Sunday, 10 September 2017

'इशरत' और 'इशरत' में सेक्यूलर भेद

एक इशरत जहां थी लश्कर-ए-तैयबा की आतंकी, जो अपने पाकिस्तानी साथियों के साथ गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने अहमदाबाद पहुंची। उसकी मौत पर सेक्युलर बिरादरी खूब सियारों की भांति सुर में सुर मिला कर रोई। दूसरी इशरत है बंगाल की रहने वाली भारत की वह बेटी जिसने मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से आजादी दिलवाई, सामाजिक बहिष्कार, कट्टरपंथियों की धमकियों का अकेले सामना कर रही है परंतु उसकी सुनने वाला कोई नहीं। सेक्युलर सियार बिरादरी घुरी में बंद है। ममता बैनर्जी ने उसे सुरक्षा तक उपलब्ध नहीं करवाई है। न मोमबत्ती, न डिबेट, न संपादकीय, न लेख, न अवार्ड वापसी न ही मेमोरेंडम आखिर यह कैसा सेक्युलरिजम है जो इशरत और इशरत में भेद करना सिखाता है?
 अल्पस्मृति से ग्रसित भारतीय समाज से उम्मीद है कि अभी वह इशरत जहां और इशरत को नहीं भूला होगा। ये दोनों भारत की बेटीयां हैं। एक बेटी इशरत ने अपने खिलाफ हुए अन्याय के खिलाफ अदालत और अपने समाज से लंबी लड़ाई लड़ी। खूब लांछन सहे, ताने सुने, पैसे न होते हुए भी कोलकाता से नई दिल्ली हर तारीख पर मौजूद रही और न्यायालय का निर्णय आया तो उसने पलट दी अपने जैसी 9 करोड़ अन्य महिलाओं की किस्मत, जो तीन तलाक के नाम पर अभी तक अपने आप को मनुष्य होने पर भी संदेह करती थीं। हावड़ा की छोटी से बस्ती में चौबीस बाई सात फुट कमरे में जीवन व्यतीत करने वाली इस इशरत ने करोड़ों भारतीय मुस्लिम महिलाओं को उडऩे के लिए खुला आसमान उपलब्ध करवा दिया।
इसी तरह दूसरी बेटी इशरत जहां थी, 19 साल की कॉलेज छात्रा, लश्कर की आतंकी। पिछले दशक 15 जून 2004 को अहमदाबाद पुलिस की अपराध शाखा ने इशरत सहित चार लोगों को मुठभेड़ में मारने सफलता हासिल की। मुंबई के मुंब्रा इलाके मे रहने वाली इशरत जहां अपने साथियों के साथ गुजरात में आई थी वहां के मुख्यमंत्री एवं वर्तमान में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने के लिए। उसके साथी थे जावेद उर्फ प्रणेश पिल्लै, जीशान जौहर और अमजद अली जो चारों लोग लश्कर के आतंकी थे। गुजरात पुलिस ने आईबी की सूचना पर इस आप्रेशन को अंजाम दिया था। केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से गुजरात उच्च न्यायालय में एक शपथपत्र दाखिल किया गया। इसमें ये कहा गया कि केंद्र सरकार को इस बात के पुख्ता सबूत मिले थे कि लश्कर ए तैयबा गुजरात सहित भारत के कई हिस्सों में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देना चाहता है, साथ में कई बड़े नेताओं की हत्या की साजिश भी रच रहा था। लश्कर में ये जिम्मेदारी मुजम्मिल नामक आतंकी को दी गई थी, जिसके नियमित संपर्क में था इशरत का दोस्त जावेद उर्फ प्रणेश पिल्लै। जावेद ने इशरत को अपने साथ इसलिए रखा था, ताकि देश के तमाम शहरों में जब वो आतंकी गतिविधियों की योजना बनाने या फिर उसे लागू करने के लिए जाए और इशरत का साथ रहना उसके लिए कवर का काम करे। मारे गए जीशान व जौहर पाकिस्तान मूल के थे। अमेरिका में गिरफ्तार आतंकी डेविड कोलमैन हेडली ने भी इशरत जहां को इस्लामिक जिहादी माना और लश्कर के मुखपत्र गजवा टाइम्स ने इशरत और उसके साथ मारे गये लोगों को मुजाहिदीन बताया। उक्त सारी बातें बताने का उद्देश्य है कि भारत की यह बेटी आतंकी गतिविधियों में लिप्त थी और अपने ही देश के खिलाफ जिहाद छेड़े हुए थी।
 देशवासियों को याद होगा कि किस तरह हमारी सेक्युलर जमात ने इशरत जहां के मारे जाने पर कई वर्षों तक राष्ट्रीय शोक मनाया था। मोमबत्ती ब्रिगेड ने सैंकड़ों टन मोम जला डाला, जगह-जगह प्रदर्शन हुए, लाखों लेख लिखे, हस्ताक्षर अभियान चले। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति के रोगी सेक्युलर दलों ने इस पर खूब हायतौबा मचाई, आतंकियों की मौत को हत्या बताने का प्रयास हुआ। बिहार के मुख्यमंत्री ने तो आतंकी इशरत जहां को बिहार की बेटी तक बना दिया था। लेकिन आज यही सेक्युलर काग पंचायत दूसरी इशरत जिसने तलाक पर कानूनी लड़ाई जीती की दुर्दशा को लेकर मौनव्रत धारण कर चुकी है।
इस दूसरी बेटी के कुकृत्यों को कभी माफ नहीं किया जा सकता परंतु देशवासियों को याद होगा कि किस तरह हमारी सेक्युलर जमात ने इसके मारे जाने पर कई वर्षों तक राष्ट्रीय शोक मनाया था। मोमबत्ती ब्रिगेड ने सैंकड़ों टन मोम जला डाला, जगह-जगह प्रदर्शन हुए, लाखों लेख लिखे, हस्ताक्षर अभियान चले। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति के रोगी सेक्युलर दलों ने इस पर खूब हायतौबा मचाई, आतंकियों की मौत को हत्या बताने का प्रयास हुआ। बिहार के मुख्यमंत्री ने तो आतंकी इशरत जहां को बिहार की बेटी तक बना दिया था। लेकिन आज यही सेक्युलर काग पंचायत दूसरी इशरत जिसने तलाक पर कानूनी लड़ाई जीती की दुर्दशा को लेकर मौनव्रत धारण कर चुकी है।
बताया जाता है कि महिला स्वतंत्रता की प्रतीक इशरत को तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट से फैसला आने के बाद सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है। उसे पड़ोसियों के साथ-साथ अपने सास-ससुर के ताने भी सुनने पड़ रहे हैं। वे लोग इशरत को उल्टा सीधा बोल रहे हैं। उसे गंदी औरत, मर्दों की दुश्मन और इस्लाम विरोधी कहा जा रहा है। कई पड़ोसियों ने तो इशरत से बात तक करना बंद कर दिया है। उसने बंगाल सरकार से सुरक्षा मांगी है परंतु अभी तक सेक्युलरिजम की चैंपियन ममता बैनर्जी सरकार से उपेक्षा ही हाथ लगी है। सामान्य दृष्टि से देखें तो इशरत हमारे लिए प्रेरणापुञ्ज है, वंदनीय है जिसने मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ 1400 सालों से चले आरहे अन्याय को समाप्त किया। करोड़ों मुस्लिम महिलाओं को समानता का अधिकार दिलवा कर भारत के लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत किया। लेकिन जो सेक्युलर बंगलादेश की लेखिका तस्लीमा नासरीन पर होने वाले कट्टरपंथियों को देख भयभीत हो जाते हैं और एक समुदाय के वोटों पर लार टपकाते हुए इशरत जहां जैसी आतंकी को अपनी बेटी बताते हैं उनसे न्याय रेगिस्तान से जलप्रपात फूटने जैसी उम्मीद है। इशरत और इशरत में सेक्युलर भेद अब देश की समझ में आचुका है।

राकेश सैन
मो. 097797-14324



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