गौरी लंकेश जितनी हिंदुत्व विरोधी थी उससे भी अधिक हिंदुत्व विरोधी वह लोग हैं जिन्होंने उनकी हत्या की। हमारी संस्कृति व शास्त्र ज्ञान की शक्ति से विरोधियों की जीभ पर गांठ लगाने को कहते हैं हत्या करने या जुबान काटने को नहीं। किसी भी दिवंगत के लिए शोक जताना व मोक्ष की कामना करना हमारी संस्कृति है। गौरी बहन! तुम्हारे लिए मेरी आंखूं में आंसू तो हैं परंतु देने के लिए श्रद्धांजलि नहीं। बड़े दु:ख के साथ कहना पड़ रहा है कि तुम श्रद्धांजलि की अधिकारी नहीं हो।
मंगलवार 5 सितंबर की रात आठ बजे बंगलुरु के राजराजेश्वरी नगर में अज्ञात हमलावरों ने वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की गोलियां मार कर हत्या कर दी। अत्यंत दु:खद घटना है यह, जिसकी कितनी भी निंदा की जाए उतनी ही कम है। लोकतांत्रिक व्यवस्था और एक सभ्य समाज में इस तरह की घटनाओं के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। चाहे हत्या के कारणों का पता नहीं चल पाया है परंतु जिस तरह बुद्धिजीवी देश में महौल बना रहे हैं उससे अभास देने का प्रयत्न कर रहे हैं कि किसी ने विचारों से असहमत हो कर गौरी की हत्या की। अगर यह बात ठीक है तो अत्यंत दुर्भाग्यशाली है। लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात रखने की आजादी है, हमें किसी के विचारों से सहमती हो या नहीं परंतु उसके बोलने के अधिकार का सम्मान अवश्य करना चाहिए। गौरी एक साप्ताहिक 'लंकेश पत्रिके' की संपादक थीं और आमतौर पर इसे व्यवस्था व हिंदुत्व विरोधी व नक्सलवाद समर्थक स्वर के रूप में देखा जाता रहा है।
वैसे बहनजी, यह दुर्भाग्य है कि करोड़ों देशवासियों की तरह मेरा आपसे परिचय आपके देहांत के बाद ही हो पाया। मै न आपको जानता न ही आपके विचारों से परिचित रहा हूं। लेकिन आपके स्वर्गवास के बाद जिस कुल-गौत्र के लोग आपके पक्ष में लामबंद हो रहे हैं उससे आपकी संगत व मानसिकता का अवश्य अनुमान लगाया जा सकता है। पहले तो आपके नाम के पीछे 'लंकेश' तखल्लुस पढ़ कर आश्चर्य हुआ परंतु आपके बारे कुछ जानकारी एकत्रित करने के बाद सहज ही समझ में आगया कि इस उपनाम का प्रयोग क्यों किया गया होगा। लगता है कि आप भी उसी वर्ग से संबंधित रही हैं जिन्हें करोड़ों देशवासियों की आस्था व विश्वास आहत करने में परमानंद की प्राप्ति होती है। इस देश की आस्था व पहचान श्रीराम में है न कि लंकेश में। यह बात समझ से परे है कि गौरी जैसी किसी भारतीय का लंकेश से क्या लगाव हो सकता है सिवाय इसके कि देश की बहुसंख्यक आस्था का मजाक उड़ाया जाए। आप जिंदा होतीं तो मै पूछता कि एक महिला हो कर महिला के रूप में माता सीता के साथ अत्याचार करने वाले लंकेश का नाम जोडऩा कहां की प्रगतिशीलता है?
आपके जीवन के बारे में पढऩे पर ध्यान में आया कि आप नक्सल समर्थक रही हैं। आप देश की मुख्यधारा से भटके नक्सली युवाओं को समझा बुझा कर वापिस लाती तो आपका नक्सल व गरीब प्रेम समझा जा सकता था परंतु आप तो उन हत्यारों का हथियार बनी रहीं। आप उन विचारों का समर्थन करती रही हैं जो जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में युवाओं से 'कश्मीर मांगे आजादी, बक्सर मांगे आजादी' जैसे देश को तेडऩे वाली नारेबाजी करवाता है। आप जानती ही होंगी कि विदेशी धन व हथियारों से चलने वाले नक्सलवादी किस तरह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बने हुए हैं। किस तरह यह हत्यारे मासूम वनवासियों की हत्याएं, अपहरण व महिलाओं से बलात्कार करते हैं। विकास की गतिविधियों को हिंसा के बल पर रोकने की कोशिश करते हैं और इनका लक्ष्य तो और भी खतरनाक है कि देश को कई हिस्सों में विभाजित करना। क्या आप इन विचारों से सहमत थीं और इनको फलीभूत करने के लिए पत्रकारिता का सहारा ले रही थीं ?
सुना है कि जेएनयू में देशद्रोह केस का मुख्य आरोपी कन्हैया और उमर खालिद जैसे युवा आपको अपनी माँ मानते थे और आप उन्हें अपना बेटा। वाह! अभी तक तो कहते थे कि 'पूत कपूत सुने हैं पर ना माता सुनी कुमाता' राम ने क्या जोड़ी मिलाई है, बेटे नीमचढ़े तो माँ करेला। क्या आप देश को तोडऩे वाले, हर घर से अफजल निकलेगा, भारत तेरे टुकड़े होंगे आदि नारों से समहत थीं? अगर हां तो यह बहुत गंदी बात है और नहीं तो आपने देशद्रोह केस के आरोपियों को आंचल में क्यों स्थान दिया ?
बताया जाता है कि कन्नड़ साप्ताहिक लंकेश पत्रिका में छपने वाली सामग्री को लेकर पत्रकार गौरी लंकेश और उनके भाई इंद्रजीत के बीच विवाद था। टाइम्स ऑफ इंडिया में 15 फरवरी 2005 को छपी इस रिपोर्ट के मुताबिक पुलिसकर्मियों पर नक्सली हमले को लेकर एक लेख को ले भाई बहन के बीच विवाद हो गया। गौरी लंकेश की अनुमति के बावजूद इंद्रजीत ने इस लेख को लंकेश पत्रिका से हटा लिया। इससे दोनों में विवाद बढ़ गया। बाद में इन्द्रजीत ने एक कम्प्यूटर, प्रिटंर, और स्कैनर गायब होने की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई। गौरी लंकेश ने उस शिकायत के बदले में पुलिस में एक शिकायत दर्ज करवाई और कहा कि उसके भाई ने उसे रिवाल्वर से धमकाया है। इन्द्रजीत ने कहा कि कथित लेख का झुकाव नक्सलियों की ओर था जिन्होंने सात पुलिसकर्मियों की हत्या की थी। इन्द्रजीत के मुताबिक गौरी का नक्सलियों के प्रति झुकाव लंकेश पत्रिका के वसूलों का उल्लंघन करता है। तो क्या आप अपनी कलम से हत्यारों की वकालत करती आई हैं ? बहुत गंदी बात है यह।
हमें शिकायत है उन लोगों से भी जो बिना जांच, बिना तथ्य, बिना प्रमाण के किसी भी अपराधिक घटना के साथ किसी का भी नाम जोड़ देते हैं। गौरी लंकेश की हत्या के बाद भी कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी समेत कई लोग इसके पीछे एक विचारधारा व संगठन का नाम जोड़ रहे हैं। वामपंथी दुनिया भर में दीवा बुझने के बाद अब सड़कों पर मोमबत्ती जला कर प्रदर्शन कर रहे हैं। एक विचारधारा को सूली पर चढ़ाया जा रहा है। मोमबत्ती बटालियन उस समय कहां थी जब 15 अगस्त 2017 को कर्नाटक की ही बोम्मानहाली म्युनिसिपल काउंसिल के बीजेपी सदस्य और दलित नेता श्रीनिवास प्रसाद उर्फ कीथागनहल्ली वासु की बेंगलुरू में हत्या कर दी गई। इसी प्रदेश में बीते दो सालों में बीजेपी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद् के 10 नेताओं की हत्या हो चुकी है परंतु तब किसी को इन हत्याओं पर दर्द नहीं हुआ।
गौरी लंकेश जितनी हिंदुत्व विरोधी थी उससे भी अधिक हिंदुत्व विरोधी वह लोग हैं जिन्होंने उनकी हत्या की। हमारी संस्कृति व शास्त्र ज्ञान की शक्ति से विरोधियों की जीभ पर गांठ लगाने को कहते हैं हत्या करने या जुबान काटने को नहीं। किसी भी दिवंगत के लिए शोक जताना व मोक्ष की कामना करना हमारी संस्कृति है। गौरी बहन! तुम्हारे लिए मेरी आंखूं में आंसू तो हैं परंतु देने के लिए श्रद्धांजलि नहीं। बड़े दु:ख के साथ कहना पड़ रहा है कि तुम श्रद्धांजलि की अधिकारी नहीं हो।
- राकेश सैन
मोबाईल - 097797-14324
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