Sunday, 3 September 2017

लिंचिंगस्तान में बंगाल भी शामिल है या नहीं ?

 ममता दीदी दुर्गा पूजा कार्यक्रम सीमित करने जा रही है। कारण है कि उसी दिन मोहर्रम पडऩे वाला है।  जिस समय ताजिया निकल रहा होगा उस समय दुर्गा पूजा पर रोक रहेगी। कैसा पाखण्ड है छद्म-धर्मनिरपेक्षतावाद है ?  कीजिए अगर यही आदेश किसी भाजपा शासित प्रदेश में दिए गए होते, वहां दुर्गा पूजा के समय किसी और धर्म की रस्मो रिवाज पर रोक लगाई होती तो देश में कोहराम मच जाना था। कांग्रेस दहाड़ें मारती, वामपंथी छाती पीटते, बुद्धिजीवी हाहाकार मचा रहे होते। तर्क दिया जा सकता है कि दुर्गा पूजा और मोहर्रम निकालते समय शरारती तत्व टकराव पैदा कर सकते हैं। यह तर्क निराधार भी नहीं है ,लेकिन दो  त्यौहार एकसाथ आते हैं तो दोनों के सफल आयोजन सुनिश्चित  किया जाए। ताजिया भी निकले और दुर्गा पूजा भी हो। ऐसे में शरारती तत्वों पर कड़ी नजर रख कर, उन्हें हिरासत में लेकर, दोनों समुदायों के वशिष्ठ व्यक्तियों को परस्पर बैठा कर, सद्भावना समितियां गठित करके यह काम आसानी सुचारू ढंग से किया जा सकता था। लेकिन जिस तरह ममता दीदी का अभी तक का व्यवहार रहा है उससे लगता है कि उनका लक्ष्य सद्भावना नहीं बल्कि मुस्लिम तुष्टिकरण है।

देश में पिछले समय कुछ स्थानों पर गौ-हत्या या तस्करी के संदेह में हुई अपराधिक घटनाओं के बाद सेक्यूलर बिरादरी ने हिंदुस्तान को 'लिंचिगस्तान' अर्थात हत्या की सरजमीं कहना शुरू कर दिया है। यह सही है कि हमारे समाज में भीड़तंत्र द्वारा किए जाने वाले अपराध बढ़े हैं परंतु जब जुर्म को भी सांप्रदायिकता की नजरों से देखा जाने लगे तो इसे राजनीति की अधोगति ही कहा जा सकता है।
विगत दिनों पश्चिमी बंगाल में ग्यारहवीं कक्षा के नाबालिग छात्र द्वारा एक इस्लामी चिह्न की बेअदबी इतनी भारी पड़ी कि उसके बाद ऐसी भीड़ इकट्ठी हुई जो कानून-व्यवस्था को ढहा देने की हद तक चली गई, जबकि उस छात्र को हिरासत में भी लिया गया था। भीड़ इससे भी नहीं मानी और उत्पात मचाती रही। भीड़ उस छात्र की गिरफ्तारी से भी कुछ अधिक चाहती थी। मानो उनके लिए कानून और संविधान के दायरे में रह कर उससे अधिक दंड संभव नहीं था लिहाजा, भीड़ ने उस छात्र के हम-मजहब लोगों को आतंकित करना शुरू किया। एक धर्मनिरपेक्ष देश के लिए यह शर्मनाक बात थी।
हमारे देश की कुछ तथाकथित सेक्युलर मिजाज की पार्टियों ने वोट के लिए कैसे एक समुदाय विशेष को तुष्ट किया है, उसके भीतर के कट्टरपंथ को पाला-पोसा है और उसमें कानून-व्यवस्था और बहुसंख्यक वर्ग की भावनाओं के ऊपर होने का एहसास भरने का काम किया है। आज ममता बनर्जी और देश के तथाकथित बुद्धिजीवियों के लिए यह कहना आसान है कि आगामी चुनावों को देखते हुए भाजपा वहां ध्रुवीकरण का कार्ड खेल रही है। मगर यह सच से कोसों दूर भागने जैसा होगा क्योंकि अगर भाजपा ऐसा कर रही है तो उसी राजनीति के दूसरे छोर पर वे खुद भी खड़े दिखाई दे रहे हैं।
समाचार मिला है कि ममता दीदी दुर्गा पूजा कार्यक्रम सीमित करने जा रही है। कारण है कि उसी दिन मोहर्रम पडऩे वाला है। मोहर्रम के समय निकाले जाने वाले पवित्र ताजीया पर माँ दुर्गा की प्रतिमा (इस्लाम की भाषा में बुत्त) की छाया न पड़ जाए और इस्लाम की पवित्रता बरकरार रखी जा सके इसीलिए जिस समय ताजिया निकल रहा होगा उस समय दुर्गा पूजा पर रोक रहेगी। कैसा पाखण्ड है छद्म-धर्मनिरपेक्षतावाद है ? क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ एक समुदाय पर प्रतिबंध लगा कर दूसरे को प्रोत्साहित करना। कल्पना कीजिए अगर यही आदेश किसी भाजपा शासित प्रदेश में दिए गए होते, वहां दुर्गा पूजा के समय किसी और धर्म की रस्मो रिवाज पर रोक लगाई होती तो देश में कोहराम मच जाना था। कांग्रेस दहाड़ें मारती, वामपंथी छाती पीटते, बुद्धिजीवी हाहाकार मचा रहे होते। तर्क दिया जा सकता है कि दुर्गा पूजा और मोहर्रम निकालते समय शरारती तत्व टकराव पैदा कर सकते हैं। यह तर्क निराधार भी नहीं है क्योंकि हमारे देश में उन शरारती व असमाजिक तत्वों की कमी नहीं हो चिताओं की आग पर वोटों के मालपुए तलते हैं। इस काम में किसी का घर उजड़े या मांग सूनी हो इनको फर्क नहीं पड़ता। सावधानी बरतना और कानून व्यवस्था बनाए रखना हर सरकार का दायित्व है परंतु क्या सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर और दोनों समुदायों में विश्वास बढ़ा कर यह काम नहीं किया जा सकता ?
धर्मनिरपेक्ष सरकारों का दायित्व बनता है कि अगर किन्हीं दो धर्मों या समुदायों के पर्व एकसाथ आते हैं तो दोनों के सफल आयोजन सुनिश्चित किया जाए। ताजिया भी निकले और दुर्गा पूजा भी हो। ऐसे में शरारती तत्वों पर कड़ी नजर रख कर, उन्हें हिरासत में लेकर, दोनों समुदायों के वशिष्ठ व्यक्तियों को परस्पर बैठा कर, सद्भावना समितियां गठित करके यह काम आसानी सुचारू ढंग से किया जा सकता था। लेकिन जिस तरह ममता दीदी का अभी तक का व्यवहार रहा है उससे लगता है कि उनका लक्ष्य सद्भावना नहीं बल्कि मुस्लिम तुष्टिकरण है। गाहेबगाहे वह मुस्लिम समाज के सामने यह प्रदर्शित करती आई है कि बंगाल में उसके अतिरिक्त उनका कोई हमदर्द नहीं है। इस होड़ में वह कांग्रेस और वामपंथियों से आगे है और अपनी बढ़त बनाए रखना चाहती हैं। धर्मनिरपेक्षता की एकतरफा व्याख्या न तो लोकतंत्र के लिए हितकारी है और न ही इस देश-समाज के लिए। हमारे धर्मनिरपेक्षता के महामण्डलेश्वरों को नए सिरे से सेक्युलरिजम का ककहरा पढऩा होगा।

- राकेश सैन
मोबाईल - 097797-14324

No comments:

Post a Comment

कांग्रेस और खालिस्तान में गर्भनाल का रिश्ता

माँ और सन्तान के बीच गर्भनाल का रिश्ता ही ऐसा होता है, कि प्रसव के बाद शरीर अलग होने के बावजूद भी आत्मीयता बनी रहती है। सन्तान को पीड़ा हो त...