हुए, को अपना युवराज घोषित किया। जन्म की योग्यता फिर से कर्म से ऊंची हो गई और जिसका परिणाम निकला कुरुक्षेत्र का महाभारत। ऐसा नहीं कि इन घटनाओं के बाद देश में गणतंत्र बिलकुल समाप्त ही हो गया। समाज में जनपंचायतों, जाति पंचायतों, राजदरबार में जन-प्रतिनिधियों, जन परिषदों, धर्मगुरुओं के रूप में इस देश में गणतंत्र किसी न किसी रूप में विद्यमान रहा है। फिर देश ने एक दौर ऐसा भी देखा जब राजदरबार सत्ता के लिए षड्यंत्र के अड्डे बन गए। मु$गल काल में तो पुत्र ने पिता को कारावास में डलवाया, भाई ने भाई की हत्या की।
समय बीता, देश में आजादी आई। आजादी के बाद 26 जनवरी, 1950 को अपना संविधान लागू हुआ। इसे लागू करते समय बाबा साहिब भीमराव रामजी अंबेदकर ने कहा, 'आज मैंने महारानियों की नसबंदी कर दी है। देश में अब राजा मतपेटी से जन्म लिया करेंगे।' इस तरह बाबा साहिब ने जन्म आधारित शासन व्यवस्था को सदा के लिए समाप्त करके देश में सदियों पुरानी कर्म आधारित व्यवस्था को पुनस्र्थापित किया। आज अपना गणतंत्र बड़ी ते•ाी से परिपक्वता की ओर बढ़ रहा है। यह इस देश के लोकतंत्र की सुंदरता ही है कि बचपन में चाय बेचने वाले बालक नरेंद्र दामोदर दास मोदी जैसे आम आदमी को देशवासी राष्ट्र की बागडोर सौंप देते हैं और अखबार बेचने वाले एपीजे अब्दुल कलाम योग्यता के बल पर राष्ट्रपति बन जाते हैं। ठीक है कि वर्तमान के राजनीतिक दलों में परिवारवाद की समस्या बढ़ रही है, परंतु अच्छी बात है कि इसके खिलाफ भी आवा•ो उठने लगी हैं। तथ्य यह भी है कि लोकतंत्र में नेताओं के परिजनों को भी राजनीति में उतरने का अधिकार है। हां उसका आधार केवल योग्यता होनी चाहिए, नेतापुत्र या पुत्री होना नहीं। लोकतंत्र के लिए शुभ समाचार है कि वर्तमान में मोची, नाई, कूंजड़े, तेली, ठेला लगाने वाले, रिक्शा चालकों जैसे साधारण घरों के बच्चे योग्यता के बल पर बड़े-बड़े पद प्राप्त कर समाज का मार्गदर्शन कर रहे हैं। बेटियां हर क्षेत्र में अपनी योग्यता का लोहा मनवा रही हैं। देश में जनतंत्र का भविष्य उज्ज्वल है। महाराज भरत द्वारा रोपा गया लोकतंत्र का पौधा बाबा साहिब भीमराव अंबेदकर के संविधान की ऊर्जा से वट वृक्ष का रूप धारण करता जा रहा है। देशवासियों को गणतंत्र दिवस की बधाई और ढेरों शुभकामनाएं।
- राकेश सैन
32, खण्डाला फार्मिंग कालोनी,
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जालंधर।
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