Wednesday, 13 September 2017

अबु सलेम को उम्रकैद, देर भी तो अंधेर है

 भारत की साफ्ट स्टेट की स्थिति बनने का एक बड़ा कारण अदालतों की ढिलाई भी रहा है। सभी जानते हैं कि वोट बैंक की राजनीति, पंथिक व जातिगत तुष्टिकरण, मानवाधिकारवादियों के चलते एक तो किसी आतंकी या आतंकी संगठन पर कार्रवाई मुश्किल हो रही है और ऊपर से न्यायिक प्रक्रिया में देरी आतंकियों को प्राणदायी साबित होती है। अगर कोई पुलिस अधिकारी हौंसला कर किसी आतंकी या संगठन का पर्दाफाश भी कर देता है तो निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दर याचिका दायर कर अपराधी को दंड देना इतना मुश्किल हो जाता है कि न्याय आने तक उसकी सार्थकता पर ही सवालिया निशान लग जाता है, जैसे कि मुंबई बम विस्फोट मामले में हुआ है।                                                                                                                                                                             अकसर कहा जाता है कि भगवान के दर देर है अंधेर नहीं, परंतु जब देर ज्यादा हो जाए तो वह अंधेर से भी ज्यादा अन्यायी साबित होती है। दो सदी पहले 1809 में जन्मे ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम ई. ग्लैडस्टोन ने एक बार कहा था कि 'न्याय में देरी भी अन्याय' है। भारतीय अदालतें समय-समय पर इस उक्ति को चरितार्थ करती रही हैं परंतु मुंबई बम विस्फोट मामले जैसे संगीन अपराध पर एक चौथाई सदी बाद न्याय होना हमें विश्लेषण करने का अवसर प्रदान करता है कि आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दे पर क्या इतने विलंब से न्याय ठीक है? एक तरफ हम आतंकवाद के प्रति 'शून्य सहनशीलता' (जीरो टोलरेंस) की बात करते हैं तो दूसरी ओर इस अपराध पर इतनी लंबी न्यायिक देरी कि इसके होते-होते एक पीढ़ी ही बीत जाए। मुंबई की विशेष आतंकवाद एवं विध्वसंक गतिविधि अधिनियम (टाडा) अदालत ने सरगना अबू सलेम व करीमुल्ला खान को 12 मार्च,1993 के मुंबई बम विस्फोटों के मामले में आजीवन कारावास तथा ताहिर मर्चेन्ट और फिरोज खान को फांसी की सजा सुनाई है। चाहे यह न्याय की जीत है, पर यह बेहद खटकने वाली बात है कि इस मामले को तार्किक परिणति तक पहुंचने में इतना लंबा समय लगा। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इस मामले की जांच प्रक्रिया और न्यायिक प्रक्रिया काफी पेचीदा थी। ढेर सारे सबूतों की छानबीन और सैकड़ों गवाहों के बयान लेने, बहुत-सी बिखरी हुई कडिय़ों को जोडऩा, विदेश भाग चुके आतंकियों को वापस लाना आसान काम नहीं था। इन धमाकों ने 257 लोगों की जान ले ली थी और कोई सात सौ से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। मुंबई ही नहीं, पूरा विश्व इस कांड से स्तब्ध रह गया था। आतंकवाद के सिलसिले में मुंबई के अंडरवल्र्ड की इतनी प्रमुख भूमिका इससे पहले कभी सामने नहीं आई थी। दाऊद इब्राहिम, टाइगर मेनन, याकूब मेनन से लेकर अबू सलेम तक, सब इसे अंजाम देने वालों में शामिल थे।  वैसे सुनवाई का पहला चरण 2007 में ही पूरा हो गया था। तब अदालत ने याकूब मेनन सहित कोई सौ लोगों को सजा सुनाई थी। याकूब को फांसी की सजा दी गई। अबू सलेम और तीन अन्य के खिलाफ सुनवाई देर से शुरू हुई, क्योंकि इनकी गिरफ्तारी बाद में हुई थी। मुंबई धमाकों को अंजाम देने के लिए अबू सलेम ने हथियार और विस्फोटक उपलब्ध कराए थे। उसकी भूमिका और पहले आए फैसलों को देखते हुए उसे भी फांसी हो सकती थी। पर वह बाहर भाग गया था और पुर्तगाल में पकड़ा गया। पुर्तगाल समेत यूरोपीय संघ के देशों में मृत्युदंड पर प्रतिबंध है और वे बाहर के अपराधी को तब तक संबंधित सरकार को प्रत्यार्पित नहीं करते, जब तक यह पक्का आश्वासन न मिल जाए कि उसे मृत्युदंड नहीं दिया जाएगा। भारत की तत्कालीन सरकार ने न सिर्फ ऐसा आश्वासन पुर्तगाल सरकार को दिया बल्कि इसके लिए अपने प्रत्यर्पण कानून में आवश्यक संशोधन भी किया, और इसी के फलस्वरूप अबू सलेम को 2005 में भारत लाया जा सका। मूल विषय पर लौटते हैं और बात करते हैं न्यायिक देरी की। इसका सबसे बड़ा कारण अदालतों में बढ़ रहे केसों व न्यायिक अधिकारियों की कमी को बताया जा रहा है। वर्तमान में देश भर की जिला अदालतों में 2.8 करोड़ मामले लंबित हैं और इन अदालतों में करीब 5,000 न्यायिक अधिकारियों की कमी है जो बेहद चिंताजनक स्थिति है। इस स्थिति के मद्देनजर उच्चतम न्यायालय की दो रिपोर्टों में न्यायिक अधिकारियों की संख्या को कम से कम सात गुणा बढ़ाने की सिफारिश की गई थी ताकि आगामी कुछ वर्षों में करीब 15,000 से अधिक न्यायाधीशों की नियुक्ति करके इस संकट से उबरा जा सके। न्यायालय की दो रिपोर्टों 'भारतीय न्यायपालिका वार्षिक रिपोर्ट 2015-16' एवं 'भारत की अधीनस्थ अदालतें'  न्याय तक पहुंच पर रिपोर्ट 2016' में ये सुझाव दिए गए हैं और कई तीखी टिप्पणियां की गई हैं। 'भारत की अधीनस्थ अदालतें' न्याय तक पहुंच पर रिपोर्ट 2016' में कहा गया है कि इस चिंताजनक स्थिति से उबरने के लिए आगामी तीन वर्षों में 15,000 से अधिक न्यायाधीशों की आवश्यकता होगी। मामले लंबित होने का एक अहम कारण अधीनस्थ अदालतों में न्यायाधीशों की कमी है। अधीनस्थ अदालतों पर रिपोर्ट के अनुसार, न्यायिक अधिकारियों की स्वीकृत संख्या 21,324 है और न्यायाधीशों के 4,954 पद रिक्त पड़े हैं। लगभग यही स्थिति देश की सभी जिला अदालतों से लेकर उच्च न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय तक की है। अदालतों में बढ़ रहे विचाराधीन केसों की संख्या के पीछे अन्य भी कारण बताए जा रहे हैं जैसे माननीय न्यायाधीशों की काम में घट रही रुचि, साल दर साल बढ़ रहे अवकाश, शिकायतकर्ताओं द्वारा केस को मजबूत करने के भ्रम में बोला जाने वाला झूठ, पुलिस प्रणाली में भ्रष्टाचार व राजनीतिक हस्तक्षेप व लालफीताशाही परंतु कारण जो भी हो भुगतना देश के आम नागरिक को पड़ रहा है जिनके लिए न्याय का अंतिम ठिकाना अदालतें ही हैं। विश्व में भारत की साफ्ट स्टेट की स्थिति बनने का एक बड़ा कारण अदालतों की ढिलाई भी रहा है। सभी जानते हैं कि वोट बैंक की राजनीति, पंथिक व जातिगत तुष्टिकरण, मानवाधिकारवादियों के चलते एक तो किसी आतंकी या आतंकी संगठन पर कार्रवाई मुश्किल हो रही है और ऊपर से न्यायिक प्रक्रिया में देरी आतंकियों को प्राणदायी साबित होती है। अगर कोई पुलिस अधिकारी हौंसला कर किसी आतंकी या संगठन का पर्दाफाश भी कर देता है तो निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दर याचिका दायर कर अपराधी को दंड देना इतना मुश्किल हो जाता है कि न्याय आने तक उसकी सार्थकता पर ही सवालिया निशान लग जाता है, जैसे कि मुंबई बम विस्फोट मामले में हुआ है। जब तक हम गंभीर अपराधों व आतंकवाद के लिए त्वरित न्यायिक प्रक्रिया की व्यवस्था नहीं करेंगे तब तक यह असमाजिक तत्व यूं ही दनदनाते फिरते रहेंगे। 257 लोगों की मौत की नींद सुलाने वाले व 700 लोगों को घायल करने वाले अपराधियों को उनके अंजाम तक पहुंचाने में अगर एक चौथाई सदी लग जाए तो एक आम नागरिक किस आस से अदालतों से जल्द न्याय की अपेक्षा कर सकता है ?     - राकेश सैन

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