Sunday, 3 September 2017

फूला सीना ऊंची हुई नाक

भारत ने जिस तरह शांतिपूर्वक ढंग से डोकलाम विवाद का हल निकाला वह दोनों राष्ट्रों के लिए शुभ संकेत तो है साथ में यह एक वाचाल देश पर सभ्य व शीलवान शक्तिशाली देश की कूटनीतिक जीत भी है। अंतरराष्ट्रीय मर्यादाओं के चलते चाहे इस जीत पर देशवासियों ने सार्वजनिक उत्सव न मनाया हो परंतु जीत के गौरव ने हर देशवासी के सीने की चौड़ाई तो बढ़ा ही दी है जो श्री मोदी के चीन विदा होते समय झलकी। इस जीत से जहां दुनिया ने जाना कि चीन को भी झुकाया जा सकता है वहीं आम भारतीय भी 1962 की मनोवैज्ञानिक पराजय की भावना से उबरता दिखाई दिया।

 डोकलाम सीमा विवाद हल के बाद रविवार को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी चीन में हो रहे ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए रवाना हो रहे थे उनका फूला हुआ सीना व नाक की ऊंचाई सहज ही महसूस की जा रही थी। चेहरे पर वैसे ही विजेता भाव थे जैसे द्रोपदी का स्वयंवर जीत कर विदाई के समय अर्जुन के रहे होंगे। स्वभाविक है भारत ने जिस तरह शांतिपूर्वक ढंग से डोकलाम विवाद का हल निकाला वह दोनों राष्ट्रों के लिए शुभ संकेत तो है साथ में यह एक वाचाल देश पर सभ्य व शीलवान शक्तिशाली देश की कूटनीतिक जीत भी है। अंतरराष्ट्रीय मर्यादाओं के चलते चाहे इस जीत पर देशवासियों ने सार्वजनिक उत्सव न मनाया हो परंतु जीत के गौरव ने हर देशवासी के सीने की चौड़ाई तो बढ़ा ही दी है जो आज श्री मोदी के चीन विदा होते समय झलकी। इस जीत से जहां दुनिया ने जाना कि चीन को भी झुकाया जा सकता है वहीं आम भारतीय भी 1962 की मनोवैज्ञानिक पराजय की भावना से उबरता दिखाई दिया।

डोकलाम विवाद जहां चीन के लिए हर लिहाज से नुकसानदेह था, वहीं भारत भी अकारण युद्ध नहीं चाहता। दुनिया की सर्वाधिक जनसंख्या वाले दो परमाणु शक्ति संपन्न ताकतवर पड़ोसियों के बीच इस तरह तनाव बने रहना खुद अति-संवेदनशील मामला था। ऐसे देशों में युद्ध होना विजेता एवं विजित दोनों ही राष्ट्रों को विकास के मार्ग पर सदियों तक पीछे धकेल देता।  सभी जानते हैं कि विभिन्न तरीकों से भारत की 93000 वर्ग किलोमीटर भूमि पर कब्जा जमाए हुए चीन की विस्तावरादी नीतियां किसी से छिपी नहीं। तिब्बत को हड़पने के बाद उसकी नजरें भारत पर टिकी हैं। वह आज भी अरुणाचल प्रदेश को अपना क्षेत्र बताता है। एशियाई शक्ति बनने के बाद वह भारत को अपना प्रतिद्वंद्वी मानता है और इसी कारण भारत विरोध का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देता। चाहे संयुक्त राष्ट्र में हमारी स्थाई सदस्यता की बात हो या दुर्दांत आतंकी हाफिज सईद को अंतरराष्ट्रीय आतंका घोषित करवाने के प्रयास या कोई और अंतरराष्ट्रीय मंच, चीन ने भारत का खुल कर विरोध किया है। केवल इतना ही नहीं वह सामरिक दृष्टि से भारत घेरने की पूरी कोशिश कर रहा है। निवर्तमान विवाद तब पैदा हुआ जब चीन ने भुटान के अधिकार क्षेत्र वाले पठार डोकलाम में सड़क निर्माण का काम शुरु किया। चूंकि भारत और भुटान के बीच 1949 में रक्षा समझौते हुए हैं जिसके चलते वहां की सुरक्षा भारत की जिम्मेदारी है तो इस सड़क से हमारा चिंतित होना स्वभाविक था। केवल भुटान ही नहीं, अगर यह सड़क बन जाती तो भारत का 'चिकन नेक' कहाने वाला वह अति संवेदनशील इलाका चीनी सेना की जद में आ जाता जो देश को पूर्वोत्तर के साथ जोड़ता है। चीन ने अपनी जिद्द पूरी करने के लिए सेना भेज दी तो भारत ने भी इस काम में देरी नहीं की और न केवल डोकलाम में अपनी सेना को उतारा बल्कि नियंत्रण रेखा पर सुरक्षा बलों की तैनाती भी बढ़ा दी। भारत की इस पर चीन भड़क गया, उसने अपने मीडिया के माध्यम से भारत को बार-बार युद्ध की धमकी दी और हमें उकसाने का प्रयास किया। भारत के 71वें स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को तो उत्तराखण्ड के साथ लगती सीमा पर चीनी सैनिकों ने पथराव तक किया परंतु हमारी सेना व सरकार ने धैर्य, शांति और साहस से काम लेकर न केवल चीन को कूटनीतिक तौर पर उपयुक्त जवाब दिया बल्कि उसे समझौते के लिए मना लिया। 
कुछ विशेषज्ञ बताते हैं कि चीन को मजबूरन यह फैसला लेना पड़ा क्योंकि मौजूदा हालात में वह एक साथ कई मोर्चों पर उलझा हुआ है। दक्षिणी चीन सागर को लेकर अमेरिका से उसका तनाव बहुत बढ़ गया है। ऐसे में भारत से तनाव जारी रखना उसके लिए घाटे का सौदा हो सकता था। उसके व्यापारिक और निवेश हित भारत के साथ काफी गहरे हो चुके हैं। इस मोर्चे पर होने वाला कोई भी नुकसान चीनी अर्थव्यवस्था के लिए समस्या पैदा कर सकता था। सबसे बुनियादी वजह यह है कि एक से एक विनाशकारी हथियारों की मौजूदगी के कारण युद्ध अव्यवहारिक हो गए हैं, भले सामरिक रणनीति का खेल चलता रहता हो। भारत को 1962 याद दिलवाने पर हमारे रक्षामंत्री ने भी उसे बातों ही बातों में चेता दिया कि भारत '62' वाला देश नहीं है। भारत की सामरिक क्षमता से चीन पहले ही परिचित था परंतु उसे पहली बार हमारी राजनीतिक दृढ़ता से पाला पड़ा और उसने अपने पांव पीछे हटाने में ही भलाई समझी। दूसरी तरफ इस महीने होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन के चलते भी चीन को अपने हठ से पीछे हटना पड़ा। इस सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी सहित अनेक देशों के राष्ट्राध्यक्ष जुटने के चलते चीन नहीं चाहता था कि कोई असुखद स्थिती पैदा हो या यह सम्मेलन असफल होता है तो इसका दोष चीन पर मढ़ा जाए। चीन को धीरे-धीरे लगने लगा था कि दबाव बनाने की रणनीति और डराने-धमकाने की भाषा नहीं चलेगी।
भारत और चीन आज हजारों मजबूत धागों से एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। दोनों देश दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताएं हैं। फाहयान व ह्यूनसांग जैसे चीनी यात्रियों ने सदियों पहले भारत की यात्रा कर दोनों देशों को सांस्कृतिक रूप से बंधन में बांध दिया। चीन में कम्यूनिस्ट क्रांति के बाद चाहे वहां की सरकारी नीति नास्तिक रही हो परंतु शांति के मसीहा बुद्ध दोनों देशों को सांझी विरासत पर गर्व करने का अवसर प्रदान करते हैं। वर्तमान में दोनों देशों के बीच बढ़े व्यापारिक रिश्तों ने दोनों देशों को एक-दूसरे के लिए जरूरी बना दिया है। भारत चीनी सामान के लिए न केवल एक बड़ा बाजार है बल्कि कच्चे माल की आपूर्ति का साधन भी है। चीन की बड़ी कंपनियां व उद्योगिक घराने नहीं चाहते कि दोनों देशों में अशांति या तनाव हो जिसका असर उनके व्यापार पर पड़े। 
चीन ने जिस तरह अपना चेहरा बचाते हुए अपने कदम पीछे खींचे उसका एक मनोवैज्ञानिक लाभ यह भी हुआ है कि भारत की आम जनता 1962 के युद्ध की कड़वी यादों को भूला कर आत्मविश्वास से लबरेज हुई है। युगों का इतिहास साक्षी रहा है कि भारत ने कभी किसी दूसरे देश पर आक्रमण या उसकी धरा पर अतिक्रमण नहीं किया है। हमारी सैनिक तैयारियां रक्षात्मक रही हैं। परमाणु शक्ति राष्ट्र होते हुए भी हम पड़ौसियों से 'पहले परमाणु बम का प्रयोग न करनेÓ के समझौते कर चुके हैं। 1971 में भारत ने न केवल पाकिस्तान से विजित क्षेत्र खाली कर दिए बल्कि 93000 युद्धबंदियों को भी बिना शर्त रिहा कर दिया। 1980 के दशक में भारतीय सेना ने फिजी को विद्रोहियों से मुक्त करवा कर उसे वहां के नेतृत्व को सुपुर्द कर दिया न कि वहां पर कब्जा किया। आज भी भारतीय शांति सेनाएं जिस देश में जाती है वहां प्रेम व मित्रता के माध्यम से वहां के नागरिकों का दिल जीतती है। अतीत में इसी देश के राजकुमार श्रीराम ने लंका जीतने के बाद वहीं के निवासियों को सुपुर्द कर दी, उस पर शासन नहीं किया। इन बातों से स्पष्ट है कि भारत न तो किसी की जमीन का भूखा है और न ही उसे अपनी शक्ति पर अहंकार है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ठीक ही कहा है कि वह युग बीत चुका जब सैनिक शक्ति से किसी राष्ट्र की अहमीयत स्वीकार की जाती थी, वर्तमान में तो आर्थिक आधार पर रुतबा बनता या बिगड़ता है। सैनिक टकरावों के बाद भी दोनों पक्षों को बातचीत के लिए बैठना ही पड़ता है तो क्यों न यह काम युद्ध से पहले कर लिया जाए ताकि लड़ाई की नौबत ही न आए। यही कारण है कि भारत ने जहां डोकलाम मुद्दे पर साहस व धैर्य का परिचय दिया जिससे हमारी बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत हुई और उसी जीत ने अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में हमारा रुतबा बढ़ा, सीना फूला और नाक भी ऊंची की।

- राकेश सैन
मोबाईल - 097797-14324



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