Thursday, 7 September 2017

ये विदेशी 'दानववीर' कर्ण

कुंती का ज्येष्ठ पुत्र कर्ण अपनी दानवीरता के लिए इतना विख्यात था कि हर दानदाता को आज कर्ण की संज्ञा दी जाती है परंतु दान और सेवा की आड़ में देश में जो कुछ हो रहा है उसकी दुखद उदाहरण है दिल्ली की घटना जहां एक विदेशी 'दानवीर' कर्ण मासूम बच्चों के लिए 'दानववीर' साबित हुआ। ब्रिटेन से आया 'दानव' सेवा के नाम पर दिव्यांग बच्चों का यौन शोषण करता रहा और समाज इसे सेवा का काम समझता रहा। दिल्ली की एक संस्था नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड 'नैब' के सुरक्षित घेरे में कुछ दृष्टि-बाधित बच्चों के यौन शोषण की घटना से एक बार फिर यही साबित हुआ है कि बेलगाम कुंठित आपराधिक इच्छाओं से लैस कुछ विदेशी किस कदर लाचार बच्चों के लिए खतरनाक साबित हो रहे हैं।
ब्रिटेन से भारत आया 54 वर्षीय ब्रिटिश नागरिक डेनिस वार्ड पिछले करीब नौ साल से नैब में मूक-बधिर बच्चों की देखभाल के लिए नियमित तौर पर आर्थिक मदद देता था और बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाता था। लेकिन इसकी आड़ में उसने आठ साल से कम के तीन बच्चों को अपनी हवस का शिकार बनाया। भरोसे के कत्ल का यह उदाहरण भले नया नहीं हो, लेकिन यह घटना किसी बच्चे की लाचारी का फायदा उठा कर उसका यौन शोषण करने के मामले में एक सभ्य समाज के बीच पलती मानसिक विकृतियों पर सोचने पर मजबूर करती है। लेकिन ज्यादा गंभीर सवाल यह है कि जहां इतने सारे मूक-बधिर और दृष्टि-बाधित बच्चों को रखा गया था, वहां व्यवस्था में इस कदर लापरवाही कैसे बरती गई कि किसी विदेशी व्यक्ति को अपनी आपराधिक कुंठा निकालने का मौका मिला। बल्कि उसके इस अपराध के संगठित होने की भी आशंका है, क्योंकि जब पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया तब उसके पास से मोबाइल और मैकबुक में काफी संख्या में आपत्तिजनक वीडियो भी मिले। इस बरामद सामान और उसकी गतिविधियों से इस बात की भी आशंका पैदा होती है कि क्या उसके तार बाल यौन-शोषण के धंधे में लगे किसी बड़े और अंतरराष्ट्रीय गिरोह से भी जुड़े हुए हैं!
अक्सर देखने व सुनने में आता है कि विदेशी सैलेब्रिटीज भारत सहित अफ्रीका, दक्षिणी अमेरिका के गरीब बच्चों को गोद ले लेते हैं और अपने साथ ले जाते हैं। सभी की बात नहीं करता परंतु अधिकतर सैलेब्रिटीज इन बच्चों को अपनी चैरिटी के शोरूम में आईटम बना कर रखते हैं। इनके माध्यम से दिखाते हैं कि वे कितने दानवीर व गरीब हितैषी हैं। कुछ विदेशी जो बच्चों को गोद नहीं ले सकते या सैलेब्रिटीज नहीं होते वे मिशनरीज के तौर पर भारत आते हैं, जिस तरह कि डेनिस वार्ड आया। ये चर्च या किसी अन्य गैर सरकारी संगठनों से जुड़ कर या अपने एनजीओ चला कर सेवा का काम करते हैं। देश में सयम-समय पर समाचार आते रहे हैं कि मिशनरी द्वारा संचालित विद्यालयों, छात्रावासों में किस कदर अपराधिक कार्य होते रहते हैं। उपेक्षित व निर्धन वर्ग के बच्चों लोगों से होने वाले इन अपराधों के प्रति समाज में उदासीनता बनी रहती है और यह 'दानववीर' धन लिप्सा के साथ-साथ यौनलिप्सा सहित अनेक तरह के अपराधों को निर्भय हो कर अंजाम देते रहते हैं। सेवा की मुखौटाधारी इन मिशनरियों के चलते देश में किस कदर सामाजिक विसंगतियां,तनाव, टकराव पैदा होते रहे हैं वह किसी से छिपे नहीं।
जिस तरह पश्चिम के लोग सेवा का मुखौटा ओढ़ कर गरीब देशों का शोषण करते हैं उसी भांति अरब देश के लोग रोजगार के नाम पर हमारी गरीबी का लाभ उठा रहे हैं। अभी हाल ही में समाचार प्रकाशित हुआ कि हैदराबाद में किस तरह एक 64 वर्षीय अरब ने एक 14 वर्षीय बच्ची के साथ निकाह के नाम पर दुराचार किया। समय-समय पर रहस्योद्घाटन होता रहा है कि रोजगार व निकाह के नाम पर भारत सहित पूरे भारतीय महाद्वीपीय देशों से गरीब बच्चियों का अरब देशों में व्यापार चलता है। खाड़ी देशों में रोजगार के नाम पर कितने ही लोग वहां फंस कर अपना जीवन बर्बाद कर चुके हैं। वहां पर उन्हें तृतीय श्रेणी के नागरिकों की तरह रखा जाता है जिनसे दासों की तरह व्यवहार किया जाता है। महिला नौकरों को तो यौन दासियों सा जीवन व्यतीत करना पड़ता है।
प्रश्न पैदा होता है कि आखिर कब तक विदेशी सेवा और रोजगार के नाम पर हमारा शोषण करते रहेंगे? क्या हम और हमारी सरकारें अपने लोगों को अपने स्तर पर स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार जैसी मौलिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं करवा सकते? आखिर हम कब तक अपने गरीब व लाचार बंधुओं के प्रति यूं ही पीठ फेरे रहेंगे। जब तक पीठ फेरे रहेंगे तब तक यूं ही पीठ पर छूरे घोंपे जाते रहेंगे। आओ अपने ही देश के इन गरीबों, दिव्यांगों, लाचारों  को हम ही गले लगाएं न कि इनको विदेशियों के रहमो कर्मों पर छोड़ें।
- राकेश सैन
मो. 097797-14324

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