Saturday, 13 January 2018

भारतीय इतिहास का गौरवशाली अध्याय, चालीस मुक्ते

अरदास में श्री गुरु ग्रंथसाहिब, दसों गुरुओं, चारों गुरुपुत्रों के साथ-साथ चालीस मुक्तों को भी श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है। वैसे तो सिख पंथ के इतिहास का एक-एक अक्षर शूरवीरता, बलिदान, मानव कल्याण, जनसेवा और देशभक्ति के गुणों से सराबोर है परंतु इनमें चालीस मुक्तों का इतिहास अपने आप में विलक्षण स्थान रखता है। यह इतिहास है देश की महिलाओं की बहादुरी का जिन्होंने गुरुघर से मुख मोड़ चुके पुरुषों की गैरत को ललकारा, यह प्रसंग संदेश है कि अगर जीवन-मरन से चक्र से मुक्ति चाहिए तो गुरु से कभी मुख न मोड़ें, किसी कारण विमुख हो गए तो दोबारा उसका पल्ला पकडऩे में संकोच न करें और अंतिम सांस तक अपने गुरु, धर्म, समाज व देश की सेवा करते रहें। इन उद्देश्यों के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने में नहीं झिझकें और चाहे इस मार्ग पर चलते हुए जान ही क्यों न चली जाए। बहुत सारगर्भित है उन चालीस मुक्तों की कथा जिनको आज मकर संक्रांति पर पूरा देश श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहा है और श्री मुक्तसर साहिब में बड़ा भारी मेला आयोजित किया जा रहा है।
आखिर कौन हैं ये चालीस मुक्ते? असल में ये चालीस मुक्ते वे योद्धा हैं जो किसी कारण युद्ध के दौरान श्री गुरु गोबिन्द सिंह का साथ छोड़ गए, परन्तु घर पहुंचने पर उनकी पत्नियों व परिवार के सदस्यों ने इन्हें ऐसी फटकार लगाई कि उनकी अन्तरात्मा गुरु की याद में बिलख उठी। फटकार के बाद चालीसों सैनिक गुरुजी की शरण में लौट आए और हमलावर मुगल सेना का भीषण संहार किया। देश-धर्म के प्रति इनके इस समर्पण को देखकर गुरु गोबिन्द सिंह ने इनको माफ कर दिया (अर्थात मुक्त कर दिया) इतिहास में यही चालीस वीर चालीस मुक्ते कहलाए।
सन् 1704 में चमकौर की गढ़ी के गौरवशाली प्रकरण के बाद गुरु गोबिन्द सिंह जी माछीवाड़ा के जंगलों में आ गए। वहां मुगल सेना उनका पीछा कर रही थी। 1705 में सिख व मुगलों का मुक्तसर के पास भयंकर संघर्ष हुआ। यहीं पर जत्थेदार महा सिंह के नेतृत्व में माझा इलाके के चालीस सिख सैनिक रोज-रोज की मुसीबतों से घबराकर गुरु जी का साथ छोड़ गए। जाते समय महा सिंह गुरुजी को यह पत्र भी लिख गये- आज से न तो वे उनके गुरु हैं और न ही हम सिख हैं। इतिहास में इस पत्र को बेदावा के नाम से जाना जाता है। जब ये चालीस सिख अपने घर पहुंचे तो घर की महिलाओं ने इनको धिक्कारते हुए कहा कि इस मुसीबत की घड़ी में जब गुरुजी को उनकी सबसे अधिक जरूरत थी वे गुरुजी को अकेले कैसे छोड़ आए। और महिलाओं ने भगोड़े सैनिकों को चूडिय़ां व घागरे भेंट कर घर का कामकाज करने को कहा। वे खुद मुगलों की जिहादी फौज से लोहा लेने की तैयारी करने लगीं। पत्नियों-माताओं की फटकार ने इन सैनिकों की आंखें खोल दीं और वे उल्टे पांव रणक्षेत्र की ओर लौट गए। बताया जाता है कि ये चालीस सैनिक मुगल सेना पर काल बन कर टूट पड़े और हमलावर मुगलों के पांव उखाड़ दिए। एक ऊंचे टीले पर बैठे गुरु गोबिन्द सिंह अपनी सेना की इस बहादुरी के कारनामे को देख रहे थे कि इसी दौरान उनकी नजर रणक्षेत्र में अंतिम सांसें ले रहे योद्धा जत्थेदार महान सिंह पर पड़ी। गुरु ने अपने घायल शिष्य का सर गोद में रख लिया और सहलाने लगे। गुरुजी ने इन चालीस सिखों को माफ कर दिया और महान सिंह से कुछ मांगने को कहा। घायल महान सिंह ने गुरुजी को वह बेदावा फाडऩे को कहा जो वे जाते समय लिख कर दे गए थे। गुरुजी ने अपने प्रिय शिष्य की इच्छा पूरी की और उनको पाप मुक्त कर दिया। इतिहास में ये चालीस शहीद चालीस मुक्ते कहलाए और इनकी मुक्ति का स्थान मुक्तिसर अर्थात मुक्तसर कहा जाने लगा।
यह हमारी बहुत बड़ी असफलता है कि हम अपनी विरासत का उचित सम्मान नहीं कर पा रहे हैं। स्वच्छ भारत अभियान के सर्वेक्षण के अनुसार यही मुक्तसर साहिब देश के दस सबसे मलिन शहरों में शामिल है। अर्थात जिस पावन भूमि ने पूरी मानवता को गुरु को समर्पित पाक-साफ जीवन पद्धति दी आज वही धरती हमारी असफलता के कारण गंदगीयुक्त है, साफ-सफाई वहां की सबसे बड़ी आवश्यकता बनी हुई है। आओ हम संकल्प लें कि जहां भी जाएं वहां स्वच्छता का ध्यान रखें, लंगर भी लगाएं तो वहां साफ-सफाई रखें, जूठे पत्तलों, प्लास्टिक के गिलासों को इधर-उधर न फैलाएं बल्कि कूड़ेदान में डालें। हमारी ओर से स्वच्छता ही हमारे प्राणप्रिय गुरुओं के प्रति, महान बलिदानी चालीस मुक्तों के प्रति सच्ची श्रद्धा होगी।
राकेश सैन
32 खण्डाला फार्मिंग कालोनी,
वीपीओ रंधावा मसंदा, 
जालंधर।
मो. 097797-14324

Friday, 12 January 2018

जब महारों, मराठों व सिखों ने मिल कर जीता युद्ध

जिस डाली पर बैठे उसी को काटने वाले शेख चिल्ली को अपना आदर्श मान रहे जिग्नेश मेवाणी व भारत के टुकड़े करने का सपना देखने वाले जेएनयू के विद्यार्थी उमर खालिद जैसे लोगों के लिए आज 13 व 14 जनवरी का दिन काला दिवस हो सकता है क्योंकि आज के दिन महारों, मराठों, सिखों, मुसलमानों, राजपूतों ने मिल कर ऐसा पराक्रम दिखाया कि विदेशी शक्तिाशाली ब्रिटिश सेना को दुम दबा कर भागना पड़ा। आज का दिन है राष्ट्रीय एकता की विजय का जो मेवाणियों व खालिदों की बिखराववादी राजनीति के अनुकूल नहीं। भीमा कोरेगांव के बहाने देश में दलित अस्मिता के नाम पर विभाजनकारी बीज बिखेरने वालों को आज का दिन सबक है कि जिस समानता, जाति अस्मिता की वह बात करते हैं वह मिलजुल कर भी प्राप्त की जा सकती है। जरूरी नहीं कि उसके लिए मराठों या किसी अन्य जाति वर्ग से टकराव मोल लिया जाए, समाज में वैमनस्य फैलाया जाए, लोगों के वाहन फूंके जाएं, सड़कें जाम की जाएं। 

वैसे देश के लिए दुर्भाग्य की बात है ब्रिटिश सेना के लिए लड़ रहे महारों व मराठों के बीच हुई हार जीत पर तो भीमा कोरेगांव में स्मारक बना है परंतु उस लड़ाई को कोई याद भी नहीं करता जो महारों, मराठों, सिखों, राजपूतों, मुसलमानों ने मिल कर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लड़ी और शानदार जीत प्राप्त की। इस युद्ध के नायक थे मराठा शासक महादजी शिंदे। आजादी हासिल करने की राह में ऐसे कम ही युद्ध हुए थे जहां भारतीय ताकतों को विजय मिली थी। वडग़ांव का युद्ध एक ऐसी ही जंग थी। बात आज से ठीक 239 साल पहले की है। वो समय था 13/14 जनवरी 1779 का। मराठा जनरल महादजी शिंदे ने शातिर अंग्रेजों को उनकी ही भाषा में जवाब देने की सोची। वह अंग्रेजी सेना को लुभाते-लुभाते खंडाला की पहाडिय़ों तक ले आए। ये इलाका ऐसा था जो मराठा सैनिकों के लिए जानी-पहचानी युद्धभूमि थी। मराठाओं की अश्वारोही सेना ने अंग्रेजों को चारों ओर से घेर लिया, इतना ही नहीं खोपली में उनके सप्लाई बेस को भी ध्वस्त कर दिया।

हताश और निराश अंग्रेज सैनिक रात के अंधेरे में तलगांव से पीछे हटने लगे, लेकिन मराठाओं की फौज कोई गलती नहीं करने वाली थी, जनरल महादजी की फौज ने फिर हमला किया और अंग्रेजी सेना रात के अंधेरे में वडगांव की ओर भागकर अपनी जान बचा पाई। लेकिन मराठा सैनिक अंग्रेजों का पीछा कहां छोडऩे वाले थे। वडगांव में अंग्रेजों को चारों ओर से घेर लिया गया। यहां पर ब्रितानी सेना के पास ना तो खाना था और ना ही पानी। जब इनके पास भूखों मरने की नौबत आ गई तो थकहार इन्होंने मराठा फौज के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। यह ब्रिटिश सेना की एक ऐसी हार थी जिसने अंग्रेजों के दर्प को चकनाचूर कर दिया।

हालांकि यहां पर भारतीय वही भूल कर बैठे जिसे दिल्ली के राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान ने 12वीं सदी में इस्लामी हमलावर मोहम्मद गौरी के साथ की थी। मराठा फौज ने दया और धर्म का परिचय देते हुए अंग्रेजों को बंबई वापस लौटने की अनुमति दे दी। इसका नतीजा यह हुआ कि अगले दिन मराठाओं को अंग्रेंजों से फिर एक लड़ाई लडऩी पड़ी। वडग़ांव का युद्ध भारत की विजय थी। इस लड़ाई में अंग्रेजों को मात देने वाली मराठा फौज में मुस्लिम, राजपूत, सिख शामिल थे। जबकि पैदल सेना में मोर्चा महार संभाल रहे थे। हांलाकि अंग्रेजों ने भारत पर राज करने के बाद इस युद्ध का इतिहास अपने तरीके से लिखा। अंग्रेज लेफ्टिनेंट स्टीवर्ट जो कि अंग्रेजों के अग्रिम मोर्चे का नेतृत्व कर रहा था उसे मराठाओं ने जनवरी महीने के शुरुआत में ही मार दिया था। लेकिन इतिहास में उसे वडग़ांव युद्ध के 'हीरो' का दर्जा दिया गया और उसके उस शौर्य को पंक्बिद्ध किया गया। जबकि वडग़ांव का युद्ध उसकी मौत के लगभग 2 महीने बाद हुआ था। बाद में महाराष्ट्र के वडग़ांव में एक कब्र की पहचान कर गया कि यह लेफ्टिनेंट स्टीवर्ट की कब्र है उसके बाद हर साल वहां पर मेले का आयोजन किया जाने लगा।

हम भारतीयों के पास दो विकल्प हैं, एक तो 200 साल पहले भीमा कोरेगांव की तरह विदेशियों के हाथों में खेलते हुए आपस में लड़ें या फिर वडग़ांव की तरह एकजुट हो कर दुश्मन को परास्त करें। भीमा कोरेगांव प्रतीक है कि जब-जब हम आपस में लड़े तो इसका लाभ विदेशियों ने उठाया, देश पर दूसरों का शासन स्थापित हुआ, हमारे लिए गुलामी का दौर चला, विकास रुका, गरीबी आई, देश का विभाजन हुआ, हम भारतीयों पर भयंकर अत्याचार हुए, खून खराबा हुआ। वडग़ांव युद्ध प्रतीक है कि जब-जब हम एकजुट हुए बड़ी से बड़ी सेना भी हमसे परास्त हुई। वह विदेशी परास्त हुए जो हमें गुलामी की जंजीरों में बांधने आए, हमारी स्वतंत्रता को बाधित करने आए, विकास का मार्ग अवरुद्ध करने आए। स्वतंत्रता, भाईचारा, सामाजिक सौहार्द, वर्गगत समरसता मार्ग है विकास का, उन्नति का, प्रगति का हम भारतीयों को किस मार्ग पर आगे बढऩा है उसका निर्धारण हमें खुद को करना है।
राकेश सैन
32 खण्डाला फार्मिंग कालोनी,
वीपीओ रंधावा मसंदा,
जालंधर।
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Thursday, 11 January 2018

स्वामी विवेकानंद, दुनिया को सिखाया भाईचारे का सबक



भारत एक ऐसा देश है जहां धर्म को लेकर कोई सवाल उठाने से पहले सौ बार सोचता है। 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में जन्मे स्वामी विवेकानंद ने धर्म को विज्ञान के नज़र से देखने का नया नज़रिया दिया। कहा जा सकता है कि आधुनिक भारत की नीव अगर किसी ने रखी तो वह विवेकानंद ही थे।विवेकानंद ने पूरी दूनिया में हिंदू धर्म को लेकर एक नयी परिभाषा गढ़ी। विवेकानंद ने संसार को भारतीय दर्शन और वेद का पाठ पढ़ाया, जिसके सामने पूरी दुनिया नतमस्तक हो गई। हलांकि उनका जीवनकाल काफी ज़्यादा नहीं रहा और वो महज़ 39 साल की उम्र में दुनिया से विदा हो गए थे। आज पूरी दुनिया में युद्ध और उन्माद फैला हुआ है वहीं विवेकानंद लोगों को शांति और भाईचारे के साथ रहने का संदेश देते हैं। भारत में आज जहां धर्म को लेकर उत्तेजक माहोल बनाया जा रहा है वहीं विवेकानंद की विचारधारा धर्म में आज़ादी की बात करती है।

1893 ई. में जब अमेरिका के प्रसिद्ध शिकागो में विश्व धर्म संसद का आयोजन किया गया तो भरत की तरफ से विवकानंद इसमें हिस्सा लने पहुंचे। इस धर्म संसद में दुनिया भर से अलग-अलग धर्मों के विद्वानों ने हिस्सा लिया लेकिन जब विवेकानंद ने सबके सामने वेदांत का ज्ञान दिया तो पूरा संसद तालियों से गूंज उठा। विवेकानंद ने अपने भाषण की शुरुआत में अमेरिका के लोगों को भाईयों और बहनो कहकर संबोधित किया जिससे वहां के लोग कापी प्रसन्न हुए। दरअसल विवेकानंद ने दुनिया को बताया कि भारत सभी लोगों को एक परिवार की तरह देखता है। उन्होंने पूरी दुनिया को बताया कि भारत न केवल शांति प्रिय देश है बल्कि वो सारे संसार के साथ सामंजस्य बिठाकर रहने और सबके लिए मदद के दरवाजे खोलने की नीति में भरोसा करता है। अमेरिकी लोगों ने भारत के इस नज़रिए को खूब सराहा। उनके भाषण के कुछ प्रमुख अंश इस प्रकार है-
‘अमेरिका के बहनो और भाइयो।
मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूं, जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मों के परेशान और सताए गए लोगों को शरण दी है। मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन इस्त्राइलियों की पवित्र स्मृतियां संजोकर रखी हैं, जिनके धर्म स्थलों को रोमन हमलावरों ने तोड़-तोड़कर खंडहर बना दिया था। और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली थी। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और अभी भी उन्हें पाल-पोस रहा है।

25 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ साधु बन गए विवेकानंद, दुनियाभर में लेकर गए भारतीय सभ्यता
भाइयो, मैं आपको एक श्लोक की कुछ पंक्तियां सुनाना चाहूंगा जिसे मैंने बचपन से स्मरण किया और दोहराया है और जो रोज करोड़ों लोगों द्वारा हर दिन दोहराया जाता है: जिस तरह अलग-अलग स्त्रोतों से निकली विभिन्न नदियां अंत में समुद में जाकर मिलती हैं, उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है। वे देखने में भले ही सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगें, पर सभी भगवान तक ही जाते हैं।वर्तमान सम्मेलन जोकि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, गीता में बताए गए इस सिद्धांत का प्रमाण है: जो भी मुझ तक आता है, चाहे वह कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं। लोग चाहे कोई भी रास्ता चुनें, आखिर में मुझ तक ही पहुंचते हैं।


सांप्रदायिकताएं, कट्टरताएं और इसके भयानक वंशज हठधमिर्ता लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी बार ही यह धरती खून से लाल हुई है। कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं। अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता, लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।

मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। आज भी जब युवाओं को प्रेरणा लेना होता है तो वो विवेकानंद के जीवन से लेते हैं। विवेकानंद का कहना था लक्ष्य का तब तक पीछा करो जब तक की ध्येय की प्राप्ती न हो जाए। विवेकानंद जी ने बताया कि तुम जो भी कर रहे हो अपना पूरा दिमाग उसी एक काम पर लगाओ। अगर तुम निशाना लगा रहे हो तो पूरा ध्यान सिर्फ अपने लक्ष्य पर रखो, तुम कभी नहीं चूकोगे। वर्तमान समय में भी अगर राजनीति से ऊपर उठकर विवेकानंद की विचारधारा पर विचार किया गया तो युवा न केवल अपनी ज़िंदगी में बल्कि समाज में भी बेहतर तालमेल बिठाकर विकास के मार्ग पर बढ़ सकता है।



राकेश सैन
32 खण्डाला फार्मिंग कालोनी,
वीपीओ रंधावा मसंदा,
जालंधर।
मो. 097797-14324

ज्ञान के मंदिरों में आतंक के अंकुर

उन लोगों की आंखें खुल जानी चाहिएं जिन्होंने जेएनयू में भारत को तोडऩे के नारों को अभिव्यक्ति की आजादी बताया, उन आंखों से पर्दा उठ जाना चाहिए जो हर घर से अफजल निकलने की बात को युवाओं का व्यवस्था के प्रति आक्रोश जताते नहीं थक रहे थे। नारे लगाने वालों की बात सत्य साबित होती दिख रही है, अब घरों से भारत को तोडऩे के लिए अफजल और याकूब मैनन निकलने लगे हैं। अभी अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय (एएमयू) ने अपने एक शोध छात्र मन्नान वानी के गायब होने और आतंकी संगठन हिज्बुल मुजाहिदीन में शामिल होने के  समाचार के बाद निष्कासित कर दिया। साफ है कि अब आतंकी संगठनों की विषबेल के अंकुर हमारे ज्ञान के मंदिरों में फूटने लगे हैं। देश को तोडऩे निकले संगठनों की पहुंच विश्वविद्यालयों में पढऩे वाले युवाओं तक हो रही है। जेएनयू की घटना इसकी व्हिसल ब्लोअर थी परंतु हम चेते नहीं बल्कि आपस में उलझ गए फिजूल की बहस व राजनीतिक आरोप प्रत्यारोपों में। इससे प्रोत्साहन मिला देश को तोडऩे का इरादा रखने वालों को और परिणाम निकला मन्नान वानी के रूप में, जो हाल ही में सोशल मीडिया पर खरनाक हथियारों के साथ नजर आया। 
जम्मू-कश्मीर के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक मुनीर खान ने कहा है कि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि गायब हुआ वानी हिज्बुल में शामिल हो ही गया है। फिलहाल उसके लापता होने और उसके बारे में सामने आए संदेहों की जांच जारी है और पुलिस किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंची है, लेकिन एएमयू का फैसला बताता है कि वानी तबाही के मार्ग पर कदम बढ़ा चुका है। वानी अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय से 'स्ट्रक्चरल एंड जियो-मॉर्फोलॉजिकल स्टडी ऑफ लोलाब वैली, कश्मीरÓ विषय पर शोध कर रहा है। उसे 2016 में 'वाटर, एनवायर्नमेंट, इकोलॉजी एंड सोसाइटीÓ विषय पर बेहतरीन रिपोर्ट देने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में सम्मानित किया गया था। मगर अच्छे शैक्षिक रिकॉर्ड के बावजूद अगर मन्नान वानी के किसी आतंकी संगठन में शामिल होने की खबर आती है तो यह सोचने का समय है कि वह कौन सी विषाक्त विचारधारा है जो हमारे प्रतिभाशाली युवाओं को भी बहका कर उसके हाथ में क्लाशनीकोव-47 थमा देने की जुर्रत कर सकती है। अभी हाल ही में फुटबॉल का एक राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी रहा युवक एक आतंकवादी संगठन में शामिल हो गया था। पर जब उसके परिवार ने उससे वापस चले आने की भावुक गुजारिश की तो वह लौट आया। लेकिन सच यह भी है कि कई ऐसे युवक आतंकी संगठनों के जाल में इस कदर उलझ जाते हैं, उनके सामने लौटने का कोईरास्ता नहीं बचता। पहले कहा जाता था कि मदरसों में मिलने वाली इस्लामिक शिक्षा के कारण आतंक की पौध विकसित हो रही है परंतु अब तो देखने में आरहा है कि इंटरनेट और अतिवादी विचारों के जरिये, युवा इसलामिक स्टेट के चंगुल में फंसते जा रहे हैं। नई तकनीक व आधुनिक शिक्षा भी एक वर्ग की सोच में बदलाव नहीं ला पा रही।
वैसे यह कोई पहले उदाहरण नहीं हैं जो इस खतरे की ओर इशारा करते हों कि हमारे ज्ञान के मंदिर अब आतंकवाद की नर्सरी भी बन रहे हैं। मुंबई के चार युवा इराक में मई, 2014 में इसलामिक स्टेट में शामिल हुए थे। मुंबई के कल्याण इलाके का निवासी सिविल इंजीनियरिंग का तीसरे वर्ष का छात्र आरिफ माजिद , 24 मई, 2014 को दोपहर 11 से 12 बजे के बीच मसजिद में नमाज पढऩे के बहाने घर से निकला था। अगले दिन इसके पिता को आरिफ द्वारा लिखी पर्ची मिली, जिसमें उसने इराक में जिहादियों के साथ जुडऩे की बात कही। अगस्त, 2014 के आखिरी सप्ताह में इसके साथी शाहीन टांकी ने अपने परिवार को आरिफ के इराक के मोसुल में एक बम धमाके में मारे जाने की खबर दी। इसी वर्ष अक्तूबर में खबर आयी थी कि सीरिया के राक्का शहर में इसलामिक स्टेट के लिए काम कर रहे आजमगढ़ के एक युवक ने अपने परिवार से संपर्क कर वापस आने की इच्छा जाहिर की। बारहवीं कक्षा पास इस युवा का इंटरनेट के जरिये इसलामिक स्टेट से संपर्क हुआ। दिसंबर, 2015 में दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने जानकारी दी थी कि जामिया मिलिया इसलामिया के दो छात्र अलकायदा में शामिल हो गये। स्पेशल सेल को यह जानकारी भारतीय महाद्वीप में सक्रिय अल-कायदा के तीन आतंकियों से पूछताछ से मिली। सितंबर, 2014 में तेलंगाना पुलिस ने पश्चिम बंगाल में हैदराबाद के 15 युवाओं की पहचान की, जो इसलामिक स्टेट में शामिल होने के विचार से प्रेरित थे। इसी साल महाराष्ट्र के नागपुर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से इसलामिक स्टेट में शामिल होने की मंशा से जा रहे तीन हैदराबादी युवकों को हिरासत में लिया गया था। पिछले वर्ष सितंबर में हैदराबाद की निवासी आफ्शा जबीन को संयुक्त अरब अमीरात से प्रत्यार्पित कर भारत लाया गया। यह सोशल मीडिया के माध्यम से अतिवादी इसलाम के प्रति युवाओं को आकर्षित करती थी। वर्ष 2002 में इसने एक हिंदू युवक देवेंद्र बत्रा से शादी की। नवंबर 2016 में विभिन्न इंटेलिजेंस रिपोर्टों के आधार पर जानकारी मिली थी कि आतंकियों के रूप में कुल 23 भारतीय भी इसलामिक स्टेट से जुड़े हुए हैं। इनमें से छह की अलग-अलग घटनाओं में मौत हो चुकी है। मृतकों के नाम-आतिफ वसीम मोहम्मद निवासी अदिलाबाद, तेलंगाना, मोहम्मद उमर सुभान निवासी बेंगलुरु, कर्नाटक, मौलाना अब्दुल कादिर सुल्तान अर्मार निवासी भटकल, कर्नाटक, सहीम फारूक टांकी निवासी थाणे, महाराष्ट्र, फैज मसूद निवासी बेंगलुरु, कर्नाटक और मोहम्मद साजिद उर्फ बड़ा साजिद निवासी आजमगढ़, उत्तर प्रदेश बताए गए।
बुद्धिजीवी लोग आतंकवाद पनपने के पीछे अशिक्षा, गरीबी, असमानता जैसे कारण गिनाते हैं परंतु इन केसों में देखने में आरहा है कि उक्त युवा न केवल उच्च शिक्षा प्राप्त, आईटी, विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं बल्कि संपन्न घरानों से भी संबंधित हैं। लेकिन इसके बावजूद अगर वे आतंकवाद की ओर आकर्षित हो रहे हैं तो समझना चाहिए कि समस्या की जड़ कहीं ओर है जिस पर हमारा अभी ध्यान नहीं गया या फिर हम आंखें मूंद कर बैठे हुए हैं। देश के विश्वविद्यालयों में जिस तरह का महौल तैयार हो रहा है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने देशविरोधी गतिविधियों पर पर्दा डालने का प्रयास करने वालों को भी सचेत हो जाना चाहिए कि कहीं वे जान-अनजाने आतंकी संगठनों का मोहरा तो नहीं बन रहे।
राकेश सैन
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Wednesday, 10 January 2018

राष्ट्र जीवन में भी घटे मकर संक्रांति

संक्रांति प्रतीक है परिवर्तन का, सामाजिक समरसता का, एकता व बंधुत्व का। तिल गुणवान हैं परंतु गुड़ के बिना बेस्वाद, जिनको खाया नहीं जा सकता। घी डलते ही खिचड़ी की गुणवत्ता दोगुनी हो जाती  है। गुड़ के बिना तिल का महत्त्व नहीं और घी के बिना खिचड़ी अधूरी, समाज में दूसरे के बिना मैं अधूरा, इसी तरह मैं भी किसी का पूरक। एक-दूसरे का महत्त्व समझते हुए समाज में समरस हो कर रहना संदेश है मकर संक्रांति का। आज जब देश में सामाजिक एकता के ताने बाने को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास चल रहा है, जातिवाद, सांप्रदायिकता के नाम पर एक वर्ग को दूसरे से लड़ाने के  प्रयास हो रहे हैं तो समरस, सरस और सर्वसमाज समभाव का संदेश लेकर आरही है मकर संक्रांति। 

मकर संक्रांति में 'मकर' शब्द मकर राशि को इंगित करता है जबकि 'संक्रांति' का अर्थ संक्रमण अर्थात प्रवेश करना है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। एक राशि को छोड़कर दूसरे में प्रवेश करने की इस विस्थापन क्रिया को संक्रांति कहते हैं। चूंकि सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है इसलिए इस समय को मकर संक्रांति कहा जाता है। भारीतय पंचांग के महीने के अनुसार पौष शुक्ल पक्ष में मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता है। जैसे चन्द्रमास के 2 भाग हैं- कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। इसी तरह सौरवर्ष के आधार पर वर्ष के 2 भाग हैं- उत्तरायन और दक्षिणायन। इस दिन से सूर्य उत्तरायन हो जाता है। उत्तरायन अर्थात उस समय से धरती का उत्तरी गोलाद्र्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है, तो उत्तर ही से सूर्य निकलने लगता है। 6 माह सूर्य उत्तरायन रहता है और 6 माह दक्षिणायन। अत: यह पर्व 'उत्तरायन' के नाम से भी जाना जाता है। 

पृथ्वी साढ़े 23 डिग्री अक्ष पर झुकी हुई सूर्य की परिक्रमा करती है तब वर्ष में 4 स्थितियां ऐसी होती हैं, जब सूर्य की सीधी किरणें 21 मार्च और 23 सितंबर को विषुवत रेखा, 21 जून को कर्क रेखा और 22 दिसंबर को मकर रेखा पर पड़ती है। वास्तव में चन्द्रमा के पथ को 27 नक्षत्रों में बांटा गया है जबकि सूर्य के पथ को 12 राशियों में बांटा गया है। भारतीय ज्योतिष में इन 4 स्थितियों को 12 संक्रांतियों में बांटा गया है जिसमें से 4 संक्रांतियां महत्वपूर्ण होती हैं- मेष, तुला, कर्क और मकर संक्रांति। यह पर्व संपूर्ण अखंड भारत में फसलों के आगमन की खुशी के रूप में मनाया जाता है। खरीफ की फसलें कट चुकी होती हैं और खेतों में रबी की फसलें लहलहा रही होती हैं। खेत में सरसों के फूल मनमोहक लगते हैं।

मकर संक्रांति को देश के अलग-अलग राज्यों में वहां के स्थानीय तरीकों से मनाया जाता है। दक्षिण भारत में इस त्योहार को पोंगल के रूप में मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे लोहड़ी-माघी, खिचड़ी पर्व, पतंगोत्सव आदि कहा जाता है। मध्यभारत में इसे संक्रांति कहा जाता है। मकर संक्रांति को उत्तरायन, माघी, खिचड़ी आदि नाम से भी जाना जाता है। पंजाब के श्री मुक्तसर साहिब में इस दिन भारी मेला लगता है जहां सिख पंथ के चालीस मुक्तों को नमन किया जाता है और देश-धर्म की रक्षा के लिए की गई उनके बलिदानों का स्मरण किया जाता है।

सर्दी के मौसम में वातावरण का तापमान बहुत कम होने के कारण शरीर में रोग और बीमारियां जल्दी लगती हैं इसलिए इस दिन गुड़ और तिल से बने मिष्ठान्न या पकवान बनाए, खाए और बांटे जाते हैं। इनमें गर्मी पैदा करने वाले तत्वों के साथ ही शरीर के लिए लाभदायक पोषक पदार्थ भी होते हैं। उत्तर भारत में इस दिन खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। गुड़-तिल, रेवड़ी, गजक का प्रसाद बांटा जाता है। पुराणों के अनुसार, इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनिदेव से नाराजगी त्यागकर उनके घर गए थे इसलिए इस दिन पवित्र नदी में स्नान, दान, पूजा आदि करने से पुण्य हजार गुना हो जाता है। इस दिन गंगासागर में मेला भी लगता है। इसी दिन मलमास भी समाप्त होने तथा शुभ माह प्रारंभ होने के कारण लोग दान-पुण्य से अच्छी शुरुआत करते हैं। इस दिन को सुख और समृद्धि का माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायन का महत्व बताते हुए गीता में कहा है कि उत्तरायन के 6 मास के शुभ काल में जब सूर्यदेव उत्तरायन होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है, तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यही कारण था कि भीष्म पितामह ने शरीर तब तक नहीं त्यागा था, जब तक कि सूर्य उत्तरायन नहीं हो गया।

धर्मशास्त्रों के अनुसार मकर संक्रांति से देवताओं का दिन आरंभ होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है। मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं। महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था इसलिए मकर संक्रांति पर गंगासागर में मेला लगता है। राजा भगीरथ सूर्यवंशी थे, जिन्होंने भगीरथ तप साधना के परिणामस्वरूप पापनाशिनी गंगा को पृथ्वी पर लाकर अपने पूर्वजों को मोक्ष प्रदान करवाया था। राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों का गंगाजल, अक्षत, तिल से श्राद्ध तर्पण किया था। तब से माघ मकर संक्रांति स्नान और मकर संक्रांति श्राद्ध तर्पण की प्रथा आज तक प्रचलित है। कपिल मुनि के आश्रम पर जिस दिन मातु गंगे का पदार्पण हुआ था। पावन गंगा जल के स्पर्श मात्र से राजा भगीरथ के पूर्वजों को स्वर्ग की प्राप्ति हुई थी। कपिल मुनि ने वरदान देते हुए कहा था, -मातु गंगे त्रिकाल तक जन-जन का पापहरण करेंगी और भक्तजनों की सात पीढिय़ों को मुक्ति एवं मोक्ष प्रदान करेंगी। गंगा जल का स्पर्श, पान, स्नान और दर्शन सभी पुण्यदायक फल प्रदान करेगा। सूर्य की सातवीं किरण भारत वर्ष में आध्यात्मिक उन्नति की प्रेरणा देने वाली है। सातवीं किरण का प्रभाव भारत वर्ष में गंगा-जमुना के मध्य अधिक समय तक रहता है। इस भौगोलिक स्थिति के कारण ही हरिद्वार और प्रयाग में माघ मेला अर्थात मकर संक्रांति या पूर्ण कुंभ तथा अद्र्धकुंभ के विशेष उत्सव का आयोजन होता है।

मकर संक्रांति पर्व है राष्ट्रजीवन में परिवर्तन के संकल्प, सामाजिक एकता, जातिगत, भाषागत, क्षेत्रगत भेदभाव भुला कर एक सशक्त समाज का निर्माण करते हुए एक मजबूर राष्ट्र की नींव रखने का। आओ मकर संक्रांति के तिल के लड्डुओं से हम एकदूसरे से मिल कर रहने का ज्ञान लें, समाज में घी-खिचड़ी बन कर रहने की आदत सीखें। समाज एकजुट होगा तो संक्रांति अवश्य घटित होगी, नया सवेरा जरूर आएगा, रिश्तों की सर्द रातें जरूर ऊष्मा भरे दिवस में परिवर्तित होंगी।
- राकेश सैन
32, खण्डाला फार्मिंग कालोनी,
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Tuesday, 9 January 2018

प्रेस की स्वतंत्रता बनाम लक्ष्मणरेखा

वैसे तो अपना समाज सदा से वैचारिक स्तर पर प्रखर रहा है। कुरुक्षेत्र में कही गई गीता साक्षी है कि हमने युद्ध जैसे आपात्काल में भी विचारों के धाराप्रवाह को बाधित नहीं होने दिया परंतु संचार के क्षेत्र में नवीनतम क्रांति आने के बाद नई चुनौतियां सामने आती दिख रही हैं। देश में कई बार प्रेस की स्वतंत्रता के बहाने अभिव्यक्ति की आजादी, लक्ष्मणरेखा व सीमोल्लंघन जैसे मुद्दों को लेकर बहस हो चुकी है और अब आधार डेटा लीक का खुलासा करने वाले अखबार 'द ट्रिब्यून' की पत्रकार रचना खैरा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने के बाद इन मुद्दों पर नए स्तर पर चर्चा छिड़ गई है। 


समाचारपत्र ने 3 जनवरी को एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें दावा किया गया कि कई गिरोह पैसे लेकर आधार कार्ड का डेटा लीक कर रहे हैं। खुलासा होने पर यूनीक आईडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (यूआईडीएआई) ने इसकी संभावना से इनकार कर दिया। अगले दिन यूआईडीएआई के निदेशक ने पत्रकार रचना खैरा के खिलाफ दिल्ली स्थित अपराध शाखा में विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज करवाई। संपादकों की संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने यूआईडीएआई के इस फैसले की कड़ी निंदा की और इसे अनुचित, अन्यायपूर्ण और प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला करार दिया है। इस पर यूआईडीएआई ने सफाई दी है कि प्राथमिकी दर्ज करवाए जाने को मीडिया की आजादी पर हमला नहीं माना जाए। यूआईडीएआई पूरी तरह से प्रेस की आजादी का सम्मान करता है। इस मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है और लोकसभा में दूसरे सबसे बड़े दल कांग्रेस ने कहा कि सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मामले की जांच करने के बजाय मामले में टालमटोल कर रहे हैं और खबर देने वाले को ही निशाना बना रहे हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में इस मामले को लेकर पत्रकारों ने प्रदर्शन किए और प्राथमिकी वापिस लेने की भी मांग की है।


देश के संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत हर भारतीय को विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। इसी अधिकार के तहत मीडिया या प्रेस को काम करने की पूरी स्वतंत्रता मिली हुई है। भारतीय समाज के जीवन का कोई ही शायद हिस्सा ऐसा हो जिसे वर्तमान मीडिया प्रभावित न करता हो। यहां मीडिया के शक्तिशाली होने का इसी बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि साल 2016 के आंकड़ों के अनुसार, देश में 70000 दैनिक समाचारपत्र पंजीकृत हैं और प्रतिदिन 10 करोड़ प्रतियां प्रकाशित की जाती हैं। देश में 1600 सैटेलाइट चैनल व 400 न्यूज चैनल हैं। प्रसार भारती की आल इंडिया रेडियो व दूरदर्शन के माध्यम से सभी पौने छह लाख गांवों तक पहुंच बनी हुई है। देश में 45 करोड़ के करीब लोग विभिन्न सोशल मीडिया से जुड़े हुए हैं। आपात्काल को छोड़ दिया जाए तो यहां प्रेस की स्वतंत्रता का सदैव सम्मान किया गया है और सत्ता परिवर्तन से लेकर राजनेताओं,अधिकारियों व बड़े घरानों के घोटालों के पटाक्षेप में मीडिया ने अहम भूमिका निभाई है। परंतु तस्वीर का दूसरा श्याम पक्ष भी है कि प्रेस की स्वतंत्रता आंकने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था रिपोट्र्स विदाउट बार्डर के आकलन में भारत का विश्व में 148वां स्थान है जो पाकिस्तान, आफगानिस्तान व अफ्रीकी देशों के आसपास बैठता है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए यह चिंताजनक तथ्य है कि गणतंत्र की प्राथमिक आवश्यकता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामले में हम कंजूस हैं।


द ट्रिब्यून की पत्रकार रचना खैरा के मामले में इसी तरह की दलीलें दी जा रही हैं। आधार पर किए उनके स्टिंग को जनहित में बताया जा रहा है। स्टिंग शब्द की उत्पत्ति अमेरिका से हुई, इसे वहां की पुलिस द्वारा अपराधियों को पकडऩे के लिए गुप्त योजना के अर्थ में प्रयोग किया जाता था। इसे खोजी और गुप्त पत्रकारिता भी कह सकते हैं। स्टिंग ऑपरेशन असल में सूचना एकत्र करने का एक ऐसा तरीका है जिसमें उस सूचना को प्राप्त किया जाता है जिसे हासिल करना दूसरी तरह से बहुत ही कठिन हो। पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता दिलीप सिंह जूदेव के खिलाफ हुए एक स्टिंग ऑपरेशन से संबंधित मामले में सुनवाई के दौरान न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने कहा कि वह स्टिंग ऑपरेशन से पूर्णत: सहमत हैं अधिक से अधिक स्टिंग ऑपरेशन होने चाहिएं, जिससे भ्रष्ट लोगों को सामने लाया जा सके। साथ ही उन्होंने कहा कि जो स्टिंग ऑपरेशन कर रहा है उसके साथ अपराधी जैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। उसका उद्देश्य समाज में फैले भ्रष्टाचार को सामने लाना होता है। काटजू के विचार भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के जी बालकृष्णन की अध्यक्षता वाली एक दूसरी खंडपीठ के उलट हैं, जिसने एक चैनल के पत्रकार-जिसने गुजरात के एक अधीनस्थ कोर्ट में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर किया,से बिना शर्त क्षमा मांगने के लिए कहा। 2004 में उस रिपोर्टर ने चार बड़ी हस्तियों-जिनमें पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश शामिल थे-के खिलाफ अहमदाबाद के कोर्ट से जमानती वारंट जारी करा लिए थे।


प्रेस की स्वतंत्रता के बीच कभी-कभी आवश्यकता यह भी महसूस होती रही है कि मीडिया के लिए भी कोई न कोई लक्ष्मणरेखा तय होनी चाहिए, चाहे वह इसका निर्धारण खुद करे। तर्क दिया जाता है कि संविधान के अनुच्छेद 19 (1) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है तो इसमें एक उपबंध भी है जो कहता है कि देश की सुरक्षा, विदेशों के साथ संबंध, कानून-व्यवस्था, नैतिकता, किसी की अवमानना, भारत की एकता-अखण्डता से जुड़ा मुद्दा हो तो राज्य इन अधिकारों को सीमित भी कर सकता है। कहने का भाव कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो है परंतु शर्तों के साथ, बेलगाम नहीं।

पिछले साल 24 अगस्त को एक महत्त्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए देश की सर्वोच्च अदालत निजता को नागरिक के मौलिक अधिकारों की हिस्सा मान चुकी है, हालांकि अदालत ने यह भी कहा है कि आधार कार्ड से जुड़े मामले का निर्णय अभी किया जाना है। ऐसे में द ट्रिब्यून की पत्रकार रचना खैरा ने किसी आधार कार्ड की जानकारी का प्रिंट प्राप्त किया है तो वह अदालत के इस आदेश का उल्लंघन ही माना जा सकता है। तथ्य यह भी है कि किसी निजी व्यक्ति (पत्रकार) को किसी भी के यहां छापामारी की अनुमति नहीं दी जा सकती। कहीं अपराध हो रहा हो और उसको साबित करने के लिए कोई पत्रकार खुद अपराध करता है तो उसे पत्रकार होने के तर्क पर निरपराध घोषित नहीं किया जा सकता। आदर्श स्थिति तो यह है कि अगर कहीं गलत हो रहा है और उसके बारे में गुप्त जानकारी जुटानी है तो इसके लिए स्थानीय प्रशासन को विश्वास में लिया जाए। कहने वाले कहेंगे कि अगर प्रशासन ने ही कार्रवाई करनी होती तो वह पहले क्यों नहीं करता तो सच्चाई यह भी है कि मीडिया के पटाक्षेप के बाद भी कार्रवाई तो आखिर प्रशासन को ही करनी होती है। अपराधी के  लिए सजा का निर्धारण अदालतें ही करती हैं तो ऐसे में मीडिया कर्मियों को स्टिंग से पहले प्रशासन को विश्वास में लेना कैसे अनुचित हो जाएगा। पत्रकार भी देश का एक नागरिक है और उसे किसी तरह का विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है, लेकिन देखने में आता है कि बहुत से मीडिया कर्मी अपने कत्र्तव्य को अंजाम देते समय इस तथ्य की उपेक्षा करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। बहुत से प्रेस वाले अपनी जान पहचान व बड़े लोगों के साथ संबंधों के चलते खुद को कुलीन वर्गीय या कानून से ऊंचा समझना शुरू कर देते हैं। जैसे कि देश का संविधान बताता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता स्वच्छंदता नहीं, इसके साथ प्रतिबंध भी जुड़े हैं और कत्र्तव्य बोध भी। आदर्श स्थिति तो यह होगी कि मीडिया अपने दायित्वों का पालन भी करे पूरी स्वतंत्रता के साथ परंतु सीमोल्लंघन से बचे।



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Monday, 8 January 2018

ताना और रिरी, जिनका गीत सुनने को तानसेन भी तरसते थे

संगीत सम्राट तानसेन के बारे में कहा जाता है कि वह स्वरों के सम्राट थे और अकबर के नवरत्नों में एक। लेकिन उस काल में दो बहने ऐसी भी हुईं जिनका गीत सुनने के लिए स्वयं तानसेन के भी कान तरसते थे। तानसेन अकबर के दरबार में दीपक राग गाते हुए भीतर से आग में दहकने लगे और उस अग्नि को मल्हार राग गा कर शांत किया था दो बहनों ने इतिहास में जिनका नाम ताना और रीरी के नाम से विख्यात है।
सोलहवीं सदी में भारत पर महान मुगल बादशाह अकबर की हकूमत थी। उसका मुख्य संगीतकार तानसेन विभिन्न रागों के उस्ताद गवैये थे। जब अकबर ने सुना कि तानसेन दिपक राग इतनी अच्छी तरह गा सकता है कि उस की शक्ति से दिये जल उठते हैं, तब उसने तानसेन की कसौटी करने की ठान ली। एक दिन राज-दरबार में अकबर ने तानसेन को दिपक राग गाने के लिये कहा। तानसेन ने बादशाह से बहुत बिनती की कि उसे दीपक राग गाने के लिये आग्रह न किया जाय, क्योंकि वह अच्छी तरह जानता था कि उसका क्या दुष्परिणाम आ सकता है। लेकिन अकबर ने उस संगीतकार की एक न मानी और दीपक गाने का आदेश दे दिया। 
तानसेन ने दीपक राग गाना शुरु किया और जैसे वह उसकी चरम सीमा पर पहुंचा, तो सचमुच सारे महल में रखे गये दिये अपने आप जल उठे। अकबर सहित सारे दरबारी चकित हो कर तानसेन पर फिदा हो गये। लेकिन, उधर राग के असर से तानसेन का पूरा बदन भीतर ही भीतर जलने लगा। अपने बदन में जलती हुई आग बुझाने का सिर्फ एक ही रास्ता था और वह था मल्हार राग गाना। शुद्ध मल्हार राग बरसात बरसाने की क्षमता रखता है और उससे दीपक गानेवाले के बदन को शांति भी मिलती है। लेकिन तानसेन खूद तो मल्हार जानता नही था। और न तो अकबर के दरबार में और कोई गवैया वह जानता था। तब जलते हुए बदन से परेशान तानसेन ऐसे कोई संगीतकार की तलाश में दिल्ली छोड़ कर निकल पड़ा। वह सारे मुल्क में घूमता रहा, लेकिन उसे मल्हार का कोई गवैया नही मिला। तब जा कर कहीं से उसे मालुम हुआ कि वडनगर में कला और संगीत का बहुत जतन होता है और वहां उसे मल्हार का कोई सच्चा कलाकार मिल सकता है।
तानसेन जब वडनगर पहुंचा तो रात ढल चूकी थी। उसने शर्मिष्ठा के किनारे ही रात बिताने चाही। प्रात:काल में नगर की स्त्रीयां सरोवर से पानी भरने हेतु आना शुरु हुई। तानसेन उनको गौर से देखने लगा। उनमें ताना और रीरी नाम की दो बहनें भी शामिल थीं। उन्होंने अपने घड़े पानी से भरे, लेकिन ताना ने तुरंत ही अपना घड़ा खाली कर दिया। उसने ऐसा कई बार किया। तानसेन यह देख रहा था। रीरी ने ताना से पूछा, बहन, ऐसा कितनी बार करोगी? तो ताना ने जवाब दिया, जब तक हमें घड़े से मल्हार राग सुनाई न दे। आखिरकर, जब वह घड़ा इस तरह भरने में कामियाब हुई कि उसके अंदर जाते हुए पानी की आवाज से मल्हार राग निकला, तब संतुष्ट हो कर बोली, अब चलें।
तानसेन, जो उनकी बातचीत सुन रहा था। अपने दोनों हाथ जोड़े वह दोनों बहनों के सामने जा कर बोला, मैं एक ब्राह्मण हूं। मैं दीपक राग जानता हूं और बादशाह के हुकूम पर मैंने दीपक गाया। तो अब मेरा पूरा बदन उसकी आग से जल रहा है। मैं मल्हार तो जानता नही हूं। अब आप ही मुझे बचा सकती हो। वरना, मैं मेरे बदन के भीतर लगी आग से मर ही जाऊंगा। अचानक एक अजनबी से ऐसी विनती सुन कर ताना और रीरी अवाक रह गयीं, लेकिन उस आदमी पर दया आयी। उन्होंने उसे तब तक राह देखने के लिये कहा, जब तक वे बड़ों की सलाह न ले ले। 
ताना और रीरी ने मल्हार गाना शुरु किया। थोडी देर में तो आकाश काले काले बादलों से घिर गया और जल्द ही बरसात बरसने लगी। जब तक उन्हों ने गाना बंद न किया, तब तक जोरों से बरसात होती रही। बरसात के ठंडे पानी में तानसेन पूरा भिग गया और उसके बदन के भीतर लगी आग भी अजायब सी शांत हो गई। उस बीच ताना उस अनजान आदमी को पहचान गयी थी। ब्राह्मण का ढोंग रचाये आया वह आदमी सचमुच में तानसेन के सिवा और कोई नही हो सकता था। तानसेन व अकबर की बातचीत दो शहजादों ने भी सुन ली और दोनों बहनों को पाने के लिए वडनगर की ओर निकल पड़े। वे उसी तरह वडनगर पहुंचे और सुबह होने पर पानी भरने आई महिलाओं को देखने लगे। इस बीच दो बहनें भी दिखाई दीं जिनकी सुंदरता पर शहजादे मोहित हो गए। जब महिलाओं ने इनको देखा तो शोर मचा दिया और लोगों ने हमला कर दोनों शहजादों को घोड़ों सहित मार डाला। 
इस घटना की सूचना मिलने पर अकबर आग बबूला हो गया और उसने अपनी सेना के साथ वहां वडनगर कत्लेआम मचा दिया। उसकी सेना ताना और रीरी को लेकर जा ही रहे थे कि मंदिर के सामने आते ही दोनों बहनों ने जो पालकी में विराजमान थीं ने अंगूठियों में  मौजूद जहर निगल लिया। आज भी वडगर में इनकी समाधियां मौजूद हैं। वडनगर के लोग आज भी इन बहनों का नाम सम्मान के साथ लेते हैं।

- राकेश सैन
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कांग्रेस और खालिस्तान में गर्भनाल का रिश्ता

माँ और सन्तान के बीच गर्भनाल का रिश्ता ही ऐसा होता है, कि प्रसव के बाद शरीर अलग होने के बावजूद भी आत्मीयता बनी रहती है। सन्तान को पीड़ा हो त...