Friday, 4 May 2018

मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की

दशकों से देखने में आरहा है कि कृषि व किसानों के उद्धार के लिए जितने कल्याणकारी कदम उठाए जा रहे हैं समस्या उतनी विकराल हो रही है। पंजाब में किसानों को निशुल्क बिजली सहित अनेक सुविधाएं देने के बावजूद आए दिन कहीं न कहीं भूमिपुत्र आत्महत्या करता है। कई प्रांतों में कृषि ऋण माफ करने, मंडीकरण, आधुनिकीकरण, हरित, श्वेत, नील क्रांति सहित अनेक कदमों के बावजूद खुदकुशियों का सिलसिला रुक नहीं पा रहा। समय है कि पता लगाया जाए कि समस्या की जड़ आखिर है कहां और क्या इसका समाधान है?

खेत-खलिहान व किसान की समस्याओं के समाधान पर चर्चा करते हुए 'एकात्म मानववाद' के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के विचारों का स्मरण न हो यह संभव नहीं। उन्हें किसानों के पैतृक व स्थानीय ज्ञान पर बहुत भरोसा था। वे कहते थे 'भारत के किसान ने परिस्थितियों के अनुरूप पद्धति का विकास किया है। युगों से चली आई पद्धति को एकाएक नहीं छोड़ देना चाहिए।' भारत का किसान फसलों की अदल-बदल कर बुवाई, हरी खाद का प्रयोग, मलमूत्र की खाद को पका कर उपयोग करना, भू-क्षरण रोकने के लिए मेड़ बाँधना तथा वृक्ष लगाना आदि अनेक विधियों को भली-भांति जानता है। उसने युगों से भूमि की उर्वरता को बनाए रखा है।

आज पूरी दुनिया कीटनाशकों के जहर से त्रस्त है। पंडित जी ने 50 वर्ष पूर्व ही चेताया था कि भूमि की उपजाऊ-शक्ति बनाए रखने के लिए खाद की आवश्यकता है, किन्तु जमीनों का सर्वेक्षण, उत्पादन की पद्धति, फसल, सिंचाई के साधन आदि का विचार करके ही उसके उपयुक्त एवं योग्य मात्रा में खाद एवं उर्वरक का उपयोग होना चाहिए। पांच दशक से भी पहले उन्होंने उन्नत बीजों के संबंध में हमारे शासकों को चेताया था। आज भी लगभग वह स्थिति बनी हुई है। पंडित जी विदेशी ज्ञान अथवा तकनीक के विरोधी नहीं थे, उन्होंने कहा कि हम विदेशों के परीक्षणों का लाभ अवश्य उठा सकते हैं, किन्तु अनुकरण नहीं कर सकते। बाहरी ज्ञान के आधार पर अपने यहां अनुसंधान-केन्द्रों में पहले परीक्षण करके अपने गांव की परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में ही उसका उपयोग करना चाहिए।

आज हम सही मूल्य पर बिक्री की समस्या से जूझ रहे हैं। यह समस्या सुलझने की बजाए विकराल रूप लेती जा रही है। पंडित जी कहते थे कि उत्पादन-वृद्धि के कार्यक्रमों के साथ ही कृषि-माल के विपणन एवं ऋ ण की व्यवस्था भी करनी होगी, किन्तु बाजारों की योग्य व्यवस्था न होने के कारण किसान को कभी उचित दाम नहीं मिल पाया है। लेकिन वे किसान व ग्राम विकास को सिर्फ खेतीबाड़ी तक ही सीमित नहीं रखते थे। उनका मानना था कि जब तक हम देशभर में कुटीर उद्योगों का जाल नहीं बिछाएंगे, तब तक यह विकास अधूरा रह जाएगा। देश में स्थानीय संसाधनों व स्थानीय कौशल के आधार पर स्थानीय बाजार बनें तो हम सही अर्थों में सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात कर सकते हैं। इसके लिए परंपरागत धंधों में कौशल विकास और देश की परिस्थितियों के अनुकूल होने के आग्रह के साथ ही समय के साथ उनके कदमताल करने की चिंता भी करनी होगी। समग्र विकास का सूत्र खेती के साथ अन्य कुटीर उद्योगों के उन्नयन से ही पूरा होता है। एकतरफा विकास में तो हम वैश्वीकरण की आंधी में बह जाएंगे।

आज जब देश का किसान व कृषि आकण्ठ संकट में है तो इसके सभी पहलुओं व सभी पक्षों पर विचार करना जरूरी है। सुझाव है कि केंद्र सरकार किसानी समस्याओं पर विशेष संसदीय सत्र बुलाए, जिसमें सभी पक्षों के विचार, उनके सुझाव, उनके अनुभव लिए जाएं। चर्चा में इस बात पर समय व्यर्थ न गंवाया जाए कि किस दल ने क्या किया और किस दल ने क्या नहीं। चर्चा के बाद सर्वमान्य कृषि नीति बने और देश में लागू हो। तमाम सूचना क्रांति, उद्योगिक विकास, आधुनिक तकनीकों के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था आज भी कृषि पर निर्भर है। हम किसानों को किस्मत के सहारे छोड़ कर न तो भूमिपुत्रों का भला करेंगे और न ही देश का।

- राकेश सैन
32, खण्डाला फार्मिंग कालोनी,
वीपीओ रंधावा मसंदा,
जालंधर।
मो. 09779-14324

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