Sunday, 13 February 2022

पंजाब : केजरीवाल ने अपने पैर पीछे क्यों खींचे ?




सांसद श्री भगवंत मान को पंजाब में आम आदमी पार्टी का मुख्यमन्त्री का चेहरा घोषित किए जाने के बाद राजनीतिक गलियारों में प्रश्न पूछा जा रहा है कि पार्टी के सर्वेसर्वा दिल्ली के मुख्यमन्त्री श्री अरविन्द केजरीवाल ने इस राज्य में अपने पैर पीछे क्यों खींच लिए ? पिछले तीन-चार महीनों से पंजाब की दिवारें इस नारे के साथ पाट दी गईं कि ‘इक मौका-केजरीवाल नूं’ तो यकायक नया नारा क्यों दे दिया कि ‘इक मौका-भगवंत मान नूं ?’

पंजाब की राजनीतिक परिस्थितियों का सिंहावलोकन करने पर सामने आएगा कि राज्य में आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता का खजाना सिकुड़ता सा नजर आ रहा है। पिछले विधानसभा चुनावों से पहले आम आदमी पार्टी पंजाब में आन्धी की तरह आई। राज्य के बड़े राजनीतिक चेहरों के साथ-साथ दूसरे दलों के असन्तुष्टों, युवाओं, विदेशों में बड़ी संख्या में रह रहे अनिवासी भारतीयों, यहां तक कि सिविल सोसाइटी व बुद्धिजीवी वर्ग ने भी दिल्ली की इस सनसनी को हाथों-हाथ लिया। विगत चुनावों में तत्कालीन अकाली दल बादल और भारतीय जनता पार्टी गठजोड़ वाली सरकार के खिलाफ जनाक्रोश भी काफी था जिसको चलते लग रहा था कि आम आदमी पार्टी बाजी मार जाएगी। श्री केजरीवाल भी दिल्ली जैसे आधे-अधूरे राज्य को छोड़ पंजाब जैसे पूर्ण प्रान्त को अपनी राजनीति का केन्द्र बनाने को ललायित दिखे। नारा दिया गया कि ‘केजरीवाल-केजरीवाल सारा पंजाब तेरे नाल।’ इस दावे का आधार भी था क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनावों में पंजाब से आम आदमी पार्टी के चार सांसदों ने पहली बार अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। परन्तु इस सारी कवायद का परिणाम निकला वही ढाक के तीन पात, राज्य की 117 विधानसभा सीटों में 100 सीटों का दावा करने वाली दिल्ली की इस पार्टी को मात्र 20 सीटों पर संतोष करना पड़ा। केजरीवाल के नारे को लेकर पंजाब के लोग उपहास में कहने लगे ‘केजरीवाल-केजरीवाल एह की होया तेरे नाल।’
पंजाब में पिछले पांच सालों में आम आदमी पार्टी की राजनीतिक ताकत कमजोर हुई है। विगत विधानसभा चुनावों के बाद बड़े-बड़े चेहरे पार्टी को छोड़ गए। इस दौरान राज्य में हुए आधा दर्जन विधानसभा उपचुनावों में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार अपनी जमानतें तक नहीं बचा पाए। 2019 के लोकसभा चुनावों में लोकसभा सांसदों की संख्या चार से घट कर केवल एक रह गई और श्री भगवंत मान ही पार्टी की थोड़ी बहुत इज्जत बचा पाए। ग्रामीण व निकाय चुनावों में भी पार्टी फिसड्डी रही। केवल इतना ही नहीं, पार्टी के 20 विधायकों में भी पार्टी नेतृत्व को लेकर असन्तोष पनपने लगा और पांच सालों में आधा दर्जन विधायक आम आदमी पार्टी को छोड़ गए। केवल इतना ही नहीं कुछ दिन पहले फिरोजपुर (ग्रामीण) विधानसभा क्षेत्र के आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार ने ही पार्टी छोड़ दी। देश के इतिहास में शायद यह पहली बार सुनने को मिला कि किसी उम्मीदवार ने भाग-दौड़ करके किसी पार्टी की टिकट प्राप्त की हो और मतदान की तारीख की घोषणा होते ही पार्टी छोड़ दी हो। यह सब आम आदमी पार्टी की गिरती साख व लोकप्रियता की निशानियां बताई जा रही हैं।
अब पंजाब को एक बार फिर जीतने की मंशा से निकले श्री केजरीवाल ने तीन-चार महीने पहले रैलियां, रोड शो और विभिन्न वर्गों के साथ बैठकें आयोजित करनी शुरू कर दीं परन्तु ये आयोजन उनके पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान किए गए कार्यक्रमों के मुकाबले फीके दिखे। शायद यही कारण है कि श्री केजरीवाल ने अब अपने पैर खींच कर श्री भगवंत मान को आगे कर दिया है।
श्री भगवंत मान को मुख्यमन्त्री का चेहरा घोषित करने के लिए चाहे श्री केजरीवाल ने चिर-परिचित राजनीतिक स्टण्ट किया और लोकमत से नाम घोषित करने का दावा किया परन्तु वे इस मोर्चे पर भी गच्चा खा गए और उन्होने स्वयं स्वीकार कर लिया कि पंजाब में पार्टी की ताकत पहले जैसी नहीं रही। पंजाब के इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेण्ट एण्ड कम्यूनिकेशन के निदेशक डॉक्टर प्रमोद कुमार कहते हैं कि इस बार विधानसभा चुनाव में पाँच पार्टियों की लड़ाई है। हाल के दिनों में आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता कम हुई है क्योंकि भगवंत मान को मुख्यमन्त्री बनाने के लिए केवल 21 लाख लोगों ने वोट डाले जबकि पिछले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के लिए 36.62 लाख लोगों ने वोट किया था, जो कुल मतों का 23.28 प्रतिशत था। अगर उनकी लोकप्रियता बढ़ी होती तो 36 लाख से ज़्यादा लोगों को मुख्यमन्त्री के नाम पर मुहर लगाने के लिए हुए वोट में हिस्सा लेना चाहिए था। ज्ञात रहे कि श्री मान को 21 लाख लोगों द्वारा पसन्द किए जाने का आंकड़ा भी खुद केजरीवाल का ही है, किसी निष्पक्ष एजेंसी का नहीं। अगर इस आंकड़े को सही भी मान लें तो इसमें वर्गीकरण किया जाना सम्भव नहीं कि फोन के माध्यम से अपना मत रखने वाले लोग पंजाब के ही थे या किसी दूसरे राज्य के भी। फिलहाल श्री केजरीवाल का 21 लाख का स्वघोषित आंकड़ा भी बताता है कि पंजाब में आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता घटी है।
श्री केजरीवाल चाहे श्री भगवंत मान को अपनी व लोगों की पसन्द बता रहे हैं परन्तु सच्चाई अलग ही सामने आई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मान न मान, केजरीवाल की मजबूरी बन गए थे भगवंत मान वाली हालत बन गई थी। किसी बड़े चेहरे की तलाश में पूरी जोड़तोड़ के बाद ही अन्त में सांसद भगवंत मान को मुख्यमन्त्री का चेहरा बनाया गया। बॉलीवुड कलाकार सोनू सूद से लेकर दुबई के होटल कारोबारी एसपीएस ओबेरॉय और किसान नेता बलबीर राजेवाल के नाम मुख्यमन्त्री चेहरे के लिए चले। चर्चा यही रही कि आम आदमी पार्टी और इनके बीच बात नहीं बनी और आखिर में भगवंत मान को आगे करना पड़ा। पंजाब का मुख्यमन्त्री बनने की इच्छा दिल्ली वाले नेताओं की भी चर्चा में रही लेकिन पंजाबी किसी बाहरी नेता को स्वीकार नहीं करते। इसलिए यह विकल्प पिट गया। हर तरह की कोशिशों के बीच चुनाव सिर पर आ गए तो श्री केजरीवाल की मजबूरी बन गई कि श्री मान के नाम की घोषणा कर दे। कहीं चोकोणीय तो कहीं पांच कोणीय चुनाव होने के कारण पंजाब की राजनीति प्याज के छिलके जैसी होती जा रही है जिसमें कोई दल छाती ठोक कर अपनी जीत का दावा नहीं कर सकता। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के अलावा, बीजेपी से नाता तोड़ कर अकाली दल और बीएसपी गठबन्धन मैदान में है। वही पंजाब के पूर्व मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबन्धन किया है। इतना ही नहीं किसान आन्दोलन में शामिल रहे 22 संगठन भी संयुक्त समाज मोर्चा के मंच पर चुनाव लड़ रहा है। ऐसी अनिश्चितता के दौर में केजरीवाल ने अपना राजनीतिक भविष्य दांव पर लगाना उचित नहीं समझा और पंजाब से अपने पैर वापिस खींच लिए। पंजाब में आम आदमी पार्टी के लोग अब ‘इक मौका केजरीवाल नूं’ का नारा भुला कर ‘इक मौका भगवन्त मान नूं’ का नया नारा याद कर रहे हैं।

- राकेश सैन
32 खण्डाला फार्मिंग कालोनी,
ग्राम एवं डाकखाना लिदड़ां
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मोहम्मद मुस्तफा - पंजाब की जिन्नावादी कोपलें




 ‘‘अगर मेरे बराबर हिन्दुओं को जलसा करने की इजाजत दी गई तो मैं ऐसे हालात पैदा कर दूंगा जो सम्भाले नहीं सम्भलेंगे। मैं अल्लाह की कसम खाता हूं कि मैं उन्हें कोई कार्यक्रम नहीं करने दूंगा। मैं कौमी फौजी हूं... मैं आर.एस.एस. का एजेण्ट नहीं हूं जो डर के मारे घर में छिप जाएगा। अगर वे फिर से ऐसा करने का प्रयास करेंगे तो मैं खुदा की कसम खाता हूं कि मैं उन्हें उनके घर में घुस कर पीटूंगा।’’

सुनने में ये गरलयुक्त पंक्तियां स्वतन्त्रता पूर्व मुस्लिम लीग के किसी मञ्च से दिए गए भाषण की लगती हों परन्तु घटना 20 जनवरी, 2022 की है, जब पंजाब के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र मलेरकोटला में कांग्रेस उम्मीदवार व वर्तमान विधायक रजिया सुल्ताना के पति और पंजाब पुलिस के पूर्व महानिदेशक मोहम्मद मुस्तफा भाषण दे रहे थे। ये साम्प्रदायिक विष मोहम्मद मुस्तफा के श्रीमुख से ही निकला है। पूर्व पुलिस महानिदेशक पर दो समुदायों के बीच वैमनस्य बढ़ाने के आरोप में भारतीय दण्डावली की धारा 153-ए के अन्तर्गत मामला दर्ज किया गया है। वाद पुलिस अधीक्षक कर्मवीर सिंह, प्रभारी थाना सिटी की शिकायत पर दर्ज किया गया है। पुलिस की प्राथमिकी पर प्रतिक्रिया देते हुए मोहम्मद मुस्तफा ने चाहे इसे पूरी तरह बकवास बताया और दावा किया कि उन्होंने ‘फितने’ शब्द का प्रयोग किया जिसका अर्थ है कानून तोडऩे वाले। वो मुसलमानों के एक समूह पर गुस्सा थे जिन्होंने उन पर हमले का प्रयास किया। वो उन्हें चेतावनी दे रहे थे, हिन्दुओं को नहीं।
पंजाब में साम्प्रदायिक राजनीति का कोई इतिहास नहीं है परन्तु मोहम्मद मुस्तफा के इस भाषण को राज्य की राजनीति में विषैले जिन्नावाद की कोपलों के रूप में देखा जा रहा है। मोहम्मद मुस्तफा ने केवल विधान की दृष्टि में ही अपराध नहीं किया बल्कि गुरु गोबिन्द सिंह जी के उस विश्वास और विचारों को भी ठेस पहुंचाई है जो उन्होंने यहां के नवाब के प्रति व्यक्त किए। इतिहास है कि जब सरहिन्द में गुरु गोबिन्द सिंह जी के छोटे साहिबजादे फतेह सिंह व जोरावर सिंह को मुगल सूबेदार वजीर खां द्वारा दिवारों में चिनवाया जा रहा था तो उसने वहां पर खड़े मलेरकोटला के नवाब मोहम्मद शेर खां को अपने भाई की मौत का बदला लेने को कहा। इस पर शेर खां ने कहा कि उनकी लड़ाई गुरु गोबिन्द सिंह से है, इन बच्चों ने क्या बिगाड़ा है। गुरु गोबिन्द सिंह जी को इस घटना का पता चला तो उन्होंने शेर खां को आशीर्वाद दिया और तब से लेकर यह स्थान साम्प्रदायिक सौहार्द का प्रतीक बना हुआ है। यहां तक कि 1947 में जब देश में साम्प्रदायिक वातावरण खून में सन चुका था और जगह-जगह खून खराबा हो रहा था तो भी हिन्दू-सिखों ने अपने गुरु साहिब का वचन निभाते हुए यहां के मुसलमानों का तनिक भी अहित नहीं किया। अब कांग्रेस के नेता मोहम्मद मुस्तफा ने उसी साम्प्रदायिक सौहार्द की जड़ों पर प्रहार किया और गुरु गोबिन्द सिंह जी के विश्वास को तोड़ा है।
आदर्शवादी बातों को दरकिनार कर दिया जाए तो मुस्लिम बाहुल्य इलाके मलेरकोटला में साम्प्रदायिक सद्भावना बनाए रखने का काम एक तरफा ही होता आया है, शेर खां के बाद उनकी मानसिकता वाले कम हो लोग पैदा हुए हैं। शेर खां की कमी के चलते ही यहां नामधारी सम्प्रदाय के 80 सिखों को अपना बलिदान देना पड़ा था। साल1872 गोहत्या के मामले में मलेरकोटला के एक मुस्लिम न्यायाधीश ने सजा सुनाई कि सरेआम कचहरी में एक बैल की हत्या की जाए। गांव फरवाही के नम्बरदार सन्त गुरमुख सिंह के सामने कोतवाली में एक बैल को कत्ल किया गया और गो-भक्त गुरमुख सिंह को बहुत अपमानित किया गया। नामधारी सम्प्रदाय के प्रमुख सद्गुरु राम सिंह कूका जी की स्वीकृति ले कर जत्थेदार हीरा सिंह व लहना सिंह के नेतृत्व में नामधारी सिखों ने बड़े जत्थे के साथ मलेरकोटला के कसाईयों पर हमला कर दिया। इस पर अंग्रेज सरकार ने 67 नामधारी सिखों को तोप से उड़ा कर शहीद कर दिया।
आज से लगभग 9 साल पहले 30 दिसम्बर, 2913 में मलेरकोटला में एक सात वर्षीय बच्चे विधू जैन को उन्मादियों ने जला कर मार दिया। बताया जाता है कि विधू जैन का किसी बात को लेकर अपने साथियों से झगड़ा हुआ था परन्तु इसका खामियाजा उस बच्चे को अपनी जान गंवा कर भुगतना पड़ा। इस घटना के इतने साल बीत जाने के बाद भी पंजाब की पुलिस दोषियों को सजा दिया जाना तो दूर उनकी पहचान तक नहीं कर पाई है। यह समझना मुश्किल नहीं कि जिस पुलिस में मोहम्मद मुस्तफा जैसे साम्प्रदायिक मानसिकता के लोग प्रम्मुख पद पर तैनात हों वहां उन्मादियों को सजा मिले यह कैसे सम्भव है? मलेरकोटला के निवासी बताते हैं कि जब भी पुलिस विधू जैन हत्याकाण्ड की जांच करने आती तो उसके आसपास उन्मादियों की इतनी भीड़ इक्ट्ठा हो जाती कि पुलिस को अपना काम करना मुश्किल हो जाता। आज विधू जैन का परिवार अपने लाडले को खोने के बाद सब्र करके घर बैठ चुका है। यहां का हिन्दू समाज राजनीतिक रूप से भी उपेक्षित है और दान्तों के बीच जीभ जैसा जीवन व्यतीत करने को विवश है। उन्मादियों द्वारा हिन्दुओं को चुनाव न लडऩे के लिए दबाव बनाया जाता है और यहां के लोग बताते हैं कि मोहम्मद मुस्तफा ने तो केवल इसी उन्मादी भावना को स्वर दिया है। हिन्दुओं को प्रताडि़त व दबाव में लाने का काम तो काफी समय से चल रहा है।
मोहम्मद मुस्तफा 1985 बैच के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी हैं और इस्लामिक व सूक्ष्म वामपन्थी विचारधारा से प्रभावित हैं। वे पंजाब के पूर्व मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह के भी करीबी रहे परन्तु कैप्टन द्वारा अपने कार्यकाल में दिनकर गुप्ता को पंजाब पुलिस प्रम्मुख नियुक्त करने के बाद वे सिद्धू के पाले में चले गए। उन्होंने इसके विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया परन्तु असफल रहे। यहां रोचक तथ्य यह रहा कि सर्वोच्च न्यायालय में उनके केस की पैरवी वरिष्ठ अधिवक्ता एडवोकेट एजाज मकबूल ने की जो साल 2019 में जमीयत उलेमा-ए-हिन्द की ओर से श्रीराम मन्दिर केस में मन्दिर निर्माण के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर कर चुके हैं। उनके पुलिस प्रमुख रहते हुए पंजाब में जिस तरह तेजी से सार्वजनिक स्थानों के आसपास मस्जिदों, मजारों-ईदगाहों का निर्माण हुआ, दूसरे प्रदेशों से ला कर मुसलमानों को बसाया गया और उन्हें संरक्षण दिया गया वह भी जांच का विषय है। मुस्तफा हिन्दुत्व व संघ के खिलाफ ट्वीट कर कई बार विवादों में आ चुके हैं और अब उन्हें पंजाब में जिन्नावादी कोपलों के रूप में देखा जाने लगा है।
वैसे कांग्रेस में जिन्नावादियों की कमी नहीं। हाल ही में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के समर्थन में उतरे इत्तेहाद मिल्लत काउंसिल के अध्यक्ष मौलाना तौकीर रजा खां व उनके जैसे न जाने कितने ही नेता हैं जो सरेआम हिन्दुओं को गाली दे चुके और बाटला हाऊस में मारे गए आतंकियों को निर्दोष बता चुके हैं। अब इस बिरादरी में पंजाब के मोहम्मद मुस्तफा का भी नाम जुड़ चुका है और देश विभाजन की सर्वाधिक त्रासदी झेल चुके पंजाब के लिए यह अत्यन्त अशुभ समाचार है।

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नेहरू के लिए फिर पटेल की बलि





देश को 15 अगस्त, 1947 को स्वतन्त्र होना था, लेकिन एक साल पहले ब्रिटेन ने भारतीय हाथों में सत्ता दे दी और अन्तरिम सरकार बननी थी। तय था कि कांग्रेस अध्यक्ष ही प्रधानमन्त्री होगा। तब पार्टी के अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद थे परन्तु उनकी विदाई का समय हो गया था। तब तक गान्धीजी अपने चहेते नेहरूजी के हाथ में कांग्रेस की कमान देने का मन बना चुके थे। ‘कलेक्टट वक्र्स खण्ड 90 पृष्ठ 315’ के अनुसार, गान्धीजी ने ये भी साफ कर दिया कि अगर इस बार उनसे राय मांगी गई तो वे जवाहर को पसन्द करेंगे। 29 अप्रैल, 1946 में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में नया अध्यक्ष चुना जाना था। बैठक में गन्धीजी के अलावा नेहरू, सरदार पटेल, आचार्य कृपलानी, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, खान अब्दुल गफ्फार खान व कई बड़े नेता शामिल थे। अध्यक्ष का चुनाव कांग्रेस की प्रान्तीय समितियाँ करती थीं और 15 में से 12 समितियों ने पटेल, 3 ने आचार्य कृपलानी और पट्टाभी सीतारमैया का नाम प्रस्तावित किया। पार्टी महासचिव कृपलानी ने चुनाव की पर्ची गान्धीजी की तरफ बढ़ा दी, उन्होंने कृपलानी की तरफ देखा। कृपलानी समझ गए कि महात्मा क्या चाहते हैं, उन्होंने नया प्रस्ताव तैयार कर नेहरूजी का नाम भी शामिल कर दिया। उस पर सभी ने हस्ताक्षर किए। अब अध्यक्ष पद के दो उम्मीदवार थे, नेहरू और पटेल। नेहरू तभी निर्विरोध चुने जा सकते थे जब पटेल नाम वापस लें। कृपलानी ने उनके नाम वापसी की अर्जी लिखकर हस्ताक्षर के लिए पटेल की तरफ बढ़ा दी, लेकिन आहत पटेल ने हस्ताक्षर नहीं किए और उन्होंने ये कागज गान्धीजी की तरफ बढ़ा दिया। अब अन्तिम निर्णय राष्ट्रपिता को करना था, उन्होंने वो कागज फिर पटेल को लौटा दिया। इस बार सरदार ने उस पर हस्ताक्षर कर दिए और कृपलानी ने घोषणा कर दी कि नेहरू निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाते हैं। कृपलानी जी ने अपनी पुस्तक ‘गान्धी हिज लाइफ एण्ड थाटॅ्स’ में इस पूरी घटना का विस्तार से वर्णन किया है।

इस घटना के 76 साल बाद पंजाब में सत्तारूढ़ कांग्रेस के लिए मुख्यमन्त्री चुने जाने का निर्णय होना था। इसके लिए 79 विधायकों ने मतदान किया और 42 ने चौ. सुनील कुमार जाखड़, 16 ने सुखजिन्द्र सिंह रन्धावा, 12 ने परनीत कौर, 6 ने नवजोत सिंह सिद्धू और केवल 2 विधायकों ने चरनजीत सिंह चन्नी के पक्ष में मतदान किया। उच्चकमान ने फैसला सुनाया कि चन्नी पंजाब के अगले मुख्यमन्त्री होंगे। उच्चकमान संस्कृति के आगे फिर लोकतन्त्र पराजित हुआ और जाखड़ के रूप में सरदार पटेल की फिर से बलि ले ली गई। गान्धीजी ने नेहरूजी को इसलिए कमान सौम्पी क्योंकि वे अंग्रेजीदां और धर्मनिरपेक्ष थे और महात्माजी का मत था कि वे देश को बेहतर तरीके से चला सकते हैं। पटेल की छवि राष्ट्रवादी नेता की बनी हुई थी और व्यवहारिक होने के बावजूद महात्माजी उन्हें एक मजहब विशेष के लिए अच्छा नहीं मानते थे। पंजाब के ताजा मामले में भी यही कुछ हुआ, कांग्रेस के स्थाई हाईकमान गान्धी परिवार ने माना कि हिन्दू नेता जाखड़ का मुख्यमन्त्री होना पंजाब जैसे राज्य में नुक्सानदायक हो सकता है और एक जाति विशेष से सम्बन्धित होने के चलते चन्नी लाभ पहुंचा सकते हैं तो लोकतन्त्र का फिर गला घोण्ट दिया गया। गुणों पर इच्छाएं व राजनीतिक लाभ-हानि हावी हो गईं। आखिर इन 76 सालों में कुछ भी तो नहीं बदला कांग्रेस में, पहले गान्धीजी के रूप में व्यक्पिूजा हावी थी और अब गान्धी कुटुम्ब के रूप में परिवारवाद। व्यक्तिवाद और खानदानवाद ने कांग्रेस में कितने ही पटेलों व जाखड़ों की बलि ली इसका आकलन करना भी मुश्किल है।
शायद 2007 से विधानसभा चुनावों की बात है, मध्य प्रदेश में राज्यपाल रहते हुए संघ परिवार से निकटता के चलते दिवंगत चौ. बलराम जाखड़ के बारे चर्चा चली कि वे भारतीय जनता पार्टी में जा रहे हैं, तो उन्होंने कांग्रेस के प्रति निष्ठा दोहराते हुए कहा कि-‘कहीं हिमालय भी हिला करते हैं ?’ पूर्व लोकसभा अध्यक्ष चौधरी बलराम जाखड़ देश की राजनीति व कांग्रेस के ही हिमालय थे और आज उनके पुत्र चौधरी सुनील कुमार जाखड़ भी राजनीति के एवरेस्ट नहीं तो कम से कम कञ्चनजंगा जितनी ऊंचाई तो रखते ही हैं। टीलों के आकार के लोगों से भरी वर्तमान कांग्रेस में यही ऊंचाई किसी लोकप्रिय नेता का गुण कम और दोष अधिक बन जाती है। इसी दोष के कारण शरद पवार, ममता बैनर्जी, हेमन्त बिस्वा, सिन्धिया, कैप्टन अमरिन्दर सिंह जैसे कई नेताओं को पार्टी छोडऩी पड़ी। लगता है कि कांग्रेस को ‘लीडऱों’ की नहीं बल्कि आदेश पढऩे वाले ‘रीडरों’ की ज्यादा जरूरत है और रीढ़विहीन बौने लोग ही पार्टी में कोई पद पा सकते हैं। अन्यथा क्या आवश्यकता थी पंजाब में कैप्टन अमरिन्दर व सुनील जाखड़ की जोड़ी को तोडऩे की ? इस युगल नेताओं के नेतृत्व में सात-आठ माह पहले जो कांग्रेस पंजाब में पुन: स्पष्ट बहुमत लाती दिखाई दे रही थी तो इस युगलबन्दी को क्यों किनारे किया गया ? क्या नवजोत सिंह सिद्धू व चन्नी की जोड़ी वह प्रदर्शन कर पा रही है जो कैप्टन-जाखड़ जोड़ी ने किया ? राजनीति में साधारण रुचि रखने वाला भी बता सकता है कि ऐसा नहीं है। लगता है कि कैप्टन-जाखड़ जोड़ी की लोकप्रियता को पार्टी उच्चकमान हज्म नहीं कर पाया। विगत विधानसभा चुनावों में ‘चाहूंदा है पंजाब कैप्टन दी सरकार’ के नारे की सफलता गान्धी सुल्तानों को भाई नहीं। पार्टी का प्रथम परिवार कैसे बर्दाश्त कर सकता था तकि उनका नाम लिए बिना कोई कांग्रेसी नेता अपने स्तर पर सत्ता की सीढिय़ां चढ़ जाए। सांसद रहते हुए सुनील कुमार जाखड़ ने लोकसभा में छत्त पर चढ़ कर केन्द्र सरकार का विरोध करते हुए जो सुर्खियां पाईं शायद वह पार्टी के प्रथम परिवार को पसन्द नहीं आई। राष्ट्रीय मीडिया में अकसर चर्चा रही है कि पंजाब कांग्रेस का नेतृत्व केन्द्रीय नेतृत्व से भी पायेदार है और इसी की सजा मिली लगती है सुनील जाखड़ को। पटेल की उपेक्षा कर देश व कांग्रेस ने क्या कुछ खोया इसका आकलन मूल्यांकन शायद ही कभी हो परन्तु कांग्रेस के हितैषियों को अवश्य विचार करना चाहिए कि ‘खानदान’ के लिए ‘खासीयतें’ कब तक कुर्बान होती रहेंगी।


- राकेश सैन
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पंजाब कांग्रेस पर हिन्दू विरोधी ठप्पा


पंजाब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष चौधरी सुनील कुमार जाखड़ के हिन्दू होने के कारण मुख्यमन्त्री न बन पाने के मलाल पर राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी पर हिन्दू विरोध का ठप्पा लगता दिखने लगा है। साल 2014 के आम चुनावों में कांग्रेस की दुर्दशा के कारणों को जानने के लिए गठित की गई ए.के.एण्टोनी जाञ्च कमेटी ने पार्टी की पराजय के कई कारणों में एक वजह यह भी गिनाई थी कि इस पार्टी की छवि हिन्दू विरोधी बन चुकी है। राष्ट्रीय परिदृश्य में ढूण्ढने पर कांग्रेस के हिन्दुओं को लेकर किए साम्प्रदायिक आचरण के अनेक उदाहरण मिल जाएंगे परन्तु पंजाब के सन्दर्भ में भी इस तरह के दुष्कर्मों की कमी नहीं है। प्रसिद्ध लेखक मदनलाल बिरमानी ने अपनी पुस्तक ‘भारत विभाजन का दुखान्त और संघ’ में कांग्रेस की एक हिन्दूघाती घटना का जिक्र किया है। घटना के अनुसार, देश विभाजन के दिनों जब पंजाब में मुस्लिम लीग के हथियारबन्द दंगाईयों का बोलबाला था तो उन दिनों में पण्डित जवाहर लाल नेहरू अमृतसर दौरे पर आए। यहां के हिन्दुओं के शिष्टमण्डल ने उनसे मिल कर हिन्दू-सिख समाज की रक्षा करने व उन्हें आत्मरक्षा के लिए हथियार उपलब्ध करवाने का आग्रह किया। इस पर पण्डित जी कुछ देर मौन रहे फिर जवाब दिया कि ‘अगर उन्होंने हिन्दू-सिखों को हथियार उपलब्ध करवाए तो मुसलमानों को भी ये सुविधा देनी होगी।’ इस पर शिष्टमण्डल के नेता ने कहा कि ‘ठीक है, हमें मरना ही है तो कम से कम इतना करें कि, आप ही हमें मार दें।’ नेहरू जी ने इसका कोई जवाब नहीं दिया।
कांग्रेस की ऐसी ही मानसिकता का शिकार हुए हैं इसी पार्टी के पूर्व पंजाब प्रदेश अध्यक्ष चौधरी सुनील कुमार जाखड़, जिन्होंने दावा किया है कि कैप्टन अमरिन्दर सिंह की विदाई के बाद प्रदेश का मुख्यमन्त्री चुनने के लिए उनको 79 में से 42 विधायकों का साथ था परन्तु उच्चकमान ने 2 विधायकों के समर्थन वाले चरनजीत सिंह चन्नी को राज्य का सूबेदार बना दिया। चौधरी जाखड़ को यह भी मलाल है कि पार्टी उन पर कोई झूठा आरोप लगा कर इनकार कर देती तो भी चलता, परन्तु उनके धर्म के कारण उन्हें अयोग्य समझा गया यह तो देश के संविधान की भावना के खिलाफ कार्य है और हिन्दू समाज का अपमान।
हिन्दू विरोध के आरोपों से घिरी पंजाब कांग्रेस को वर्तमान में कुछ सूझ नहीं रहा है। केवल भारतीय जनता पार्टी ही नहीं प्रश्न पूछ रही बल्कि, वह आम आदमी पार्टी भी साम्प्रदायिक सद्भाव की बातें कर रही है जो दिल्ली में एक सम्प्रदाय विशेष के युवकों द्वारा मारे गए हिन्दू युवक रिंकू शर्मा की मौत पर मुंह पर पैबन्द लगा कर बैठी रही और जिसके पार्षद दिल्ली दंगों के दौरान हिन्दुओं का खून बहाते रहे। कांग्रेस पर हिन्दू विरोध का ठप्पा तो उसी समय चस्पा हो गया था जब कुर्सी की अदला-बदली के दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर यह कहना शुरू कर दिया था कि राज्य का मुख्यमन्त्री हिन्दू नहीं हो, परन्तु अब खुद जाखड़ द्वारा इस विषय में प्रश्न उठाए जाने के बाद हिन्दू अस्मिता के जख्म दोबारा गहरे होते दिख रहे हैं।
पंजाब को जानने वाले बताते हैं कि यहां की राजनीति अकाली दल और कांग्रेस को लेकर दो ध्रुवीय रही है। देश में जनसंघ व उसके बाद भाजपा के उदय के बाद भी यहां का हिन्दू कांग्रेस पर आँखें मून्द कर विश्वास करता रहा है। पिछली सदी के सातवें दशक में कांग्रेस के राजनीतिक प्रयोगों से पैदा हुए आतंकवाद के बावजूद हिन्दुओं का इसी पार्टी पर भरोसा बना रहा, जो स्वर्गीय बेअन्त सिंह के समय और भी दृढ़ हुआ क्योंकि उन्होंने अपने कार्यकाल में आतंकवाद को नकेलने में गम्भीरता दिखाई थी। पंजाबी हिन्दुओं का कांग्रेस पर विश्वास का ही प्रभाव है कि यहां का हिन्दू समाज देश में बहुसंख्यकों के साथ होने वाले राजनीतिक अन्याय के आरोपों से भी अलिप्त रहा और कांग्रेस की मतपेटी भरता रहा। शायद कहीं न कहीं हिन्दुओं ने मन ही मन में स्वीकार भी कर लिया कि पंजाब के मुख्यमन्त्री की कुर्सी उनके लिए नहीं है, लेकिन अब जाखड़ प्रकरण ने यहां के इस समाज की अन्र्तात्मा को मानो झझकोर के रख दिया है। इसी का परिणाम है कि आज पञ्चनदी हिन्दू कांग्रेस व इसी तरह साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले दलों को लेकर उद्वेलित दिख रहा है। हिन्दू समाज पूछ रहा है कि जब देश का संविधान उसको समानता देता है तो कोई राजनीतिक दल या नेता कौन हैं उसके साथ भेदभाव करने वाले ? क्या पंजाब का हिन्दू दूसरी श्रेणी का नागरिक समझ लिया गया है ? क्या पंजाब का हिन्दू अयोग्य है या उसमें नेतृत्व क्षमता नहीं ? धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करने वाली पार्टियां पंजा
ब के हिन्दुओं के खिलाफ साम्प्रदायिक दृष्टिकोण क्यों रखती हैं ?
ऐसा नहीं है कि पंजाब में जगी हिन्दू चेतना से यहां के राजनेता अनभिज्ञ हैं, अगर ऐसा होता तो प्रदेश के सभी दलों के नेता मन्दिरों व तीर्थों में पूजा-अर्चना करने को पंक्तिबद्ध न खड़े होते। प्रदेश में पहली बार देखने को मिल रहा है कि चुनावों से पहले यहां के राजनेता मन्दिर दर्शन कर रहे हैं, अन्यथा इससे पहले तो कोई नेता मन्दिर या हिन्दुओं के किसी कार्यक्रम में चला जाता तो उसे एक खास धर्म का विरोधी करार दिया जाता रहा है। लोग जानते हैं कि श्री अटल बिहारी वाजपेयी सरकार का हिस्सा होने के बावजूद पंजाब के अकाली शिक्षा मन्त्री ने केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मन्त्रालय के कार्यक्रम में सरस्वती वन्दना के विरोध में उठे स्वरों में स्वर मिलाए थे। प्रकाश सिंह बादल ने जैन सम्प्रदाय के एक समागम में मुकुट धारण कर लिया तो प्रदेश की राजनीति में तूफान खड़ा हो गया था। राजनेताओं के साथ-साथ पंजाबी मीडिया ने भी बादल के इस कदम को लेकर खूब थूक बिलोया। देश भर में जागृत हुई हिन्दू अस्मिता का असर चाहे देर से ही सही परन्तु अब पंजाब में भी होता दिख रहा है जो न केवल हिन्दू समाज बल्कि समूचे पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत के लिए भी शुभ संकेत है।

- राकेश सैन
32 खण्डाला फार्मिंग कालोनी,
ग्राम एवं डाकखाना लिदड़ां
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संपर्क - 77106-55605
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‘उड़ता पंजाब 2.0’ - राज्य में नशा आज भी सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा

पंजाब में नशे की समस्या को लेकर विगत विधानसभा चुनावों से कुछ माह पहले फिल्म आई थी ‘उड़ता पंजाब’ लेकिन पांच साल बीत जाने के बाद भी नशे के आसमान में राज्य की उड़ान अभी तक जारी है। उस समय मुख्यमन्त्री पद के कांग्रेस के उम्मीदवार कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने गुटका साहिब पर हाथ धर कर चार सप्ताह के भीतर नशे की कमर तोडऩे की सौगन्ध ली थी परन्तु उनके लाख प्रयासों से बाद भी आज फिर नशा राज्य में सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन कर सामने आ रहा है। राज्य में नशे की हालत यह है कि चुनाव आयोग द्वारा 8 जनवरी को चुनावों की घोषणा किए जाने के बाद लगभग एक महीने में 278 करोड़ से अधिक की कीमत का नशीला सामान बरामद किया जा चुका है।

रोजाना औसतन 37 लोग गिरफ्तार
मार्च 2017 में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद, उसने मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ सख्ती से कानून लागू करने, पीडि़तों के पुनर्वास और अन्य सरकारी एजेंसियों और पुलिस इकाइयों के साथ समन्वय करने के लिए एडीजीपी हरप्रीत सिंह सिद्धू की अध्यक्षता में एक नशा रोधी विशेष कार्यबल (एसटीएफ) का गठन किया। 1 अप्रैल, 2017 से इस साल 31 जनवरी तक राज्य पुलिस की एसटीएफ और अपराध निरोधक शाखा ने ड्रग के मामले में 67,081 लोगों को गिरफ्तार किया। यह आंकड़ा प्रतिदिन औसतन 37 गिरफ्तारियों का है। पुलिस रिकॉर्ड से पता चला है कि गिरफ्तार किए गए इन आरोपियों में 543 वे बड़ी भी मछलियां शामिल हैं, जिनसे प्रवर्तन एजेंसियों ने दो किलोग्राम से अधिक हेरोइन बरामद की। साथ ही, राज्य भर में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (एनडीपीएस)एक्ट के तहत 51,461 प्राथमिकी या 29 प्राथमिकी प्रतिदिन दर्ज की गई हैं। कुल मामलों में से 6,487 नशे के कारोबारी मात्रा के मामले शामिल थे, जिसमें पिछले चार वर्षों और 10 महीनों के दौरान 11,269 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। इस दौरान राज्य भर से कुल 2,415 किलोग्राम चिट्टा (हेरोइन) बरामद किया गया। 2017 के बाद से हेरोइन की बरामदगी 3.6 गुना (363 प्रतिशत) बढ़ गई है। राज्य ने 2020 में लगभग 759 किलोग्राम की रिकॉर्ड हेरोइन बरामदगी देखी, जो पंजाब में अब तक किसी भी वर्ष के लिए सबसे बड़ा है।
105 कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई
पंजाब सरकार ने जनवरी 2017 से दिसंबर 2021 के बीच नशीली दवाओं से सम्बन्धित अपराधों में शामिल होने के लिए कम से कम 105 पुलिस कर्मियों को सेवा से बर्खास्त कर दिया। इनमें प्रमुख चेहरों में इंस्पेक्टर इन्द्रजीत सिंह शामिल हैं, जिन्हें जून 2017 में बर्खास्त कर दिया गया था, जब ड्रग-विरोधी एसटीएफ ने उन्हें गिरफ्तार किया था और फगवाड़ा में उनके आधिकारिक आवास से लगभग 4 किलो हेरोइन, 16 लाख रुपये और एक एके-47 राइफल जब्त की। इंद्रजीत वरिष्ठ अधिकारियों के करीबी थे और ड्रग्स की बड़ी बरामदगी के लिए जाने जाते थे। साथ ही, कुछ विवादास्पद पुलिस वाले हैं जो नशीली दवाओं के मामलों में घोषित अपराधी होने के बावजूद सत्ता के गलियारों में स्वतंत्र रूप से आगे बढऩे के लिए वरिष्ठ अधिकारियों और सत्ताधारी सरकार के संरक्षण की सुविधा जारी रखते हैं।
ऐसे ही बर्खास्त किए गए पुलिस वाले में से एक उपनिरीक्षक सरबजीत सिंह हैं, जिन्हें 2013 में कुख्यात जगदीश भोला ड्रग रैकेट में भगोड़ा घोषित किया गया था और एनडीपीएस मामलों में सात केसों का सामना कर रहा है। उन्हें चंडीगढ़ पुलिस ने इस साल 19 जनवरी को पंजाब के तत्कालीन कार्यवाहक डीजीपी सिद्धार्थ चट्टोपाध्याय के हस्ताक्षर के लिए पुलिस के पदोन्नति आदेशों पर जाली हस्ताक्षर करने के आरोप में गिरफ्तार किया था।
आसानी से उपलब्ध
मार्च 2016 में ड्रग ओवरडोज के कारण 27 साल की उम्र में अपने ही बेटे मंजीत सिंह को खो देने वाले प्रसिद्ध ड्रग-विरोधी सामाजिक कार्यकर्ता मुख्तयार सिंह पट्टी ने बताया - प्रवर्तन एजेंसियों ने नशीली दवाओं के खतरे को रोकने के लिए कुछ कदम उठाए होंगे, लेकिन मुझे शायद ही ऐसा दिख रहा हो। हेरोइन और अन्य दवाओं के रूप में जमीन पर कोई उल्लेखनीय परिवर्तन अभी भी आसानी से उपलब्ध है।
सीमावर्ती जिले तरनतारन के पट्टी गांव के मूल निवासी और पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड में एक लाइनमैन, मुख्तयार ने कहा कि वह सफेद रंग में ‘कफन बोल पेया’ (ताबूत बोला गया) के साथ एक काला लबादा पहनता है और लोगों को अपने बच्चों को नशीले पदार्थों से बचाने के लिए शिक्षित करता है। 12 जनवरी को सीमा सुरक्षा बल द्वारा खेमकरण सेक्टर में 22 किलोग्राम हेरोइन बरामद करने के एक दिन बाद, मुख्तयार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना को एक पत्र लिखा, जिसमें युवा जीवन को बचाने के लिए उनके व्यक्तिगत हस्तक्षेप की मांग की गई।
दोष सिद्धि दर में सुधार
राज्य प्रवर्तन एजेंसियां एनडीपीएस अधिनियम के मामलों में 2018 में 59 प्रतिशत से 2019 में 64 प्रतिशत, 2020 में 66 प्रतिशत और 2021 में 79 प्रतिशत तक दोषसिद्धि दर में सुधार करने में सक्षम रही हैं। प्रवर्तन एजेंसियों ने 2019 के बाद से नशा तस्करों की 240 करोड़ रुपये की संपत्ति भी कुर्क की है। अकेले 2021 में, नशीली दवाओं के तस्करों और पेडलरों से 5.63 करोड़ रुपये की वसूली की गई। राज्य पुलिस ने अब तक ड्रग्स के मामलों में 299 करोड़ रुपये की संपत्ति को जब्त करने के लिए 573 मामले सक्षम प्राधिकारी को भेजे हैं। इनमें से 270 करोड़ रुपये के 442 मामलों में सक्षम प्राधिकारी ने संपत्ति को फ्रीज करने को हरी झंडी दे दी है। राज्य पुलिस ने जनवरी 2017 से दिसंबर 2021 के बीच 4,362 किलो हेरोइन, 9 करोड़ गोलियां और टैबलेट, 398 टन पोस्त की भूसी नष्ट की। इसमें से 1,560 किलो हेरोइन, 6.67 करोड़ गोलियां और टैबलेट, 176 टन पोस्त की भूसी अकेले 2021 में नष्ट हो गई।
डीएपीओ और बड्डी प्रोग्राम
मार्च 2018 से, राज्य सरकार ने नशीली दवाओं के दुरुपयोग की रोकथाम अधिकारियों (डीएपीओ) के रूप में 6.24 लाख से अधिक स्वयंसेवकों को पंजीकृत किया, जिनमें 1.58 लाख से अधिक सरकारी आधिकारिक स्वयंसेवक, 4.66 लाख नागरिक और 57 ट्रांसजेंडर शामिल हैं, ताकि उनके आसपास के लोगों को नशीली दवाओं के दुरुपयोग के प्रभाव के बारे में शिक्षित किया जा सके और नशा करने वाले रोगियों को सहायता प्रदान करना। राज्य सरकार ने कमजोर बच्चों की पहचान करने के उद्देश्य से एक बड्डी प्रोग्राम भी शुरू किया था ताकि उन्हें नशीली दवाओं के जाल में पडऩे से बचाया जा सके। इस कार्यक्रम के तहत राज्य के स्कूलों और कॉलेजों में 9.51 लाख से अधिक समूहों का गठन किया गया है, 43.5 लाख छात्रों ने दोस्त बनाए हैं और 1.52 लाख से अधिक वरिष्ठ मित्रों को नियुक्त किया है।
नशामुक्ति व पुनर्वास केन्द्र
आऊटपेशेंंट अपलोड एसिस्टेंट ट्रीटमेंट सैंटर - 206
ओओएटी क्लीनिक (जेलों में) - 13
पंजीकृत मरीज - 237006
सरकारी नशामुक्ति केंंद्र - 35
सरकारी पुनर्वास केंन्द्र - 19
निजी नशामुक्ति केन्द्र - 176
निजी पुनर्वास केन्द्र - 72
ओओएटी में मरीजों का उपचार - 731843
निजी अस्पतालों में मरीज - 492937
आंकड़े बताते हैं कि राज्य में नशा किस तरह सिर चढ़ कर बोल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि नशा छोटे-बड़े इलाज से ठीक होने वाला रोग नहीं है बल्कि इसके लिए क्रिमोथैरेपी की आवश्यकता पड़ेगी। एक दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति व प्रशासनिक योग्यता के बल पर ही इस काम को अंजाम दिया जा सकता है।

- राकेश सैन
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हिजाब विवाद : विष उगलती कांग्रेस

  • पंजाब में विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार चरम पर है और मतदाताओं को रिझाने के लिए सभी दलों द्वा
    रा हर तरह के अस्त्रों-शस्त्रों का प्रयोग किया जा रहा है। यहां तक कि अभिमन्यू वध की तर्ज पर हर प्रकार की मर्यादाएं तोड़ी जा रही हैं। ऐसा करते समय इससे भी गुरेज नहीं किया जा रहा कि भविष्य में समाज पर क्या असर हो सकता है। दो-अढ़ाई दशकों तक आतंकवाद का सेक झेल चुके देश के सीमांत राज्य में कांग्रेस ने ऐसा पासा फेंका है जिससे सामाजिक विभाजन की आशंका पैदा हो सकती है। देश में चल रहे हिजाब विवाद पर बोलते हुए कांग्रेस की प्रचार समिति के अध्यक्ष व पूर्व प्रदेशाध्यक्ष चौधरी सुनील कुमार जाखड़ ने कहा है इस विवाद के माध्यम से सिखों की पगड़ी याने दस्तार पर खतरा मण्डराने लगा है। उन्होंने कहा कि हिन्दूवादी आज हिजाब पर सवाल उठा रहे हैं तो कल दस्तार को लेकर ऐसा करेंगे। वे यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने अकाल तख्त साहिब व शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक समिति को भी उकसाया है कि वे इस मुद्दे पर खुल कर सामने आएं। असल जाखड़ का यह ब्यान या तो अज्ञानता की ऊपजहै या केसधारी समाज को भ्रमित करने का प्रयास। लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर विपक्ष को जवाब देते हुए प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने पंजाब में आतंकवाद व 1984 के सिख विरोधी दंगों को लेकर उठाए गए सवालों पर यह राज्य में चुनावी मुद्दे बन कर सामने आने लगे हैं और हो सकता है कि इसीके चलते चौ. जाखड़ ने समाज के दो वर्गों के बीच सन्देह पैदा करने का प्रयास किया हो। परन्तु शायद कांग्रेस नेता यह नहीं जानते कि हिजाब इस्लाम का जरूरी हिस्सा नहीं जबकि दस्तार सिख धर्म का अभिन्न अंग है। दोनों की परस्पर तुलना नहीं हो सकती।
  • जाने-माने इस्लामिक विचारक व केरल के राज्यपाल श्री आरिफ मोहम्मद खान ने स्पष्ट किया है कि हिजाब इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं। कुरान शरीफ में हिजाब का सात बार जिक्र है, लेकिन महिलाओं के ड्रेस कोड के सम्बन्ध में नहीं। यह ‘पर्दा’ के सम्बन्ध में है, जिसका अर्थ यह है कि जब आप बोलते हैं तो आपके बीच में पर्दा होना चाहिए। उन्होंने एक उद्धरण दिया कि एक युवा लडक़ी जो हजरत मोहम्मद पैगम्बर साहिब की सुपत्नी की भतीजी थी, वह लौकिक रूप से सुन्दर थी। उसने कहा कि ‘मैं चाहती हूं कि लोग मेरी सुन्दरता में अल्लाह की कृपा देखें और ईश्वर का शुक्रगुजार रहें।’ विजडम फाउण्डेशन की महानिदेशक प्रो. जीनत शौकत अली ने टाइम्स ऑफ इण्डिया में हिजाब व इस्लाम को अलग करते हुए लिखा है कि घूण्घट..पर्दा इसकी उत्पत्ति इस्लाम के साथ नहीं हुई। मेसोपोटामिया ग्रीक और फारसी साम्राज्यों में कुलीन महिलाओं ने सम्मान और अपनी उच्च स्थिति के संकेत के रूप में घूण्घट को अपनाया। मेसोपोटामिया की सभ्यता में विस्तार से बताया गया कि किन महिलाओं को घूण्घट करना चाहिए और किन को नहीं। इसलिए, इस्लाम के आगमन से बहुत पहले यह पर्दा प्रभाव में आया। बुर्का, अबाया, नकाब आदि शब्द कुरान से अपरिचित हैं। साथ ही, कुरान में हिजाब शब्द कपड़ों के बराबर नहीं है। इस शब्द के कई रूपक आयाम हैं, जिनमें से कोई भी महिलाओं के कपड़ों से सम्बन्धित नहीं। इस्लामिक देश कोसोवो, अजरबैजान, ट्यूनीशिया और तुर्की में पर्दा उठाया जा चुका है। सीरिया और मिस्र ने क्रमश: जुलाई 2010 और 2015 से विश्वविद्यालयों में नकाब लगाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इण्डोनेशिया, मलेशिया, मोरक्को, ब्रूनी, मालदीव और सोमालिया जैसे कट्टर इस्लामिक देशों में भी हिजाब अनिवार्य नहीं है।
  • इसका सीधा अर्थ है कि हिजाब इस्लाम का हिस्सा नहीं और इसकी सिख धर्म के अनिवार्य अंग दस्तार से तुलना नहीं हो सकती। दस्तार एक फासरी शब्द है जिसका अर्थ है दस्त-ए-यार या भगवान के हाथ। सिख धर्म में दस्तार विश्वास की प्रतीक है जो समानता, सम्मान, साहस, आध्यात्मिकता और पवित्रता का प्रतिनिधित्व करती है। नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी को मुगल सम्राट औरंगजेब द्वारा शहीद किए जाने के बाद गुरु गोबिन्द सिंह जी ने खालसा की स्थाना की जिसमें सिखों को पांच ककार अर्थात कच्छा, केस, कड़ा, कंगा, किरपान धारण करने को कहा। इनमें से केसों की रक्षा करने को दस्तारबन्दी की जाने लगी। इससे पहले भी नौ गुरुओं ने दस्तार धारण की। दस्तार सिख धर्म का अभिन्न अंग है और इसीलिए इसकी बे-अदबी (अपमान) करने पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 295-ए के तहत धार्मिक भावनाओं का अपमान करने के आरोप में दण्ड दिया जाता है, जबकि बुर्के या हिजाब को लेकर देश के संविधान निर्माताओं ने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की। इससे न केवल पन्थिक बल्कि संवैधानिक दृष्टि से भी स्पष्ट हो जाता है कि सिख धर्म से सम्बन्धित दस्तार और हिजाब को एक तुला में नहीं तोला जा सकता।

Friday, 31 December 2021

मालेगांव विस्फोट और सत्ता का दुरुपयोग

सत्ता जब राजनीतिक व निजी हित साधने का माध्यम बन जाए तो वह लोकतान्त्रिक अपराध की श्रेणी में आ जाते हैं परन्तु इस पाप की गम्भीरता उस समय और बढ़ जाती है जब इसके लिए किसी मासूम की बलि लेने का प्रयास होता है। मालेगांव बम विस्फोट मामले में कुछ ऐसा ही हुआ दिखाई पडऩे लगा है। जो दल आज केन्द्र सरकार पर सत्ता का नशा चढ़ा होने की तोहमत लगाते नहीं अघाते उक्त घटना बताती है कि जब वे कुर्सी पर विराजमान थे तो इसी नशे में मदमत्त थे। उन्होंने तो सारी मर्यादाएं ही लांघ दी थीं। मालेगांव बम विस्फोट की घटना के एक साक्षी ने राष्ट्रीय जाञ्च एजेंसी (एनआईए) के विशेष न्यायालय में पटाक्षेप किया है कि महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) ने उस पर उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ सहित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता श्री इन्द्रेश कुमार, स्वामी असीमानन्द, श्री काकाजी एवं श्री देवधर को फंसाने का दबाव डाला था। मुम्बई पुलिस के पूर्व आयुक्तपरमबीर सिंह उस एटीएस के अतिरिक्त आयुक्त थे। यह साक्ष्य आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 161 के तहत तब दर्ज किया गया था, जब इसकी जाञ्च एनआईए के हाथ में नहीं आई थी। ज्ञात रहे कि 29 सितम्बर, 2008 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के क्षेत्र मालेगांव में हुए बम विस्फोट में छह लोग मारे गए तथा 100 से अधिक घायल हुए थे। इसकी जाञ्च महाराष्ट्र एटीएस को सौम्पी गई थी। एटीएस ने इस मामले में भोपाल की वर्तमान सांसद साध्वी प्रज्ञा, ले. कर्नल पुरोहित, समीर कुलकर्णी, अजय राहिलकर, रमेश उपाध्याय, सुधाकर द्विवेदी एवं सुधाकर चतुर्वेदी को आरोपी बनाया, जिन पर हत्या और हत्या के प्रयास सहित आतंकवाद की कई धाराओं में मामला दर्ज किया। सत्ता के दुरुपयोग की इससे निकृृष्टतम उदाहरण शायद ही कोई और देखने को मिले। यह वो समय था जब केन्द्र में स. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील मोर्चा की सरकार थी और सरकार के साथ-साथ समस्त छद्मधर्मनिरपेक्ष शक्तियों पर ‘भगवा आतंकवाद’ और ‘हिन्दू आतंकवाद’ का झूठ स्थापित करने का भूत सवार था। तुष्टिकरण के दाद को खुजाने वाली इन शक्तियों का प्रयास था कि देश-दुनिया में फैले जिहादी आतंकवाद पर बुर्का कैसे डालें ? आतंकवाद का कोई धर्म नहीं, रूपी मिथ्या विमर्श स्थापित करने के लिए इस्लामिक आतंक के समक्ष किसे खड़ा किया जाए ? तो इन्हें दिखाई दिया शान्तिप्रिय हिन्दू और चस्पा कर दिया एक ऐसे समाज पर आतंकी होने का दोष जो सदियों से आतंकवाद का शिकार होता आया है। केवल इतना ही नहीं, इस माध्यम से इन छद्मधर्मनिरपेक्षतावादियों ने एक पन्थ दो काज करते हुए अपने राजनीतिक व वैचारिक प्रतिद्वन्द्वी भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी निपटाने का प्रयास किया जो तत्कालीन सत्ता महामण्डलेश्वरों के लिए बड़ी चुनौती बने हुए थे।
मालेगांव प्रकरण परिवारवादी दलों से उपजी लोकतान्त्रिक विसंगती की तरफ भी ध्यान खीञ्चता है, कि किस तरह ऐसे दलों की सरकारों में ‘राजपरिवार’ के किसी सदस्य की इच्छापूर्ति के लिए पूरी व्यवस्था सिर के भार खड़ी हो जाती है। विकिलीक्स खुलासा कर चुका है कि पूर्व अमेरिकी राजदूत टिमॉथी जे. रोएमर ने 3 अगस्त, 2009 अपने विदेश मन्त्रालय को लिखे पत्र में राहुल गान्धी के उस बयान का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने हिन्दू आतंकवाद की बात कही। राहुल का कहना था कि हिन्दू आतंक अल्पसंख्यक आतंकवाद से कहीं अधिक खतरनाक है। फिर क्या था कि इस वितण्डावाद पर सच्चाई की पुताई करने को पूरी सत्ताधारी पार्टियां व सारी की सारी व्यवस्था सक्रिय हो गई।
इन संकीर्ण राजनीतिक हितों को साधने के लिए देश की सुरक्षा तक को दांव पर लगाने में भी संकोच नहीं किया गया। उक्त विस्फोट के बाद महाराष्ट्र पुलिस ने नुरूल हुदा, रईस अहमद, सलमान फारसी, फारूक मगदुमी, शेख मोहम्मद अली, आसिफ खान, मोहम्मद जाहिद और अबरार अहमद सहित 9 आरोपियों को गिरफ्तार किया। उन पर मुम्बई के विशेष न्यायालय में केस चला, लेकिन अफसरशाही की विशेषता रही है कि वह अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे समझने में सिद्धहस्त है। जब ऊपर के लोग भगवा आतंक का झूठ तराश रहे थे तो अधिकारियों ने भी इसमें उनका साथ दिया। एटीएस से मामले की जाञ्च केन्द्रीय अण्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौम्पी गई, इसके बाद एनआईए को इसकी जिम्मेदारी दे दी गई। स्मरण रहे 2004 से 2014 तक चले संयुक्त प्रगतिशील सरकारों के कार्यकाल के दौरान श्री पी. चिदम्बरम् देश में गृहमन्त्री से लेकर वित्त मन्त्री जैसे बड़े पदों पर आसीन रहे, जिन्होंने हिन्दू आतंकवाद का प्रपञ्च रचने में अग्रणी भूमिका निभाई। मामले में एनआईए के प्रवेश करने के बाद से जांच की दिशा ही बदल दी गई और घटना के पीछे हिन्दू संगठनों का हाथ होने की बात कही जाने लगी। गिरफ्तार मुस्लिम आरोपियों को निर्दोष बताया जाने लगा और उनके लिए मुआवजे तक की पैरवी होने लगी। पूरे देश में गलत विमर्श स्थापित किया गया कि आतंकवाद के नाम पर अल्पसंख्यकों को परेशान किया जा रहा है जबकि इसके जिम्मेवार कोई और हैं। एनआईए ने तो न्यायालय में 2011 में स्पष्ट तौर पर कह भी दिया कि वे इन मुस्लिम आरोपियों की जमानत का विरोध नहीं करेगी। जब मामले की पैरवी ईमानदारी से नहीं की गई तो विशेष महाराष्ट्र अपराध नियन्त्रण अधिनियम (मकोका) न्यायालय में न्यायाधीश वीवी पाटिल की अध्यक्षता वाली पीठ को 26 अप्रैल, 2016 को सभी 9 मुस्लिम आरोपियों को रिहा करना पड़ा। इसके बाद एनआईए ने कथित राजनीतिक संरक्षकों के इशारे पर निरपराध हिन्दुओं को आरोपी बनाया जिसका पटाक्षेप अब धीरे-धीरे होता जा रहा है। मालेगांव केस के 220 साक्षियों में से 15 गवाह अपने साक्ष्य से पीछे हट चुके हैं, तो अब प्रश्न पैदा होना स्वभाविक है कि आखिर उक्त आतंकी घटना को आखिर किसने सिरे चढ़ाया? आतंकवाद जैसे मानवता विरोधी कृत्यों पर राजनीतिक रोटियां किसने सेकी? मामले को भटका कर वास्तविक दोषियों को बचाने का काम किसने किया? सत्ता के नशे में चूर हो कर लश्कर की आतंकी इशरत जहां को बेटी कौन बताता रहा? कौन था जो आतंकवाद में भी सन्तुलन पैदा करने का प्रयोग कर रहा था और इसके लिए निरपराध हिन्दू समाज की बलि दी जा रही थी? स्वभाविक है यह सारी करतूत सत्ता के नशे में की जा रही थी। जो विपक्ष आज मोका-बेमोका सरकार पर सत्ता के दुरुपयोग का आरोप लगाते नहीं थकता, इस प्रकरण के बाद उसे अब आत्मविश्लेषण करने की आवश्यकता है।
- राकेश सैन
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कांग्रेस और खालिस्तान में गर्भनाल का रिश्ता

माँ और सन्तान के बीच गर्भनाल का रिश्ता ही ऐसा होता है, कि प्रसव के बाद शरीर अलग होने के बावजूद भी आत्मीयता बनी रहती है। सन्तान को पीड़ा हो त...