राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक लोकतांत्रिक संगठन है जो राष्ट्रवाद की विचारधारा को सम्मुख रख कर चलता है। संघ के विचारों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है और इसकी नीतियों की प्रशंसा या आलोचना करने का भी सभी को अधिकार है परंतु अभिव्यक्ति की आजादी को पूतना की भांति दुग्धपान करवाना कोई ममता दीदी से सीखे।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बैनर्जी ने एक और सेक्युलर मीलपत्थर स्थापित किया है। कोलकाता के एक रंगभवन में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यक्रम की बुकिंग रद्द कर दी गई है। उसमें संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत ने एक कार्यक्रम को संबोधित करना था। कार्यक्रम के आयोजकों को मौखिक रूप से बुकिंग रद्द होने की जानकारी दे दी गई है। इस रंगभवन का नाम महाजाति सदन है जो कि वहां की राज्य सरकार के अंतर्गत आता है। डा. मोहन भागवत का यह कार्यक्रम अक्टूबर में होना है। इससे पहले इसी साल जनवरी में कोलकाता पुलिस ने शहर में डा. भागवत को रैली की इजाजत नहीं दी थी। कहा गया था कि कानून और आंतरिक सुरक्षा का ध्यान रखते हुए ऐसा किया गया है। हालांकि, बाद में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पुलिस की दलील खारिज करते हुए उन्हें रैली की अनुमति दे दी थी।
इससे पहले 2014 में विश्व हिंदू परिषद् की रैली के लिए परेड ग्राउंड में इजाजात नहीं दी गई थी। वहां भी डा.भागवत का ही संबोधन था, लेकिन वहां भी न्यायालय ने विहिप को अनुमति दे दी थी। विहिप की रैली से कुछ समय पहले ही ममता बनर्जी की सरकार ने ही बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की रैली को रोक कर दिया था जहां पर वे आम जनता को संबोधित करने वाले थे। कोलकाता पुलिस द्वारा जब बीजेपी को रैली की अनुमति नहीं दी गई तो पार्टी ने कलकत्ता उच्च न्यायालय का रुख किया था। यहां भी सरकार को न्यायालय के समक्ष मूंह की खानी पड़ी।
इन घटनाओं को गिनाने का उद्देश्य नीरस आंकड़े प्रस्तुत करना मात्र नहीं बल्कि इनसे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि अपने ही देश में एक संगठन को किस कदर 'असहिष्णुता' का सामना करना पड़ रहा है और रोचक यह है कि असहनशील होग ही समय-समय पर संघ व इसके अनुषंगिक संगठनों पर 'इन्टोलरेंट' होने की तोहमत मढ़ते रहे हैं। बीबीसी लंदन की रिपोर्ट के मुताबिक विश्व के सबसे बड़े गैर-सरकारी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख के साथ असहिष्णुता की हुई इस घटना का समाचार कुछ समाचारपत्रों के महत्त्वहीन पृष्ठों पर पढ़ कर भी मैं इन अखबारों के संपादकों के प्रति कृतज्ञ हुआ क्योंकि इन्होंने कम से कम इस समाचार को स्थान तो दिया। अन्यथा राष्ट्रीय मीडिया ने तो इस मुद्दे पर मौन की अपनी परंपरा का ही पालन किया। इसके विपरीत अगर किसी अल्पसंख्यक समुदाय के एक अदने आदमी को किसी और कारण से भी कमरा किराए पर देने से भी इंकार हो जाता तो आज सेक्युलर तलवारें चमचमा रही होतीं। इंटोलरेंस-इंटोलरेंस की तोतारटंत हर कहीं सुनाई देती। याद करें जब मुंबई में एक मुस्लिम समुदाय के व्यक्ति को किसी ने किसी और कारण सेफ्लैट किराए पर देने से इंकार किया था तो किस कदर कोहराम मचा था। आज संघ प्रमुख जैसे देश के गणमान्य अधिकारी के साथ एक छद्मधर्मनिरपेक्ष सरकार ने जानबूझ कर ऐसा किया और उनके कार्यक्रम को बाधित करने का प्रयास किया तो किसी ने 'असहिष्णुता' का डमरू नहीं बजाया। इस मुद्दे पर 'इंटोलरेंस ब्रिगेड' और 'एवार्ड वापसी तालिबानियों' के मौनव्रत ने साबित कर दिया है कि इनके अभियान केवल राजनीतिक निहितार्थ लिए ही रहते हैं और चुनिंदा राजनेताओं के हितों का पोषण करते हैं।।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक लोकतांत्रिक संगठन है जो राष्ट्रवाद की विचारधारा को सम्मुख रख कर चलता है। संघ के विचारों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है और इसकी नीतियों की प्रशंसा या आलोचना करने का भी सभी को अधिकार है परंतु अभिव्यक्ति की आजादी को पूतना की भांति दुग्धपान करवाना कोई ममता दीदी से सीखे। आखिर ममता दीदी संघ से इतनी भयभीत क्यों है ? उनका भय संघ से है या अपने कृत्यों से उपजा है? उनके कार्यकाल की घटनाओं पर गौर फरमाएं तो पाएंगे कि उनका अतीत उन्हें डरा रहा है। आज से लगभग साढ़े चार साल पहले जब ममता दीदी ने बंगाल में वामपंथियों के 25 साल पुराने कुशासन का अंत किया तो मेरे जैसे अनेक लोग प्रसन्न हुए। आशा थी कि बंगाल फिर से विकास के मार्ग पर चल पड़ेगा। राज्य सरकार सही अर्थों में धर्मनिरपेक्षता की नीति का पालन करेगी। बंगलादेशी घुसपैठियों के खिलाफ सख्त कदम उठाया जाएगा परंतु हो रहा है बिलकुल उलट। बंगाल के लोगों को हर साल दुर्गा पूजा के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। एक समुदाय को गुंडागर्दी करने की खुली छूट मिली हुई है। बंगलादेशियों को पुचकारा जा रहा है जबकि सीमावर्ती इलाकों में रह रही स्थानीय बंगाली जनता को प्रताडि़त किया जाता है। प्रदेश के कई जिले बंगलादेशी बाहुल्य हो चुके हैं। सीमावर्ती इलाकों में इनका इतना भय फैल चुका है कि स्थानीय लोग पलायन तक करने को विवश हैं। पीडि़त लोग सरकार व पुलिस के समक्ष गुहार लगाते हैं तो उनकी सुनवाई नहीं की जाती। हत्या, बलात्कार, अपहरण जैसे अपराधों को भी वोटबैंक के तराजू में तोल कर अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक चश्मे के साथ देखा जाता है। स्थानीय जनता जब इसके खिलाफ लामबंद हो रही है तो ममता दीदी को भय सताने लगा है अपनी कुर्सी का और वह संघ को अपना शत्रु मान कर उसकी आवाज दबाना चाहती हंै।
ममता दीदी अगर यह मानती हैं कि इस तरह के प्रतिबंध लगवा कर वह संघ के बढ़ते कदम को रोक लेंगी तो वह जितनी जल्दी इस मुगालते से बाहर आएं उनके लिए श्रेयस्कर होगा। संघ के 90 वर्षों का इतिहास देखें तो इसका विरोध करने वाले इतिहास के पन्नों में दफन हो चुके हैं और संघ आज भी तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है। संघ वह सूरजमुखी है जो विरोध की चिलचिलाती धूप में ही खिलता है, वह अक्षय वट वृक्ष है जो पत्थरों में भी पलता है। संघ गुरुओं के उस संदेश का वाहक है जिन्होंने कहा था 'न काहू को भय देत न भय मानत आनि।' अगर कोई संघ से भयभीत होता है तो उसे अपना चाल, चरित्र और चेहरा सुधारना चाहिए न कि प्रतिबंध जैसे आत्मघाती कदम उठाए।
- राकेश सैन
मोबाईल - 097797-14324
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