Saturday, 9 September 2017

रोहिंग्या शरणार्थी, भारत हवन करे पर हाथ बचा कर



 भारत को चाहिए कि वह इन दुखी लोगों की सहायता कर मानवीय कर्तव्य का तो पालन करे परंतु इन लोगों का इनके मूल निवास स्थान पर ही पुनर्वास हो। भारत हवन तो करे परंतु अपने हाथ यज्ञ की अग्नि में झुलसने से बचाए।






भारत सरकार द्वारा रोहिंग्या मुसलमानों को देश से बाहर करने के प्रयासों के खिलाफ कुछ बुद्धिजीवी आत्मघाती अभियान चला रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने देश के सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर म्यांमार से विस्थापित हो कर आरहे रोहिंग्या मुसलमानों के लिए इस देश में शरण मांगी है। इतना ही नहीं कुछ लेखक, संपादक व मानवाधिकारवादी भी इस अभियान में जुटे हैं कि देश में रह रहे सरकारी आंकड़ों के अनुसार 40 हजार रोहिंग्याओं को यहां बसाया जाए। म्यांमार में फैली नस्लीय हिंसा के चलते इन लोगों को वहां से विस्थापित होना पड़ रहा है और इस पलायन से न केवल भारत बल्कि बंगलादेश सहित कई एशियाई देश प्रभावित हो रहे हैं। अब भारत सरकार के समक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है कि वह मानवीय आधार पर इन रोहिंग्याओं को अपने यहां शरण दे या वैश्विक आतंकवाद, कानून व्यवस्था व अपने खुद के देश में जनसंख्या विस्फोट जैसे स्थिति के चलते इनको किस्मत के सहारे छोड़े। ऐसे में भारत को चाहिए कि वह इन दुखी लोगों की सहायता कर मानवीय कर्तव्य का तो पालन करे परंतु इन लोगों का इनके मूल निवास स्थान पर ही पुनर्वास हो। भारत हवन तो करे परंतु अपने हाथ यज्ञ की अग्नि में झुलसने से बचाए।
पहले जानें कि आखिर कौन हैं रोहिंग्या मुसलमान। म्यांमार की बहुसंख्यक आबादी बौद्ध है परंतु यहां 10 लाख से अधिक रोहिंग्या मुसलमान हैं। रोहिंग्या नैशनलिस्ट मूवमेंट के अनुसार वे यहां पर 9वीं शताब्दी से रह रहे हैं। बर्मा अतीत में भारत के प्रांत बंगाल का हिस्सा था। रोजगार व काम की तलाश में बंगाल के लोग तत्कालीन अराकान इलाके जो आजकल म्यांमार के रखाइन प्रांत के नाम से जाना जाता है में बसने लगे। शुरु-शुरु में स्थानीय बौद्ध लोगों ने इस पर एतराज नहीं जताया। इसका प्रमाण है कि 1430 में वहां के बौद्ध राजा नरामीखला ने रोहिंग्याओं को अपने यहां नौकरी भी दी तथा कुछ लोग उनके दरबार में भी थे। लेकिन धीरे-धीरे इनका विरोध होना शुरू हो गया जब ब्रिटिश सरकार द्वारा अपनी मजदूरों संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इनको यहां उच्च स्तर पर बसाया जाने लगा तो बौद्धों ने इनका तीव्र विरोध करना शुरू कर दिया। दूसरे विश्व युद्ध में जब जापान के प्रभाव से ब्रिटिश सरकार को यहां से भागना पड़ा तो यह लोग बेसहारा हो गए, क्योंकि इन्होंने इस युद्ध में बरतानवी सरकार का साथ दिया था। सन् 1962 में बर्मा में तख्तापलट हुआ और वहां के नागरिकों को पहचानपत्र जारी किए गए, लेकिन रोहिंग्याओं को इससे वंचित कर उन्हें विदेशी पहचानपत्र दिए गए। 1982 में सरकार ने नागरिक कानून बना कर रोहिंग्या मुसलमानों को अपना नागरिक मानने से इंकार कर दिया। इन्हें शिक्षा, रोजगार, घूमने की स्वतंत्रता सहित अनेक नागरिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया। यहां तक कि रोहिंग्या अपनी मस्जिदों व मदरसों की मुरम्मत तक करवाने का अधिकार भी खो चुके हैं। वहां पर पिछले पांच-छह सालों से जारी हिंसा में कई लोगों की जानें गई हैं और एक लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। जो रोहिंग्या म्यांमार रह रहे हैं वो तो परेशानी में है हीं परंतु विस्थापितों की हालत और भी बुरी है। वे झुग्गी-झौंपडयि़ों में रहने को मजबूर हैं। उनके पास न तो रोजगार है न ही आय के और कोई साधन व जीवन की मूलभूत सुविधा। वर्तमान में जब आंग सान सू ची की नेशनल लीग फोर डेमोक्रेसी की सरकार में यह दौर और तेज हो गया है। 
नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला युसुफजई ने देश की स्टेट काउंसलर आंग सान सू ची से इस मुद्दे पर दखल की अपील की। उन्होंने ट्विटर पर अपना एक बयान जारी करके हिंसा की निंदा की और कहा, ''म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के साथ जो हो रहा है उससे मैं दुखी हूं। बीते कई सालों में मैंने इस दुखद और शर्मनाक व्यवहार की निंदा की है। मैं इंतजार कर रही हूं कि नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सू ची भी इसका विरोध करें। पूरी दुनिया और रोहिंग्या मुसलमान इंतजार कर रहे हैं। अगर उनका घर म्यांमार में नहीं है तो उनकी पीढिय़ां कहां रह रही थीं? उनका मूल कहां है? रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार की नागरिकता दी जाए। वह देश जहां वे पैदा हुए हैं।'' म्यांमार में 25 वर्ष बाद पिछले साल चुनाव हुआ, इसमें नोबेल विजेता आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फोर डेमोक्रेसी को भारी जीत मिली। हालांकि संवैधानिक नियमों के कारण वह चुनाव जीतने के बाद भी राष्ट्रपति नहीं बन पाईं। सू ची स्टेट काउंसलर की भूमिका में हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सू ची निशाने पर हैं। आरोप है कि मानवाधिकारों की चैंपियन होने के बावजूद वे खामोश हैं। सू ची की मुश्किल यह है कि देश की सुरक्षा अभी पूरी तरह सेना के हाथों में है। यदि सू ची अंतराष्ट्रीय दवाब में झुकती हैं तो उन्हें सेना से टकराव का जोखिम उठाना पड़ सकता है। उनकी सरकार खतरे में आ सकती है। यानि किसी समय लोकतंत्र की क्रांति कहे जाने वाली सू ची आज सत्तामोह के चलते बेबस हो चुकी। 
अब प्रश्न उठता है कि पूरे मुद्दे पर भारत की भूमिका क्या हो? एक लोकतांत्रिक देश व मानवधर्मी समाज होने के चलते हम न तो रोहिंग्याओं की दुर्दशा की ओर पीठ करके बैठ सकते और न ही इन शरणार्थियों को भार ढो सकते। जब फलिस्तीन, रवांडा और बोस्निया में नरसंहार हुए तो भारत ने इनका कड़ा प्रतिकार किया और अब रोहिंग्याओं पर हो रहे अत्याचारों पर हम मौन नहीं साध सकते, लेकिन घरेलू संसाधनों पर बोझ, आतंकवाद व कानून व्यवस्था के चलते न ही उन्हें अपने यहां शरण दे सकते। देश के गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू के अनुसार देश में 16,000 संख्या रोहिंग्या मुसलमानों की है जो संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थियों के तौर पर पंजीकृत हैं। लेकिन गैर सरकारी सूत्र इसे 40-50 हजार के करीब मानते हैं। दिल्ली, जम्मू, आंध्र प्रदेश सहित देश के कई हिस्सों में रोहिंग्या मुसलमानों की बस्तियां बस चुकी हैं। अशिक्षित व अकुशल लोगों की भीड़ होने के कारण इनकी अजीविका काफी सीमा तक भीक्षावृति या अपराधों पर निर्भर करती है। जम्मू में ही इन लोगों पर 35 गंभीर अपराध के मामले दर्ज हैं और घाटी में विगत दिनों मारे गए दो विदेशी आतंकियों में एक म्यामांर मूल का होना बताया जा रहा है। इसके अतिरिक्त इनको लेकर स्थानीय लोगों में आक्रोश पनप रहा है और आए दिन धरना प्रदर्शन हो रहे हैं। देश में बढ़ती जनसंख्या, बेरोजगारी व व्यापक गरीबी के चलते साफ है कि इतनी बड़ी आबादी को देश में शरण देना समझदारी नहीं है। भारत इस समस्या के समाधान के लिए दूसरा रास्ता अपनाए। 
म्यामांर के कानून के अनुसार रोहिंग्या नागरिकता विहीन हैं। भारत सहित पूरे विश्व समुदाय को वहां की सरकार पर दबाव डालना चाहिए कि वह इन लोगों को अपना नागरिक स्वीकार करे। इन्हें वह सभी अधिकार व स्वतंत्रता मिले जो वहां के संविधान के अनुसार हर नागरिक को उपलब्ध हैं।
नॉर्वे की नोबेल पुरस्कार समिति को इस मामले में चुप्पी तोड़ कर सू ची और वहां की सेना दोनों के खिलाफ कड़े कदम उठाने चाहिएं। ब्रिटेन से लेकर दूसरे लोकतांत्रिक देशों को चाहिए कि वह म्यांमार को हथियारों की आपूर्ति पर रोक लगा दें जिनका इस्तेमाल आम नागरिकों के खिलाफ किया जाता है। अगर इससे रोहिंग्या मुसलमानों के साथ हो रही हिंसा नहीं रुकती तो यातना के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव लाया जा सकता है। भारत इस दिशा में पहल करे तो देश की अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में साख बढ़ेगी। प्रस्ताव में वहां की सरकार को अंतरराष्ट्रीय अपराधिक न्यायालय में खींचने की बात की जा सकती है।
इस मामले में नरसंहार अधिनियम का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तरह, नागरिक संगठन यूरोप में आंग सान सू ची और सेना के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र के निर्देशों का उल्लंघन करने के मामले में केस दर्ज करा सकते हैं। इस मामले में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार अपराधों की सुनवाई करने वाले स्पेन के विधि तंत्र का सहारा भी लिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त अमरीका में एलाइन टॉर्ट्स क्लेम्स ऐक्ट के तहत भी सू ची और सेना के शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ केस दर्ज कराए जा सकते हैं।
इन सभी उपायों से पहले भारत को वहां की सरकार के समक्ष यह मुद्दा उठाना चाहिए। आज जब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी म्यामांर के दौरे पर हैं तो उनसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे देश के हितों के साथ-साथ मानवीय आधार पर इस मुद्दे को वहां की सरकार के समक्ष अवश्य उठाएंगे। आखिर जब पड़ोस में अशांति फैली हो तो हम सुखी कैसे रह सकते हैं? 

- राकेश सैन
मो. 097797-14324

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