Saturday, 1 February 2020

Gidda-Bhangra under Talibani Attack

गिद्दे-भंगड़े पर तालिबानी त्यौरियां
'मेहन्दी.. मेहन्दी.. मेहन्दी.. नच्चां मैं अम्बाले मेरी धमक जलन्धर पैन्दी', पंचनद क्षेत्र के लोकनृत्य गिद्दे-भंगड़े की लोकप्रियता वर्तमान में इस कदर आसमान छू रही हैं कि इनके बिना आज पंजाब तो क्या भारत भर में शायद ही शादी विवाह सम्पन्न होते होंगे। लेकिन गिद्दे-भंगड़े की जन्मभूमि में ही इसपर तालिबानी त्यौरियां चढ़ी दिख रही हैं जिसकी तपिश समाज ने अभी महसूस नहीं की। 'नचणु कुदण मन का चाउ' का सन्देश देने वाले सिख गुरुओं की पावन नगरी अमृतसर से कट्टरपन्थियों की जिद्द के चलते गिद्दा-भंगड़ा डालने वाली प्रतिमाएं हटाई जा रही हैं। कुछ कट्टरपन्थियों ने यह कहते हुए इन प्रतिमाओं को खण्डित कर दिया कि हरिमन्दिर साहिब के मार्ग पर इस तरह की अश्लीलता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। राज्य के मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने तालिबानी मानसिकता के आगे घुटने टेकते हुए इन प्रतिमाओं को हटाने के आदेश दिए और इनका पालन होना भी शुरु हो चुका है।  

वर्ष 2016 में तत्कालीन शिरोमणि अकाली दल बादल-भारतीय जनता पार्टी गठबन्धन सरकार ने अमृतसर स्थित हरिमन्दिर साहिब के पास विरासती गलियारे का परियोजना लागू की थी। इसके तहत जहां नगर का सौंदर्यीकरण किया गया वहीं पंजाब की परम्परा को दर्शाते प्रतिमाएं स्थापित की गईं। इनमें भंगड़ा-गिद्दा डालते हुए युवक-युवतियों को भी प्रदर्शित किया गया। कठमुल्लावादी संगठनों का मत है कि गुरुद्वारे को जाने वाले मार्ग पर इस प्रकार की प्रतिमाएं सहन नहीं और इससे युवा पीढ़ी पथभ्रष्ट हो रही है, इसके स्थान पर गुरु साहिबान से जुड़े उपदेशों को प्रदर्शित किया जाना चाहिए। गत सरकार का उद्देश्य इस गलियारे के माध्यम से राज्य में पर्यटन व संस्कृति को प्रोत्साहन देना रहा। सरकार का प्रयास असफल भी नहीं गया क्योंकि अमृतसर में आने वाले भारतीय व विदेशी पर्यटक इस गलियारे में जरूर भ्रमण करते हैं। इसके चलते नगर में पर्यटकों की संख्या में भी वृद्धि दर्ज की गई है परन्तु बामियान में बुद्ध प्रतिमाओं पर तोप चलाने जैसी सोच के चलते सरकार ने इन प्रतिमाओं को हटाने की कार्रवाई शुरू कर दी है और इन प्रतिमाओं को पर्यटन विभाग को सौंपा जा रहा है।

गिद्दा-भंगड़ा पंजाब की युगों पुरानी प्राचीन धरोहर रहा। माना जाता है कि महाभारत काल से ही इस भू-भाग पर महिला-पुरुष मण्डल बना कर ढोल की थाप पर नाचते हैं और बोलियां डालते हैं। महिलाओं के नाच को गिद्दा व पुरुषों के नाच को भंगड़ा कहा जाता है। दरअसल गिद्दा-भंगड़ा केवल लोकनाच ही नहीं बल्कि पंजाबी संस्कृति की झलक है जिसमें समस्त जीवन का लोकाचार छिपा है। गिद्दे-भंगड़े की बोलियां सामाजिक व व्यक्तिगत जीवन के हर क्षेत्र को छूता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो गिद्दा-भंगड़ा पंजाबी संस्कृति का महाकोष है जिसके जरिए कोई भी देश के इस स्मृद्ध क्षेत्र में सदियों से पनपी संस्कृति के बारे जान सकता है। एक जीवन्त कला के कारण बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक में गिद्दे-भंगड़े की धूम है लेकिन अब यही अमीर विरासत पर तालिबानी त्यौरियां चढ़ती दिख रही हैं। देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान में रह गए पंजाब में तो गिद्दा-भंगड़ा लगभग लुप्त हो गया और अब भारतीय पंजाब में भी इस पौराणिक गंधर्वकला पौंगापन्थियों के निशाने पर है।

वैसे पंजाब में तालिबानी वायरस का यहां की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर पर कोई नया हमला नहीं, बल्कि राज्य आतंकवाद के दौर में भी इस तरह की शर्मनाक घटनाएं देख चुका है। राज्य में आतंकवाद के काले दौर में उग्रवादियों ने फिल्म स्टार धर्मेन्द्र के चचेरे भाई पंजाबी फिल्मों के सुपरस्टार विरेंद्र की 6, दिसम्बर 1988 को गोलियां मार कर हत्या कर दी। इसी साल आतंकियों ने 8 मार्च को पंजाबी गायक अमर सिंह चमकीला को भी गोलियों से भून दिया जब वो एक गांव में अपना कार्यक्रम (अखाड़ा) पेश करने गए। चमकीला व वरिन्द्र पर भी आतंकियों ने इसी तरह अश्लीलता फैलाने के आरोप लगाए थे। अभी हाल ही में हिन्दी भाषा को लेकर दिए ब्यान को लेकर सदाबाहार पंजाबी गायक गुरदास मान भी इन कट्टरपन्थियों की शाब्दिक चान्दमारी झेल रहे हैं। वे जहां भी जाते हैं उनका घेराव किया जाता है। पंजाबी संस्कृति के सेवक को गद्दार बता कर उन्हें अपमानित किया जाता है। गुरदास मान का अपराध केवल इतना है कि भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की हां में हां मिलाते हुए उन्होंने कह दिया कि देश की एक भाषा अवश्य होनी चाहिए। उनका भाव था कि पूरे देश में एक ऐसी भाषा अवश्य हो जिसमें पूरे देशवासी आपस में सन्वाद कर सकें लेकिन कट्टरपन्थियों ने इसका अर्थ यह निकाला कि गुरदास मान पंजाबी की बजाय हिन्दी लागू करने का समर्थन कर रहे हैं। यहां यह बताना भी जरूरी है कि 1960 के दशक में पंजाब में हिन्दी-पंजाबी को लेकर विवाद हो चुका है और कट्टरपन्थी लोग गाहे-बगाहे आज भी इस विवाद को चिंगारी लगाने का प्रयास करते रहते हैं।
पंजाब की संस्कृति स्वभाव से ही रंगों, नृत्य, हंसी-खुशी, गीत-संगीत, खुलदिली का गुण धारण किए हुए है। यहां के लोगों ने हर नए विचार व आचार-व्यवहार को खुले मन से स्वीकार किया है। इन्हीं गुणों के चलते पंजाब की पूरे देश ही नहीं बल्कि विश्व में अपनी विशेष पहचान है। अपनी वाणी में श्री गुरु नानक देव जी ने भी 'नचणु कुदण मन का चाउ' अर्थात नाचना-कूदना मन का चाव का सन्देश दिया परन्तु एक कुण्ठित सोच गुरु के इन आदेशों का भी उल्लंघन करती हुई दिखाई दे रही है। हैरानी की बात है कि इस दकियानूसी सोच को पंजाबी मीडिया के एक बड़े वर्ग का समर्थन भी मिल रहा है। पंजाब सरकार ने तो मानो इसके सामने समर्पण ही कर दिया है। 19 जनवरी को कुछ कट्टरपन्थी लोगों ने अमृतसर के विरासती गलियारे में लगी गिद्दा-भंगड़ा डालने वाली प्रतिमाओं को क्षतिग्रस्त कर दिया। पुलिस ने इनके खिलाफ आपराधिक मामला भी दर्ज किया और चण्डीगढ़ में गिरफ्तारी भी हुई परन्तु मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरिन्द्र सिंह अब न केवल इन प्रतिमाओं को हटाना शुरु करवा दिया बल्कि उनके खिलाफ केस भी वापिस लेने की बात कही है। पंजाबी समाज के एक वर्ग में घर कर रही तालिबानी मानसिकता वास्तव में ही चिन्ता का विषय होना चाहिए परन्तु पूरे मामले का दुखद पहलू यह भी है कि खतरनाक घटना पर समाज के बाकी हिस्से ने भी मौन धारण किया हुआ है। गिद्दे और भंगड़े को अपनी किस्मत के सहारे छोड़ दिया गया लगता है।
- राकेश सैन
32, खण्डाला फार्मिंग कालोनी,
वीपीओ लिदड़ा,
जालन्धर।
सम्पर्क - 77106-55605

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