मात्र अढ़ाई-तीन साल के बेटे को मोबाइल फोन चलाते हुए देख मैने अपने मित्र को टोका तो उसने जवाब दिया, ''क्या करें राकेश जी! बच्चे हाथ से छीन लेते हैं।'' लेकिन अब यही मोबाइल हमसे हमारे बच्चे छीनने लगे हैं। इससे पहले इन्होंने बच्चों से बचपन छीना और अब जीने का अधिकार।
सुबह सैर करने जाता हूं तो पार्कों में देख कर हैरानी होती है, पेड़ों के नीचे गिरे जामुनों की चदर बिछी रहती है पर उनको चुनने वाले बच्चे नहीं। शहतूत की शाखों पर रसीले और लंबे-लंबे शहतूत पक कर अपने आप गिर जाते हैं कोई उन्हें तोडऩे वाले नन्हें हाथ कहीं नहीं दिखते। रात को मंदिर जाओ तो पहले की तरह प्रासद मांगने वाले मासूम चेहरों की कतारें अलोप हो चुकी हैं।
एक हमारा समय था जब हम पत्थर मार-मार कर जामुन व बेर तोड़ा करते थे। एक-दो जामुन गिरे तो उसे झपटने के लिए कई दर्जन बच्चे दौड़ पड़ते। जिसके हाथ गिरा हुआ फल लगता उसके हावभाव त्रिलोक विजेता से कम न होते। साहसी बच्चे पेड़ों पर चढ़ कर फलाहार करते तो हमारे जैसे पत्थरबाजी में विश्वास रखते थे। मैं पंजाब के सीमावर्ती कस्बे अबोहर के नई आबादी इलाके का पला बढ़ा हूं। मैं और मेरे दोस्तों को पूरी जानकारी थी कि नगर के किस हिस्से में बेरी, किस जगह पर शहतूत व जामुन के पेड़ हैं। ये जानकारी केवल हमें ही नहीं बल्कि हमारे माता-पिता जी को भी थी तभी तो जब भी हमें दोपहर को ढूंढना होता तो बिजली घर, जेपी पार्क, बेसिक स्कूल, श्रीगंगानगर रोड पर फलदार वृक्षों के तले धमाचौकड़ी करते हुए मिल जाते। हर मंगलवार के दिन रात दस-ग्यारह बजे तक मंदिर में कतारों में बैठ कर प्रसाद एकत्रित किया करते। जब पेट भर जाता तो लिफाफों के उदरपोषण में लग जाते, लेकिन अब सबकुछ बदल चुका है और वह भी टीवी, मोबाइल फोन व वीडियो गेम्स के कारण।
वीडियो गेम्स के बारे हमने भी बचपन में सुना परंतु तब यह अमीर घरों के बच्चों की खेल थी। लेकिन पिछली सदी के अंतिम दशक में विश्व में हुई डिजीटल व दूसरंचार क्रांति और मुक्त अर्थव्यवस्था के चलते बढ़े मध्य वर्ग ने मोबाइल के रास्ते वीडियो गेम को घर-घर पहुंचा दिया। आज यह वीडियो गेम केवल बच्चों की ही नहीं बल्कि हर आयुवर्ग के लोगों की रूचि या यूं कह लीजिए कि रोग बन चुका है। बच्चे स्कूल-कालेजों से लौटते ही चिपक जाते हैं मोबाइल फोन से और कानों में हेडफोन लगा कर इतनी तल्लीनता से खो जाते हैं वीडियो गेम व चेटिंग में कि उनको देख कर लगता है कि इतनी एकाग्रता तो वैदिक युग में ऋषि-मुनियों में भी नहीं रही होगी। घर में हो रहे नफा-नुक्सान, माता-पिता की बात सहित आसपास की समस्त घटनाओं के प्रति पूरी तरह वैराग्य धारण कर लेते हैं।
बात केवल यहीं तक सीमित रहती तो भी गनीमत थी परंतु अब सुनने में आरहा है कि ब्ल्यू व्हेल नामक वीडियो गेम के चलते बच्चे आत्महत्या तक करने लगे हैं। मुंबई, पश्चिमी बंगाल व मध्य प्रदेश सहित देश के कई हिस्सों में और दुनिया के कई देशों में इस तरह की घटनाएं सामने आई हैं जिन्होंने अभिभावकों के साथ-साथ समाज शास्त्रियों को भी सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि तकनोलोजी की सीमा क्या हो?
ब्लू व्हेल चैलेंज गेम, एक इंटरनेट खेल है जो एक श्रृंखला में होती है। जिसमें खिलाडिय़ों को करने लिये 50-दिन की अवधि दी जाती है और इसमें कई कार्य आवंटित किये जाते हैं। अंतिम चुनौती में खिलाड़ी को आत्महत्या करने को बोला जाता है। शब्द ब्लू व्हेल बीच्ड व्हेल्स की घटना से आता है, जोकि आत्महत्या से जुड़ा हुआ था। 2016 में रूस में, ब्लू व्हेल किशोरों के बीच बड़े पैमाने पर उपयोग करने के बाद एक पत्रकार ने लेख के माध्यम से उस पर ध्यान आकर्षित किया। जिसके बाद रूस में नैतिक खलबली की एक लहर दौड़ गई। बाद में, इस खेल से जुडे एक व्यक्ति बुदेइकिन को गिरफ्तार कर लिया गया और उसे कम से कम 16 किशोर लड़कियों को आत्महत्या करने के लिए उकसाने का दोषी ठहराया गया। जिससे रूसी आत्मघाती रोकथाम कानून का नवीकरण और ब्लू व्हेल घटना पर विश्वव्यापी चिंता दौड़ गई।
गेम के नियमों या कार्यों पर नजरसानी की जाए तो किसी के भी रोंगटे खड़े हो सकते हैं। जैसे हाथ पर ब्लेड की सहायता से 'एफ-57' कुरेदना। सुबह 4.30 बजे उठना और वो डरावने, विकृत वीडियोज देखना, रेलवे लाइनों पर जाना। बाजू को अपनी नसों के पास से होते हुए रेजर से काटना। ये कट ज्यादा गहरे नहीं होने चाहिएं। एक पेपर शीट पर व्हेल बनाना। अगर आप 'व्हेल बनने को तैयार' हैं तो पैरों पर रेजर से अंग्रेजी में 'यस' के चिन्ह में निशान बनाना। अगर आप तैयार नहीं हैं, तो आपको खुद को सजा देनी है और कई कट खुद को मारने होंगे। सुबह 4.20 बजे उठना है और जो छत सबसे ऊंची हो वहां पहुंचना। रेजर से हाथ में व्हेल की आकृति बनाना। पूरा दिन डरावने वीडियोज देखना। अपने होंठो को काटना। सबसे ऊंची छत पर पहुंचो और वहां किनारे पर कुछ देर खड़े रहो। मुंडेर पर बैठ कर पैर हिलाओ। किसी पुल पर जाओ और वहां किनारे पर खड़े रहो। पूरे दिन किसी से भी बात मत करो। ऊंची बिल्डिंग से कूद जाओ और अपनी जिंदगी को खत्म करो इत्यादि-इत्यादि।
इन बातों को सरसरी नजर से सुनने पर ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इस गेम का अंतिम टास्क या लक्ष्य आत्महत्या करना है और सौभाग्य से अगर कोई इसमें सफल भी नहीं होता तो वह कम से कम मानसिक रोगी तो हो ही जाएगा। यह काल्पनिक नहीं बल्कि पूरी दुनिया में इसके चलते सैंकड़ों लोग जिनमें बच्चे व किशोर अधिक हैं अपनी जान दे चुके हैं। सरकार इस तरह के खतरनाक कामों पर रोक लगाएगी तब लगाएगी तब तक हम चुपचाप यह सब होता नहीं देख सकते। समय आगया है कि डिजीटल क्रांति की एक लक्ष्मण रेखा तय हो। अभिभावक अपने बच्चों पर अधिक ध्यान दें, उन्हें इंटरनेट के सदुयपयोग को प्रेरित करें न कि दुरुपयोग के लिए। बच्चों ने तो हमारे हाथों से मोबाइल फोन छीन लिया परंतु हमारी जिम्मेवारी बनती है कि मोबाइल फोनों व इंटरनेट को अपने लाल छीनने न दें।
- राकेश सैन
मोबाईल - 097797-14324
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